तमिलनाडु चुनाव : एक दिग्गज का स्कोर कार्ड - 12 चुनाव लड़े, 9 जीते, 2 हारे

दुरई मुरुगन

चेन्नई। तमिलनाडु में एक महारथी 9 बार विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं। दसवीं जीत के लिए फिर मैदान में हैं। उनका स्कोर कार्ड शानदार है। 12 बार चुनाव लड़े, 9 बार जीते, 2 बार हारे। उनकी उम्र 82 साल है। इनका नाम है दुरई मुरुगन। वे द्रमुक (द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम) के महासचिव हैं। पार्टी के सबसे अनुभवी नेताओं में उनकी गिनती होती है। 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्हें काटपाडी विधानसभा क्षेत्र से फिर उम्मीदवार बनाया गया है। पिछले 10 साल से द्रमुक सत्ताविहीन है। वापसी की उम्मीद लगाये द्रमुक के लिए 2021 का चुनाव बहुत अहम है। करुणानिधि की गैरमौजूदगी में पार्टी का भविष्य अध्यक्ष स्टालिन और दुरई मुरुगन जैसे नेताओं के प्रदर्शन पर निर्भर है।

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    दुरई मुरुगन 9 बार से विधायक

    दुरई मुरुगन 9 बार से विधायक

    दुरई मुरुगन पहली बार 1971 में काटपाडी विधानसभा सीट से विधायक चुने गये थे। पहले वे द्रमुक के कोषाध्यक्ष थे। पिछले साल ही उन्हें प्रोन्नति देकर महासचिव बनाया गया था। उनके पुत्र और वेल्लोर के सांसद काथिर आनंद के मुताबिक, मुरुगन 7 बार काटपाडी से और दो बार रानीपेट से विधायक रहे हैं। वे अभी तमिलनाडु विधानसभा में विरोधी दल के उपनेता हैं। मुरुगन पेशे से वकील हैं। वे सदन में एक अच्छे वक्ता के रूप में मशहूर हैं। जब वे अन्नाद्रमुक सरकार पर तत्थों के साथ हमला करते हैं तो उनमें व्यंग्य का शानदार इस्तेमाल होता है। हाजिरजवाबी और हंसी-मजाक वाली भाषणशैली के कारण उनको विशेष लोकप्रियता हासिल है। 2021 में मुरुगन बारहवीं बार विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। 9 बार विधायक चुने जाने जा चुके हैं। 1984 और 1991 के चुनाव में उन्हें अन्नाद्रमुक के उम्मीदवार के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। काटपाडी सीट पर वे 1996 से लगातार विधानसभा चुनाव जीत रहे हैं। 2021 के चुनाव में इस सीट पर उनका मुकाबला अन्नाद्रमुक के एस. रामू से है।

    करुणानिधि 13 बार विधायक चुने गये, कभी नहीं हारे

    करुणानिधि 13 बार विधायक चुने गये, कभी नहीं हारे

    द्रमुक के दिवंगत दिग्गज करुणानिधि भारत में सर्वाधिक विधानसभा चुनाव जीतने वाले नेताओं में एक थे। वे 13 बार विधायक चुने गये थे। उन्होंने अपने जीवन में कभी चुनाव नहीं हारा। वे 13 बार चुनाव मैदान में उतरे और हर बार विजयी रहे। 1984 में उन्होंने विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा वर्ना वे भारत में सबसे अधिक समय तक विधायक रहने का रिकॉर्ड बना लेते। 1983 में करुणानिधि ने श्रीलंका में तमिल अधिकारों के समर्थन में विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उन्हें तमिलनाडु विधानपरिषद के लिए चुना गया। अप्रैल 1984 में विधानसभा चुनाव के समय वे विधान पार्षद थे। वे चाहते तो चुनाव लड़ सकते थे। लेकिन उस समय अन्नाद्रमुक के एमजी रामचंद्रन की लोकप्रियता उफान पर थी। अन्नाद्रमुक की जीत की संभावना के देख कर करणानिधि ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया क्यों कि वे हार कर अपना चुनावी रिकॉर्ड खराब नहीं करना चाहते थे। उनकी आशंका सही निकली। चुनाव हुए तो एमजीआर के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक ने 132 सीटें जीत कर सरकार बनायी। उस समय कांग्रेस ने अन्नाद्रमुक के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था और उसे 61 सीटें मिलीं थीं। करुणानिधि की पार्टी (द्रमुक) को केवल 24 सीटें मिलीं थीं।

    दुरई मुरुगन द्रमुक के चाणक्य

    दुरई मुरुगन द्रमुक के चाणक्य

    2016 के विधानसभा चुनाव में द्रमुक के 89 विधायक जीते थे। तमिलनाडु के पांच बार मुख्यमंत्री रहे करुणानिधि का अगस्त 2018 में निधन हो गया था। उसके बाद दल की कमान करुणानिधि के पुत्र एमके स्टालिन हाथों में आयी। दुरई मुरुगन को करुणानिधि का सबसे विश्वासपात्र नेता माना जाता था। इसलिए पिछले साल उनका ओहदा बढ़ा कर महासचिव बनाया गया था। स्टालिन भी मुरुगन का बहुत सम्मान करते हैं। द्रमुक राजनीति में मुरुगन का बहुत दबदबा माना जाता है। करुणानिधि के नहीं रहने के बाद 2021 के चुनाव में मुरुगन पर बड़ी जवाबदेही आ गयी है। करुणानिधि की मौत के बाद उनके परिवार में उत्तराधिकारी के लड़ाई शुरू हो गयी थी। उनके बड़े पुत्र एमके अलागिरी ने स्टालिन के नेतृत्व को चुनौती दी थी। इस विकट समय में दुरई मुरुगन ने पारिवारिक एकता को बनाये रखने के लिए सक्रिय हुए थे। मध्यस्थता के बाद अलागिरी, स्टालिन के साथ काम करने के लिए राजी हो गये थे। लेकिन बाद में ये एकता कायम नहीं हो सकी। करुणानिधि ने शुरू से अपने छोटे पुत्र स्टालिन को हमेशा तरजीह दी। वे अपने बड़े पुत्र अलागिरी से नाखुश रहते थे। 2014 में उन्होंने अलागिरी को द्रमुक से निकाल दिया था। अब 2021 के विधानसभा चुनाव में एम के स्टालिन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा अलागिरी ही बने हुए हैं। उन्होंने कुछ दिनों पहले कहा था कि स्टालिन कभी तमिलनाडु का मुख्यमंत्री नहीं बन सकते। अब देखना है कि द्रमुक के चाणक्य माने जाने वाले दुरई मुरुगन कैसे इस चुनौती से निबटते हैं।

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