Sabarimala Case: 'मासिक धर्म के नाम पर महिलाओं को अछूत नहीं कह सकते', SC में जस्टिस नागरत्ना ने उठाए सवाल

Sabarimala Case Justice BV Nagarathna: देश की सर्वोच्च अदालत में सबरीमाला मंदिर और विभिन्न धर्मों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दे पर एक बार फिर ऐतिहासिक बहस छिड़ गई है।

मंगलवार, 7 अप्रैल को सुनवाई के दौरान नौ न्यायाधीशों की पीठ की एकमात्र महिला सदस्य, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं पर लगाई जाने वाली पाबंदियों पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी महिला को महीने के तीन दिन अछूत की तरह नहीं देखा जा सकता।

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सबरीमाला मंदिर विवाद पर जस्टिस नागरत्ना ने क्या कहा?

केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने अनुच्छेद 17 (छुआछूत का अंत) के संदर्भ में टिप्पणी की। उन्होंने कहा- एक महिला के तौर पर बोलते हुए, मैं यह कहना चाहती हूं कि हर महीने तीन दिन की छुआछूत (Untouchability) नहीं हो सकती, और फिर चौथे दिन वह छुआछूत अचानक खत्म नहीं हो सकती।

जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर संदेह व्यक्त किया कि क्या 'छुआछूत' शब्द का प्रयोग इस संदर्भ में किया जाना चाहिए, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से अनुच्छेद 17 को जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता के लंबे इतिहास को खत्म करने के लिए मौलिक अधिकार बनाया गया था।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील: भारत पश्चिमी सोच जैसा पितृसत्तात्मक नहीं

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के सबरीमाला फैसले की एक टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई। 2018 में जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा था कि महिलाओं को मंदिर से बाहर रखना 'अस्पृश्यता' का एक रूप है जो पितृसत्ता को बढ़ावा देता है।

तुषार मेहता ने दलील देते हुए कहा कि सबरीमाला में पाबंदी मासिक धर्म के कारण नहीं, बल्कि एक विशेष आयु समूह (10-50 वर्ष) के कारण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दुनिया भर में भगवान अयप्पा के अन्य सभी मंदिर सभी उम्र की महिलाओं के लिए खुले हैं। सबरीमाला का मामला अपने आप में 'अद्वितीय' (Sui Generis) है। मेहता ने कहा कि भारत उस तरह से पितृसत्तात्मक या लैंगिक रूढ़िवादी नहीं है जैसा कि पश्चिम समझता है।

Sabarimala Case पर सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच कर रही है सुनवाई

गौरतलब है कि 2018 के ऐतिहासिक फैसले में तत्कालीन जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने नोट किया था कि महिलाओं को उनके मासिक धर्म की स्थिति के आधार पर रोकना उन्हें सबऑर्डिनेट स्थिति में रखने के समान है। उन्होंने इसे महिलाओं की गरिमा के खिलाफ और पितृसत्तात्मक सोच का हिस्सा बताया था।

इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई नौ न्यायाधीशों की पीठ कर रही है, जिसका नेतृत्व मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत कर रहे हैं। इस बेंच में जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता का अधिकार

यह मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है। याचिकाओं में विभिन्न धर्मों में महिलाओं के प्रवेश, पारसी महिलाओं के टावर ऑफ साइलेंस में प्रवेश और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना जैसी प्रथाओं पर भी धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे को लेकर सवाल उठाए गए हैं। कोर्ट अब यह तय करेगा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25) किस हद तक समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) और मानवीय गरिमा के अधीन है।

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