सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से हजारों इंजीनियर्स की जा सकती है नौकरी

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसला देते हुए कहा है कि इंजीनियरिंग जैसे तकनीकी कोर्स को संस्थान कॉरेस्पोंडेंस के जरिए नहीं करा सकते। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 2001 के बाद कॉरेस्पोंडेंस के जरिए हासिल की गईं इंजीनियरिंग की डिग्रियों को अमान्य करार दे दिया है। ऐसे में बीते 16 साल में पत्राचार के माध्यम से इंजीनियरिंग करने वाले हजारों लोगों की नौकरियां मुश्किल में आ गई हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब पत्राचार से ली गई डिग्रियां ही वैध नहीं रह गई हैं तो ऐसे में नौकरी किस आधार पर बचेगी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सभी डीम्ड यूनिवर्सिटी को रेगुलेट करने के लिए मैकेनिज्म तैयार करने को भी कहा है।

Supreme Court rules Engineering degrees secured since 2001 via correspondence invalid

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को शिक्षा के क्षेत्र में अहम फैसला देते हुए कहा कि इंजीनियरिंग जैसे तकनीकी कोर्स को संस्थान कॉरेस्पोंडेंस के जरिए नहीं करा सकते। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में ओडिशा हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से टेक्नीकल एजुकेशन देने की इजाजत दी गई थी। अदालत ने डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से इस तरह के कोर्स करवाने वाले संस्थानों पर भी रोक लगा दी है। इस फैसले के बाद अब छात्र डिस्टेंस लर्निंग के माध्यम से एमबीए और तकनीकी शिक्षा की डिग्रियां नहीं ले सकेंगे।

जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूयू ललित ने अपने फैसले में कहा कि यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिशन (यूजीसी) और ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्नीकल एजूकेशन (एआईसीटीसी) ने इंजीनियरिंग के लिए डिस्टेंस लर्निंग प्रोग्राम्स को इजाजत नहीं दी है। डिस्टेंस एजुकेशन काउंसिल (डीईसी) जो कोर्स चला रहा है वो भी गैरकानूनी हैं।

सुप्रीम कोर्ट में देश की चार डीम्ड यूनिवर्सिटी- जेआरएन राजस्थान विद्यापीठ, इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज इन एजुकेशन इन राजस्थान, इलाहाबाद एग्रीकल्चरल इंस्टीट्यूट और विनायक मिशंस रिसर्च फाउंडेशन इन तमिलनाडु के पत्राचार पाठ्यक्रमों की वैधता को लेकर याचिका दायर की गई थी। जिस पर सर्वोच्च अदालत का ये अहम फैसला आया है।

कॉरेस्पोंडेंस के जरिए नहीं कर सकते इंजीनियरिंग जैसे कोर्स: सुप्रीम कोर्ट

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English summary
Supreme Court rules Engineering degrees secured since 2001 via correspondence invalid
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