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'इतना टची क्यों होना', शशि थरूर के खिलाफ BJP नेता की याचिका पर SC ने क्यों कहा ऐसा, आप भी पढ़ लीजिए पूरा मामला

Shashi Tharoor Defamation Case: 2018 में कांग्रेस नेता शशि थरूर (Shashi Tharoor) ने पीएम मोदी को लेकर एक ऐसा बयान दिया था, जो खूब विवादों में रहा-उन्होंने मोदी की तुलना "शिवलिंग पर बैठे बिच्छू" से की थी। उस वक्त यह बात खूब सुर्खियों में रही और बीजेपी नेता राजीव बब्बर ने इसे लेकर मानहानि का केस भी दर्ज करवाया। अब, करीब 6 साल बाद यह मामला फिर से चर्चा में है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ इशारा दिया है कि "अब इस मामले को खत्म कर देना चाहिए"।

शुक्रवार, 1 अगस्त को जब यह आपराधिक मानहानि का मामला सुप्रीम कोर्ट में पेश हुआ, तो न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और एनके सिंह की पीठ ने "अब इसे यहीं बंद कर दें" जैसे शब्दों में स्पष्ट संकेत दिए कि अदालत इस लंबे समय से चल रहे विवाद को समाप्त करने के पक्ष में है।

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अदालत की यह टिप्पणी केवल कानूनी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राजनीति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे व्यापक मुद्दों पर भी बहस को हवा देने वाली है।

Shashi Tharoor Defamation Case पर कोर्ट ने क्या कहा?

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए न्यायमूर्ति सुंदरेश ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "कैसा गैर-सामान्य दिन? चलिए इस मामले को खत्म करते हैं। आप इससे इतने संवेदनशील क्यों हो रहे हैं? हमें यह सब खत्म करना चाहिए। वैसे भी प्रशासक, राजनेता और जज-all fall in the same category-इनकी त्वचा पहले से ही काफी मोटी होती है। चिंता मत कीजिए।"

हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद, जो शिकायतकर्ता की ओर से पेश हो रही थीं, ने कहा कि मामले की सुनवाई तो करनी ही होगी। इस पर सहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई अब किसी और दिन की जाएगी। साथ ही, पिछले वर्ष पारित अंतरिम आदेश को फिलहाल जारी रखने का निर्णय लिया गया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला 2018 में उस वक्त शुरू हुआ, जब शशि थरूर ने एक भाषण में दावा किया था कि एक अनाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना "शिवलिंग पर बैठे बिच्छू" से की थी। थरूर ने इसे "अद्भुत रूपक" (extraordinarily striking metaphor) बताया था।

बीजेपी नेता राजीव बब्बर ने इस बयान को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला बताते हुए दिल्ली की एक अदालत में आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी। ट्रायल कोर्ट ने 27 अप्रैल 2019 को थरूर को आरोपी के तौर पर तलब किया था। इसके बाद थरूर ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इस आदेश को रद्द करने की मांग की, लेकिन हाई कोर्ट ने 29 अगस्त 2023 को उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके विरुद्ध थरूर ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही रोक लगा दी थी ट्रायल

10 सितंबर 2023 को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत में चल रही कार्यवाही पर रोक (Stay) लगा दी थी और दिल्ली पुलिस और राजीव बब्बर को नोटिस जारी कर थरूर की याचिका पर जवाब मांगा था। इस याचिका में थरूर ने 2 नवंबर 2018 को दर्ज की गई शिकायत और 27 अप्रैल 2019 के समन आदेश को रद्द करने की मांग की थी।

यह मामला सिर्फ एक व्यक्तिगत टिप्पणी से जुड़ा नहीं, बल्कि राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक भावनाओं की रक्षा और लोकतांत्रिक संवाद की सीमाओं से संबंधित एक बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है। जहां बीजेपी नेता इसे धार्मिक अस्मिता से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं कांग्रेस और उनके समर्थकों का मानना है कि यह राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है।

दिलचस्प बात यह रही कि जहां थरूर के वकील ने इस मामले में कुछ और समय की मांग की, वहीं बीजेपी नेता राजीव बब्बर की ओर से पेश वकील ने इसे एक विशेष (non-miscellaneous) दिन पर सुनवाई के लिए रखने की बात कही। लेकिन पीठ के जवाब-"इतनी संवेदनशीलता क्यों? नेता, जज और अफसर सबको मोटी चमड़ी की जरूरत होती है"-ने यह साफ कर दिया कि अदालत इसे गंभीर कानूनी अपराध मानने को तैयार नहीं दिख रही है।

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