Yashwant Varma: कैश कांड में जस्टिस यशवंत वर्मा को झटका, सुप्रीम कोर्ट में कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका खारिज

जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट (SC) से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने उनके द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने घर में नकदी बरामदगी के मामले में आंतरिक जांच रिपोर्ट को चुनौती दी थी। इस रिपोर्ट में उन्हें नकदी घोटाले में दोषी ठहराया गया था।

याचिका में उन्होंने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना द्वारा उनके खिलाफ महाभियोग की सिफारिश को भी चुनौती दी थी। यह सिफारिश दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में बेहिसाब नकदी मिलने के बाद की गई थी।

Justice Yashwant Varma

कोर्ट की टिप्पणी: खुद जांच में शामिल होकर फिर सवाल उठाना गलत
गुरुवार, 7 अगस्त को सुनाए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि, 'न्यायमूर्ति वर्मा पहले खुद जांच प्रक्रिया में शामिल हुए और बाद में उसी प्रक्रिया पर सवाल उठाना अनुचित है। इस आधार पर कोर्ट ने रिट याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आंतरिक समिति का गठन और जांच की प्रक्रिया पूरी तरह वैध थी और इसमें कोई अनियमितता नहीं पाई गई।

Bar & Bench रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने 6 प्रमुख बिंदुओं पर यह फैसला दिया

1. विचारणीयता (Maintainability):
कोर्ट ने माना कि एक कार्यरत न्यायाधीश के खिलाफ आंतरिक जांच के मामलों में रिट याचिका विचारणीय नहीं होती।

2. कानूनी प्रक्रिया की वैधता (Legal Procedure):
कोर्ट ने कहा कि यह आंतरिक जांच प्रक्रिया संविधान के अनुरूप है और कोई समानांतर गैर-कानूनी प्रणाली नहीं है।

3. मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं (Violation of Rights):
न्यायमूर्ति वर्मा के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का कोई प्रमाण नहीं मिला।

4. जांच प्रक्रिया का पालन हुआ (Compliance with process)
मुख्य न्यायाधीश और समिति ने प्रक्रिया का ईमानदारी से पालन किया। तस्वीरें या वीडियो अपलोड न करने को कोई त्रुटि नहीं माना गया क्योंकि उस समय कोई आपत्ति नहीं थी।

5. प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति को पत्र भेजना (Communications to Executive):
रिपोर्ट को कार्यपालिका के पास भेजना (जैसे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को) असंवैधानिक नहीं था।

6. भविष्य में शिकायत का विकल्प खुला (Liberty):
कोर्ट ने कहा कि जस्टिस वर्मा के पास भविष्य में उचित वैधानिक माध्यमों से शिकायत दर्ज करने का विकल्प खुला है।

न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा मामला: पूरा घटनाक्रम

दरअसल, यह विवाद 14 मार्च, 2025 को तब शुरू हुआ जब अग्निकांड की एक घटना के दौरान नई दिल्ली स्थित न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर अग्निशामकों को कथित तौर पर बेहिसाब नकदी से भरी बोरियां मिलीं।

न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने ऐसी किसी भी धनराशि की जानकारी होने से साफ इनकार किया और दावा किया कि न तो उन्हें और न ही उनके कर्मचारियों को इतनी मात्रा में पैसे के बारे में जानकारी थी। घटना की गंभीरता को देखते हुए भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की एक आपात बैठक बुलाई और इस पर चर्चा की।

प्रशासनिक कार्रवाई और जांच समिति का गठन
घटना के तुरंत बाद, न्यायपालिका ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाई कोर्ट में उनके न्यायिक कार्यों से अलग कर दिया। यह कदम न्यायपालिका की ओर से कार्यरत न्यायाधीश पर लगे गंभीर वित्तीय आरोपों को गंभीरता से लेने का संकेत था।

22 मार्च 2025 को मुख्य न्यायाधीश ने तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया, जिसमें शामिल थे:

  • न्यायमूर्ति शील नागू- मुख्य न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट
  • न्यायमूर्ति जी.एस. संधावालिया- मुख्य न्यायाधीश, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट
  • न्यायमूर्ति अनु शिवरामन - न्यायाधीश, कर्नाटक हाई कोर्ट

इस समिति को आंतरिक प्रक्रिया के तहत पूरी घटना की जांच का जिम्मा सौंपा गया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान यह भी निर्देश दिया कि पिछले छह महीनों के दौरान जस्टिस वर्मा के आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों की पूरी जानकारी जुटाई जाए। यह कदम दिखाता है कि कोर्ट हर पहलू से जांच को व्यापक और पारदर्शी बनाने के पक्ष में है।

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