Suhas LY IAS : दिव्यांगता को मात देकर पैरालंपिक में पहुंचे DM सुहास एलवाई के संघर्ष व कामयाबी की पूरी कहानी
नई दिल्ली। Suhas LY Biography. साल 2020 में जब यूपी का सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक शहर नोएडा कोरोना की मार से बुरी तरह टूट रहा था, लोग महामारी से दम तोड़ रहे थे, अस्पतालों और सरकारी व्यवस्थाएं इस महामारी के सामने घुटने टेक रही थी तो उम्मीद की किरण बनकर एक युवा IAS अधिकारी ने कमान संभाली। 38 साल के इस युवा जिलाधिकारी ने कुर्सी पर बैठते ही अपनी जिम्मेदारियों को इस कदर निभाया कि केंद्र सरकार ने भी कोरोना मैंनेजमेंट के लिए उनकी तारीफों के पुल बांध दिए। देश के तेज तर्रार आईएएस अधिकारियों में गिने जाने वाले सुहास एलवाई का सफर आसान नहीं था। दाहिने पैर से विकलांग सुहास ने कभी अपनी इस कमजोरी का रोना नहीं रोया, बल्कि इस कमजोरी को ही अपनी ताकत बना ली। पैर खराब होने के बावजूद जब सुहास बैंडमिंटन कोट में उतरते हैं तो बड़े-बड़े खिलाड़ियों के पसीने छूट जाते हैं।

Who is Suhas LY: कौन हैं सुहास एलवाई
कर्नाटक के छोटे से शहर शिगोमा में जन्मे सुहास एलवाई ने अपनी तकदीर को अपने हाथों से लिखा है। जन्म से ही पैर से विकलांग सुहास शुरुआत से IAS नहीं बनना चाहते थे। बचपन से ही को खेल को लेकर बहद दिलचस्पी रखने थे। उन्हें पिता और परिवार का भरपूर साथ मिला। पैर पूरी तरह फिट नहीं था तो समाज के ताने उन्हें सुनने को मिलते रहे, लेकिन पिता और परिवार चट्टान की तरह उन तानों के सामने खड़े रहे और कभी भी सुहास का हौंसला नहीं टूटने दिया। सुहास के पिता उन्हें सामान्य बच्चों की तरह देखते थे। सुहास का क्रिकेट प्रेम उनके पिता की देन है। परिवार ने उन्हें कभी नहीं रोका, जो मर्जी हुई सुहास ने उस गेम को खेला और पिता ने भी उनसे हमेशा जीत की उम्मीद की। पिता की नौकरी ट्रांसफर वाली थी, जो सुहास की पढ़ाई शहर-शहर घूमकर होती रही। शुरुआती पढ़ाई गांव में हुई तो वहीं सुरतकर शहर ने उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी से कम्प्यूटर साइंस में इंजिनियरिंग पूरी की।

अंदर से उठ रही आवाज को सुना
कंप्यूटर इंजिनियरिंग क बाद सब की तरह सुहास ने भी बैंगलोर की इस कंपनी में नौकरी कर ली, लेकिन उनकी भीतर एक कमी खल रही थी। वनइंडिया के साथ बातचीत के दौरान सुहास ने कहा कि अंदर से एक आवाज आ रही थी कि कहीं कुछ कमी है। उन्हें लग रहा था कि उनकी जीवन पूर्ण नहीं है। बार-बार ये कसक मन में उठ रहा था कि अगर इस जीवन में समाज के लिए कुछ नहीं किया तो क्या किया। ये कमी खत्म हुई जब उन्होंने UPSC की तैयारी शुरू की। साल 2005 में पिता की मृत्यु के बाद सुहास टूट गए थ। सुहास ने बताया कि उनके जीवन में पिता का महत्वपूर्ण स्थान था। पिता की कमी खलती रही, उनका जाना सुहास के लिए बड़ा झटका था। इसी कमोकश के बीच सुहास ने ठान लिया कि अब सिविल सर्विस ज्वाइंन करनी है। फिर क्या था सब छोड़छाड़ कर उन्होंने UPSC की तैयारी की। उनकी मेहनत और तकदीर ने उनका साथ दिया। वनइंडिया के साथ बातचीत के दौरान सुहास ने इस बात का जिक्र भी किया कि हमें अपना कर्म करना चाहिए बाकी मुक्कदर पर छोड़ देना चाहिए। अगर आप किसी चीज को दिल से चाहेंगे और उसके लिए कोशिश करेंगे तो फिर पूरी कायनात उसे आपसे मिलाने की कोशिश करेगी। ऐसा ही हुआ, पहले पीटी, फिर मेन्स और फिर इंटरव्यू में सफलता हासिल कर सुहास साल 2007 में यूपी कैडर से IAS अधिकारी बन गए।

खत्म नहीं हुआ सफर, अब बैंडमिंटन की बारी
UPSC की परीक्षा पास करने के बाद उनकी पोस्टिंग आगरा में हुई। फिर जौनपुर, सोनभद्र, आजमगढ़, हाथरस , महाराजगंज प्रयागराज और गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी बनें। सुहास सरकारी पदाधिकारी बन चुके थे। तेज तर्रार अधिकारी का दर्जा प्राप्त था, लेकिन वो इतने पर ही रूकने वालों में से कहां था। जिस खेल को वो पहले शौक के तौर पर खेलते अब धीरे-धीरे उनके लिए जरूरत बन गया था। सुहास अपने दफ्तर की थकान को मिटाने के लिए बैंडमिंटन खेलते थे, लेकिन जब कुछ प्रतियोगिताओं में मेडल आने लगे तो फिर उन्होंने इस प्रोफेशनल तरीके से खेलना शुरू किया। 2016 में उन्होंने इंटरनेशनल मैच खेलना शुरू किया। चाइना में खेले गए बैंडमिंटन टूर्नामेंट में सुहास अपना पहला मैच हार गए, लेकिन इस हार के साथ ही उन्हें जीत का फॉर्मूला भी मिल गया। सुहास ने हमसे बातचीत के दौरान बताया कि गेम के दौरान पूरा खेल मेंडल प्रेशर का होता है, जो इसे पार कर लेता है वो मैच जीत जाता है।

हनुमान भक्त हैं सुहास
सुहास एलवाई मेहनत के साथ-साथ तकरीद को भी मानते हैं। उनका विश्वास भगवान में है। सुहास जब भी टूर्नामेंट में मैच खेलने जाते हैं तो कोट में उतरने से पहले भगवान हनुमान की मूर्ति को रखकर जाते हैं। उनका कहना है कि भगवान की मूर्ति पास होने से उन्हें ताकत और आत्मविश्वास मिलता है।
सुहास एलवाई के साथ एक्सक्यूसिव बातचीत को देखने के लिए यहां क्लिक करें....
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