कहानी भारत में चल रहे लोन एप्स के धंधे की
चुटकियों में क़र्ज़ बाँटने वाले एप्स कुकरमुत्तों की तरह पनप रहे हैं, लेकिन कुछ को छोड़कर बाक़ियों की गतिविधियाँ काफ़ी ख़तरनाक हैं.
हैदराबाद की वी कविता ने कोरोना महामारी के समय एक एप के ज़रिए लोन लिया था. वे इस लोन को तय वक़्त पर नहीं चुका पाईं.
इस एप के कर्मचारियों ने उन्हें लोन चुकाने की आख़िरी तारीख़ के दिन सुबह सात बजे फ़ोन किया. चूंकि, वे दूसरे कामों में व्यस्त थीं, ऐसे में वे फ़ोन चेक नहीं कर पाईं.
अगली कॉल कविता के छोटे भाई की पत्नी की रिश्तेदार को गई. यहाँ तक कि कविता की भी उनके साथ कोई नज़दीकी बातचीत नहीं थी.
जब एप के कर्मचारियों ने उनसे पूछा कि क्या वे कविता को जानती हैं तो उन्होंने बताया कि 'हाँ, वे उनकी रिश्तेदार हैं.'
इस पर कर्मचारियों ने उनसे कहा कि कविता ने उनकी कंपनी से एक लोन लिया है और उन्होंने ही उनका नंबर उन्हें दिया था. ऐसे में अब उन्हें ही यह लोन चुकाना चाहिए.
लेकिन इस तरह की माँग से वे घबरा गईं और उन्होंने यह पूरा वाक़या अपने परिवार में बता दिया. पूरे परिवार ने कविता से दूरी बना ली.
इसी तरह सिद्दीपेट की कीर्णी मोनिका, जो एक सरकारी कर्मचारी थीं और कृषि विभाग में काम करती थीं. उन्होंने भी अपनी निजी ज़रूरतों के लिए इन एप्स में से एक से लोन ले लिया.
जब वे बक़ाया रक़म का भुगतान करने से चूक गईं, तो लोन एप वालों ने उनकी फ़ोटो को व्हाट्सएप पर उनके सभी कॉन्टैक्ट्स को भेज दिया और उसमें लिखा कि मोनिका ने उनसे एक लोन लिया है और अगर वे उन्हें कहीं दिखाई देती हैं, तो उनसे लोन का भुगतान करने के लिए कहें.
मोनिका के परिवार के अनुसार, वे इस बेइज़्ज़ती को सह नहीं पायीं और उन्होंने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली.
उनके गुज़रने के बाद एप के कर्मचारियों ने उनके घर फ़ोन किया और जब उन्हें बताया गया कि मोनिका ने आत्महत्या कर ली है तो उन्होंने इस पर कोई ग़ौर नहीं किया.
एप के कर्मचारियों ने मोनिका और उनके परिवार को भद्दी-भद्दी गालियाँ दीं और लोन ना चुकाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया.
रामगुंडम में काम करने वाले संतोष ने भी इन्हीं एप्स की प्रताड़ना और अपमान से तंग आकर आत्महत्या कर ली.
एक वीडियो में उन्होंने अपनी इस व्यथा का ज़िक्र किया. उन्होंने कीड़े मारने की दवाई खाकर जान दे दी.
इससे पहले राजेंद्र नगर में एक और शख़्स ने इन्हीं लोन एप्स की कारगुज़ारियों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी.
लोगों की ज़िंदगी छीन रहे मोबाइल एप्स
इन लोन एप्स के ज़रिए भारी-भरकम ब्याज पर पैसा उधार लेने वालों से अगर क़र्ज़ चुकाने में ज़रा भी देरी हो जाती है तो उन्हें अक्सर धमकियों और भद्दी-भद्दी गालियों का सामना करना पड़ता है.
यह पूरी परिस्थिति इस तरह के क़र्ज़दारों के लिए एक प्रताड़ना बन गई है.
ये लोन कंपनियाँ बिना किसी अंडरराइटिंग के आकस्मिक परिस्थितियों में काम चलाने के लिए तुरत-फुरत पैसा देती हैं. बाद में ये उधार लेने वाले से मोटा पैसा वसूलती हैं.
ऊपर दिये गए मामले इन कंपनियों द्वारा अपनायी जा रही अनियंत्रित ग़लत गतिविधियों के चंद वाक़ये भर हैं.
आमतौर पर लोग बैंकों से या अपने परिचितों से पैसे उधार लेना पसंद करते हैं. मोबाइल फ़ोन आने के बाद कुछ लोगों ने इनके ज़रिए ब्याज पर पैसे उठाना शुरू कर दिया है.
अगर आप अपना ब्यौरा मोबाइल एप में डालते हैं तो वे आपको लोन देते हैं. इस क़र्ज़ को आपको बाद में वापस करना होता है. जब तक आप तय वक़्त पर पैसे चुकाते हैं, तब तक सब कुछ अच्छा रहता है. चीजें तब बिगड़ती हैं जब आप लोन की रक़म चुकाने में देरी करते हैं.
दूसरी बात, ये लोन लेना जितना आसान है इन्हें चुकाना उतना ही मुश्किल होता है. कई लोगों के लिए ये लोन एक मानसिक प्रताड़ना के दौर के रूप में सामने आते हैं.
सिर्फ़ ऊपर दिये गए मामले ही इन एप आधारित लोन के चलते मुसीबत में पड़ने वाले लोगों के उदाहरण नहीं हैं. ऐसे तमाम लोग हैं जिन्हें इन लोन्स के चलते गंभीर प्रताड़ना का सामना करना पड़ा है.
जो लोग थोड़े बहुत पढ़े लिखे हैं और फ़ोन का इस्तेमाल करना जानते हैं, वे कई दफ़ा अपनी ज़रूरतों के लिए इन एप्स से लोन ले लेते हैं, लेकिन जब इन्हें चुकाने में देरी होती है तो उन्हें भयंकर मुश्किलों और तनाव से जूझना पड़ता है.
एप से क़र्ज़ लेने में दिक़्क़त क्या है?
आमतौर पर जब बैंक या किसी दूसरी वित्तीय संस्था से लोन लिया जाता है तो ब्याज दर एक से डेढ़ फ़ीसद प्रतिमाह होती है. लेकिन, इन एप आधारित क़र्ज़ों में ब्याज की कोई ऊपरी सीमा नहीं है. इनमें कोई काग़ज़ नहीं होता है.
इन क़र्ज़ों में ब्याज पर ब्याज चढ़ता है. दिनों के आधार पर ब्याज तय होता है. हफ्ते के आधार पर ब्याज तय किया जाता है.
लोन चुकाने में देरी होने पर मूलधन पर पेनाल्टी लगती है. साथ ही ब्याज पर भी पेनाल्टी वसूली जाती है.
आमतौर पर कहीं भी महीने के आधार पर ब्याज का आकलन नहीं किया जाता, लेकिन इन एप्स में यह आकलन दिन, हफ्ते और महीने के आधार पर किया जाता है.
प्रोसेसिंग फ़ीस
बैंक और दूसरे ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान (एनबीएफ़सी) किसी को लोन देते हैं तो वो उसके लिए एक प्रोसेसिंग फ़ीस लेते हैं.
यह फ़ीस लोन की मात्रा पर आधारित होती है. यह प्रोसेसिंग फ़ीस आमतौर पर लोन की रक़म के एक फ़ीसद से भी कम होती है. इसका मतलब है कि अगर आप पाँच लाख रुपये का लोन लेते हैं, तो प्रोसेसिंग फ़ीस के तौर पर आपको 5,000 रुपये से भी कम देने होते हैं.
लेकिन, एप आधारित लोन ऐसे नहीं चलते. ये महज़ पाँच हज़ार रुपये के लोन के लिए चार हज़ार रुपये प्रोसेसिंग फ़ीस के लेते हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि लोग आख़िर ये लोन लेते क्यों हैं?
इसकी वजह ये है कि ये एप्स आपसे आपकी आमदनी का कोई प्रमाण नहीं माँगते. ये आपका सिबिल स्कोर नहीं देखते. जबकि कोई भी बैंकिंग संस्थान या एनबीएफ़सी आपका सिबिल स्कोर चेक किए बग़ैर आपको लोन नहीं देता.
सिबिल एक ऐसा स्कोर होता है जिससे आपकी किसी लोन को चुकाने की हैसियत का पता चलता है.
इससे यह भी पता चलता है कि आपने कहीं अपने पिछले लोन चुकाने में कोई देरी या डिफ़ॉल्ट तो नहीं किया.
इन्हीं के आधार पर आपका स्कोर तय किया जाता है और बैंक लोन देते वक़्त इस स्कोर का इस्तेमाल आपकी लोन चुकाने की क़ाबिलियत का अंदाज़ा लगाने में करते हैं. जितना ऊंचा सिबिल स्कोर होता है आपकी लोन चुकाने की संभावना उतनी ही मज़बूत होती है.
कुछ एप्स आमदनी के प्रमाण और सिबिल स्कोर को वेरिफ़ाई करते हैं और अपने दिये गए क़र्ज़ों को एक प्रक्रिया के तहत वसूलते हैं. लेकिन, ऐसे एप्स चुनिंदा ही हैं.
जबकि ऐसे एप्स की भारी तादाद है जो लोन देने के नाम पर लूट मचा रहे हैं. इस तरह के एप्स लोगों की पैसों की आकस्मिक ज़रूरतों और तुरत-फुरत लोन मिल जाने की सहूलियत का फ़ायदा उठा रहे हैं.
जीएसटी के नाम पर
आमतौर पर हम हर तरह की सर्विस के लिए सरकार को जीएसटी का भुगतान करते हैं. लेकिन, ये एप्स जीएसटी के तहत रजिस्टर्ड नहीं हैं. ये एप्स उनसे क़र्ज़ लेने वालों से जीएसटी वसूलते हैं, लेकिन यह पैसा सरकार को नहीं चुकाया जाता है.
इसका मतलब यह है कि जीएसटी के दायरे में आये बग़ैर ये जीएसटी का पैसा भी अपने ग्राहकों से वसूलते हैं.
अगर जीएसटी लिया जाता है तो उस संस्थान का जीएसटी नंबर भी दिया जाना चाहिए. लेकिन, ये एप्स ऐसा कोई ख़ुलासा नहीं करते हैं.
फ़र्ज़ी क़ानूनी नोटिस
अगर रीपेमेंट में देरी होती है तो फ़र्ज़ी क़ानूनी नोटिस फ़ोन पर भेजे जाते हैं. इनमें लिखा होता है कि चूंकि आप अपने लिए गए लोन को चुकाने में डिफॉल्ट कर गए हैं ऐसे में हम आप आपके ख़िलाफ़ एक्शन ले रहे हैं या एक्शन लेने जा रहे हैं. इनमें कहा जाता कि आप कोर्ट में उपस्थित रहने के लिए तैयार रहें.
लेकिन, ये नोटिस फ़र्ज़ी होते हैं. ये एप्स इसी तरह के नोटिस क़र्ज़दार के रिश्तेदारों और दोस्तों को भी भेजते हैं. जिन लोगों को इस सब के बारे में जानकारी नहीं होती है वे इस नोटिस को देखकर डर जाते हैं.
लोन वसूली के लिए बेइज़्ज़ती करना
इन एप्स से लोन लेने के बाद हमें इन्हें तय समयसीमा के भीतर चुकाना होता है. ऐसा नहीं होने पर लोन चुकाने की डेडलाइन के दिन सुबह सात बजे ही ये एप्स आपको लगातार फ़ोन कॉल्स करने लगते हैं. ये दर्जनों बार आपको फ़ोन करते हैं. और इनकी भाषा धमकाने वाली होती है.
अगर किसी भी वजह से आप डेडलाइन से एक दिन भी चूक गए तो बस आपकी मुसीबत शुरू हो जाती है.
एप्स के कर्मचारी इस तरह के आदेश से शुरुआत करते हैं, "भीख मांगो, लेकिन पैसे वापस करो."
यह इनकी पहले चरण की कार्रवाई होती है.
अगले चरण में ये आपके रिश्तेदारों को फ़ोन करना शुरू कर देते हैं. ये उन्हें कहते हैं कि आपने उनका रेफ़रेंस दिया है. ये आपके रिश्तेदारों से कहते हैं कि अब आपको यह लोन चुकाना होगा.
इसके साथ ही लोन लेने वाले और उसके रिश्तेदारों के बीच संबंध या तो ख़त्म हो जाते हैं या फिर ख़राब हो जाते हैं. ये एप्स आपके कई रिश्तेदारों को इस तरह से फ़ोन करते हैं.
अंतिम चरण में ये लोन लेते वक़्त आपकी दी गई तस्वीरों का इस्तेमाल करने लगते हैं. ये व्हॉट्सएप ग्रुप्स पर आपकी तस्वीरें डालने लगते हैं.
ये उधार लेने वाले के दोस्तों और रिश्तेदारों का एक ग्रुप बनाते हैं और उसमें उधार लेने वाले की फ़ोटो डालते हैं और उसका कैप्शन देते हैं, "फ़लां शख्स धोखेबाज़ है." या "ये शख्स पैसे चुकाने से बच रहा है."
यह प्रताड़ना यहीं ख़त्म नहीं होती है. इनमें कहा जाता है कि आप सब सौ-सौ रुपये इकट्ठे कीजिए और इनका लोन चुकाइए. ये सब बेहद बुरे अंदाज में कहा जाता है.
कविता कहती हैं, "हम ये नहीं कह रहे कि हम लोन नहीं चुकाएंगे. मैं एक छोटा कारोबार चलाती हूं. मुझे कोरोना के वक़्त पर पैसे उधार लेने पड़ गए. लेकिन, वे किसी भी बात को नहीं सुनना चाहते. यहां कि मैं ये भी कहूं कि मुझे बैंक जाने के लिए कम से कम एक घंटे का वक़्त दे दीजिए."
वे चीख़ने लगते हैं, "आप एक महिला नहीं हैं? आपके बच्चे नहीं हैं? ऐसा कोई नहीं है जो बैंक में पैसे जमा कर सके?"
कविता कहती हैं, "वे बेहद गंदी गालियां देने लगते हैं."
इन्हें नंबर कहां से मिलते हैं?
हर स्मार्टफ़ोन में अगर हम कोई नया एप इंस्टॉल करते हैं तो हमसे कुछ मंज़ूरियां मांगी जाती हैं. आमतौर पर एप इंस्टॉल करते वक़्त हम इन मंज़ूरियों का ब्योरा पढ़े बग़ैर ओके पर क्लिक कर देते हैं और सभी तरह की मंज़ूरियों के लिए हामी भर देते हैं.
इन मंज़ूरियों को देने का मतलब यह है कि एप आपकी सभी फ़ोटोज़ और कॉन्टैक्ट नंबरों तक पहुँच सकता है और उनका मनचाहा इस्तेमाल कर सकता है.
इन एप्स से लोन वाले एक बटन को दबाते हैं और इसके साथ ही एप को उनके सभी कॉन्टैक्ट नंबर निकालने की ताक़त मिल जाती है.
ओके बटन के दबने के साथ ही उधार लेने वाले के सभी कॉन्टैक्ट्स एप्स चलाने वालों के पास पहुँच जाते हैं.
उधार लेने वाले को यह पता भी नहीं चलता है कि लोन लेने पर उसके फ़ोन के सभी संपर्क एप्स वालों के हाथ चले जाएंगे.
कविता बताती हैं, "जब मेरे रिश्तेदारों को फ़ोन गए तो मैं हैरान रह गई. लेकिन, जब मैंने इस पर विचार किया तो मुझे पता चला कि एप को इंस्टॉल करते वक़्त उन्होंने ये सारे नंबर ले लिए थे. अब पूरे परिवार ने मुझसे दूरी बना ली है."
यहां तक कि अब पुलिस भी इस बात की जाँच कर रही है कि इन एप्स के पास लोगों को बांटने के लिए इतना पैसा कहां से आता है.
लेकिन, अभी तक पुलिस केवल ऐसे लोगों का पता कर पाई है जो कि कॉल सेंटरों से लोगों को फ़ोन करते हैं और धमकाते हैं. इस मामले में आगे की जाँच जारी है.
क्या क़र्ज़ चुकाना ग़लत है?
जब हम कोई क़र्ज़ लेते हैं तो हमें वह पैसा चुकाना पड़ता है. लेकिन, इस भुगतान का एक तरीक़ा होता है, इसमें सरकार के तय किए गए नियमों को मानना होता है. इस तरह के क़र्ज़ों में ब्याज की दरें तार्किक होनी चाहिए.
इन क़र्ज़ देने वालों को बताना होता है कि वे किस चीज़ के लिए कितना चार्ज ले रहे हैं. ये चार्ज एक दायरे में होने चाहिए.
इन संस्थानों को लोगों को पैसे चुकाने के लिए वक़्त देना चाहिए. लेकिन, ये संस्थान इस तरह के किसी रेगुलेशन को नहीं मानते हैं. यही असली समस्या है.
इन एप्स का एक दूसरा पहलू भी है. गुज़रे वक़्त में ऐसा हुआ है कि कुछ लोगों ने इन एप्स से पैसे उधार लिए और क्रेडिट कार्ड की ब्याज दर के मुताबिक़ पैसे लौटा दिए.
इन एप्स से पैसे उधार ले चुके एक शख्स ने बताया कि उन्होंने इतने बुरे तरीक़े से बर्ताव नहीं किया था.
सैकड़ों की संख्या में मौजूद क़र्ज़ देने वाली एजेंसियों में ऐसी चुनिंदा ही हैं जो कि रेगुलेशंस के मुताबिक़ चल रही हैं. एक पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि बाक़ी की एजेंसियां लोगों को प्रताड़ित करती हैं और उनका मक़सद लोगों को लूटना होता है.
क़ानून क्या कहता है?
भारत में बैंकों को रेगुलेट करने वाले रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने भी इन एप्स के लिए कोई रेगुलेशंस नहीं बनाए हैं.
ऐसे में पुलिस पहले से मौजूद क़ानूनों के आधार पर इन एप्स के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की कोशिश कर रही है. इन क़ानूनों में बैंकिंग रेगुलेशंस, आईपीसी, आईटी क़ानून शामिल हैं.
तेलंगाना की साइबराबाद पुलिस इसकी जाँच कर रही है. अब तक वे दर्जनों लोगों की पूछताछ कर चुके हैं.
पुलिस ने आंध्र प्रदेश में भी मामले दर्ज किए हैं. आंध्र प्रदेश की पुलिस ने एक स्पेशल एनओसी भी जारी की है.
चीन की भूमिका
इस बारे में चीज़ें स्पष्ट होना अभी बाक़ी है कि इन एप्स में चीनी संस्थानों की क्या भूमिका है.
कुछ लोगों का कहना है कि लोग चीन में मौजूद सर्वर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन कुछ लोगों का यहां तक कहना है कि इन एप्स में पैसा भी चीनी वित्तीय संस्थान लगा रहे हैं.
पुलिस इसकी जाँच कर रही है. 25 दिसंबर को साइबराबाद पुलिस ने एक चीनी नागरिक समेत चार लोगों को लोन देने वाले एप्स के ख़िलाफ़ मामले में गिरफ़्तार किया है.
साइबराबाद पुलिस ने जानकारी दी है कि उन्होंने क्यूबवो टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड के हेड को अरेस्ट किया है जो कि एक चीनी नागरिक है. इसके अलावा तीन अन्य लोगों को भी अरेस्ट किया गया है.
इस ऑर्गनाइजेशन को दिल्ली में हेड ऑफ़िस के तौर पर रजिस्टर्ड किया गया है और इसका नाम स्काईलाइन इनोवेशंस टेक्नोलॉजीज रखा गया था.
इस कंपनी में जिक्सिया झेंग, उमापति (अजय) डायरेक्टर के तौर पर काम कर रहे थे.
इस कंपनी ने 11 लोन एप्स डिवेलप किए हैं. यह कंपनी बड़े पैमाने पर पैसे वसूल रही है और इसके काम करने के तरीक़ों में धमकियां देना शामिल रहा है. मौजूदा वक़्त में कंपनी के प्रतिनिधि पुलिस कस्टडी में हैं.
आरबीआई का क्या कहता है?
रिज़र्व बैंक में रजिस्टर्ड बैंक्स और राज्यों के क़ानूनों के हिसाब से काम करने वाले ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान (एनबीएफ़सी) ही केवल लोन दे सकते हैं.
इसी वजह से लोन देने वाले मोबाइल एप्स के बैकग्राउंड वेरिफिकेशन को किया जाना चाहिए.
आपको किसी भी अनधिकृत एप्स या अपरिचित लोगों को अपने आईडी दस्तावेज़ नहीं देने चाहिए.
आपको ऐसे एप्स के बारे में पुलिस या सैचेट.आरबीआई.ऑर्ग.इन पर शिकायत करनी चाहिए.
आरबीआई ने एक विज्ञापन जारी किया है जिसमें कहा गया है कि आरबीआई के यहां रजिस्टर्ड कोई संस्थान अगर ऑनलाइन लोन दे रहा है तो यह चीज़ पहले ही स्पष्ट रूप से बताई जानी चाहिए.
इसी तरह से आरबीआई के यहां रजिस्टर्ड वित्तीय संस्थानों के नाम आरबीआई की वेबसाइट पर भी उपलब्ध होंगे.
जानकार क्या कहते हैं?
फिन टेक कंपनियों (फाइनेंस और टेक्नोलॉजी के मेल) को लेकर बड़े पैमाने पर चिंताएं पैदा हो रही हैं.
आरबीआई इनसे निबटने की तैयारी कर रहा है. महज़ इस वजह से कि आपको चुटकियों में क़र्ज़ मिल जाता है, इस तरह की कंपनियों से लोन लेना ठीक नहीं है.
अब हालात इतने ख़राब हो गए हैं कि न केवल कंपनियों ने बल्कि लोगों ने भी समूह बना लिए हैं और वे इस तरह के एप्स के ज़रिए लोन बांट रहे हैं.
क्लाउड फंडिंग लोनः इसका मतलब यह है कि अगर आपके पास एक हज़ार रुपये हैं तो आप भी लोन बांट सकते हैं.
जब क्रेडिट कार्ड कंपनियों की शुरुआत हुई थी तब भी ऐसी ही समस्याएं सामने आई थीं.
फाइनेंस एक्सपर्ट कुंडावारापू नागेंद्र साईं ने बीबीसी को बताया कि अगर कोई लोन बांट रहा है तो इसका यह मतलब क़त्तई नहीं है कि हम उससे लोन ले लें.
अगर किसी को पैसों की ज़रूरत पड़ती भी है तो उसे भरोसेमंद बैंक, सरकारी और निजी बैंकों और दूसरे आरबीआई से मान्यता प्राप्त वित्तीय संस्थानों के पास लोन के लिए जाना चाहिए.
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