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क्‍या राहुल के कॅरिअर को संवार पाएंगी सोनिया गांधी

Sonia Gandhi to face the toughest challenge of her life
नई दिल्‍ली। यूपीए अध्‍यक्ष सोनिया गांधी का आज जन्‍म दिन है लेकिन इसे लेकर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में कोई उत्‍साह नहीं है क्‍योंकि कल आये विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अब तक का सबसे खराब जनमत मिला है। अगर इन्‍हीं आंकड़ों को आधार मानें तो पार्टी का भविष्‍य अब संकट में नजर आ रहा है। 67 वर्ष की सोनिया के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह कैसे कांग्रेस के भविष्‍य और राहुल गांधी को कॅरिअर को संवारती है। यूपीए की अध्‍यक्ष होने के नाते उन पर यह सबसे बड़ी जिम्‍मेदारी आ गयी है।

खुद को साबित करने की चुनौती

विधानसभा के परिणामों में जिस तरह से कांग्रेस की स्थिति दिखती है, उससे तो यही लगता है कि अब पहले जैसे हालात नहीं रहे। एक तो देश भर में कांग्रेस के खिलाफ माहौल है, दूसरे अब एनडीए भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में बेहद मजबूत होकर उभरा है। इसके अलावा दिल्‍ली में 'आम आदमी पार्टी' को जैसा जनादेश मिला है, उससे नेतृत्‍व संकट से जूझ रही कांग्रेस के सामने खुद को साबित करने और जनता का विश्‍वास जीतने की चुनौती है। खास बात है कि 'आप' के रूप में शहरी मतदाताओं को एक नया विकल्‍प मिलने की संभावना ने कांग्रेस के रास्‍ते को और भी कठिन बना दिया है। अब पार्टी का कैडर सोनिया और राहुल की तरफ उम्‍मीद से देख रहा है कि वह पार्टी को फिर से जनता के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए क्‍या करते है?

राज्‍य स्‍तर पर नेतृत्‍व संकट

कांग्रेस के सामने एक मुश्किल नेतृत्‍व की भी है। भले ही भाजपा मोदी के नेतृत्‍व में चुनाव लड़ रही हो लेकिन राज्‍यों में उसके पास शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे और रमन सिंह जैसे नेता है लेकिन कांग्रेस के पास राज्‍य स्‍तर पर ऐसे नेता न होने से पार्टी का जनाधार खिसकता जा रहा है, वहीं विकास के सबसे चर्चित चेहरे शीला दीक्षित के चुनाव में हारने से अब कांग्रेस को राज्‍य स्‍तर पर मजबूत करने के लिए अनथक प्रयासों की जरूरत है। कुछ प्रमुख राज्‍यों जैसे बिहार और उत्‍तर प्रदेश में पार्टी पिछले दो दशकों से ही जनाधार की तलाश में है।

कल अपने बयान में राहुल गांधी का कहना था कि हम हार के कारणों पर विचार करेंगे और फिर से बदलाव के साथ वापस आएंगे। राहुल ने अब बुजुर्ग नेताओं की जगह युवाओं पर भरोसा दिखाया है, पर सच तो यह है कि सिर्फ उम्र के आधार पर नेताओं को दरकिनार करना किसी के गले नहीं उतर रहा है। यह भी एक सच है कि कांग्रेस के अनिश्चित भविष्‍य के साथ ही अब राहुल गांधी का राजनीतिक करिअर भंवर में फंस गया है, जहां से निकलना सोनिया और राहुल के लिए बिल्‍कुल आसान नहीं होगा।

काम नहीं आयी कल्‍याणकारी योजनाएं

कांग्रेस द्वारा खाद्य सुरक्षा बिल और भूमि अधिग्रहण बिल भी मतदाताओं में कांग्रेस के प्रति कोई लगाव नहीं पैदा कर सका। पहले ही यूपीए टू महंगाई, भ्रष्‍टाचार, रूपये का अवमूल्‍यन और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मुश्किल झेल रही है जिससे कि राजस्‍थान और दिल्‍ली में दो सबसे ताकतवर मुख्‍यमंत्री भी कांग्रेस के टूटते किले को बचा नहीं सके।

क्‍या सोनिया खुद करेंगी नेतृत्‍व

यूपीए टू के शासनकाल के खत्‍म होने में अब कुछ ही समय बाकी है तो क्‍या अब सोनिया गांधी खुद बागडोर संभालेंगी या फिर राहुल गांधी ही नेतृत्‍व करेंगे। हालांकि सोनिया ने कह दिया है कि उनकी पार्टी की तरफ से कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के प्रत्‍याशी की घोषणा जल्‍द ही की जाएगी लेकिन वो कौन होगा, इस पर कांग्रेस का भी भविष्‍य टिका हुआ है।

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