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स्मिता पाटिल: छोटी उम्र लंबा फ़िल्मी सफ़र

रेहान फ़ज़ल

बीबीसी संवाददाता

(बीबीसी ने नई साप्ताहिक सिरीज़ शुरू की है 'छोटी उम्र बड़ी ज़िंदगी' जिसमें उन लोगों की कहानी बताई जा रही है, जिन्होंने दुनिया में नाम तो बहुत कमाया, लेकिन 40 साल से पहले इस दुनिया को अलविदा कह दिया. पांचवीं कड़ी में पढ़िए प्रतिभाशाली अभिनेत्री स्मिता पाटिल की कहानी)

जब 2015 में स्मिता पाटिल के 88 वर्षीय पिता शिवाजीराव गिरिधर पाटिल राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म भूषण लेने आए तो उनकी आँखें नम हो गईं थीं.

Smita Patil: A long film journey from a young age

ये पाटिल परिवार के लिए एक बड़ा दिन था. 28 साल पहले उनकी बेटी स्मिता पाटिल को भी इसी तरह राष्ट्रपति भवन में भारत के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया गया था.

शिवाजी राव एक स्वतंत्रता सेनानी थे तो 15 साल की उम्र में जेल चले गए थे.

आज़ादी के बाद वो प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए थे. सन 1964 में वो कांग्रेस पार्टी के सदस्य बन गए थे.

उन्हें महाराष्ट्र का बिजली और सिंचाई मंत्री बनाया गया था. उनकी पत्नी विद्याताई पाटिल महाराष्ट्र की जानीमानी समाज सेविका थीं.

'स्मिता पाटिल कुछ वक़्त और जीतीं तो कई बेहतरीन फ़िल्में दे जातीं'

दूरदर्शन में मराठी समाचार वाचिका थीं स्मिता पाटिल

स्मिता पाटिल का जन्म 17 अक्तूबर, 1955 को हुआ था. वो मराठी माध्यम के स्कूलों मे पढ़ी थीं. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वो बंबई दूरदर्शन पर मराठी में समाचार पढ़ने लगी थीं.

इसकी भी एक कहानी है. मैथिली राव स्मिता पाटिल की जीवनी 'स्मिता पाटिल अ ब्रीफ़ इनकैनडिसेंस’ में लिखती हैं, 'स्मिता की एक दोस्त ज्योत्सना किरपेकर बंबई दूरदर्शन पर समाचार पढ़ा करती थीं. उनके पति दीपक किरपेकर एक फ़ोटोग्राफ़र थे. वो अक्सर स्मिता की तस्वीरें खींचा करते थे.

एक बार वो उनकी तस्वीरें लेकर ज्योत्स्ना से मिलने दूरदर्शन केंद्र गए. गेट में घुसने से पहले वो उन तस्वीरों को ज़मीन पर रखकर व्यवस्थित कर रहे थे.

तभी वहाँ से बंबई दूरदर्शन के निदेशक पी वी कृष्मामूर्ति गुज़रे. उन तस्वीरों को देख कर उन्होंने पूछा कि ये किसकी तस्वीरें हैं? जब दीपक ने उन्हें स्मिता के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि वो उनसे मिलना चाहते हैं.’

'अब भी जोश है श्याम बेनेगल में'

श्याम बेनेगल और देवानंद ने दूरदर्शन पर ही देख कर उन्हें रोल देने का बनाया था मन

मैथिली राव आगे लिखती हैं, ''जब दीपक ने स्मिता को इस बारे में बताया तो वो दूरदर्शन जाने के लिए तैयार नहीं हुईं. दीपक के बहुत मनाने पर वो उनके स्कूटर के पीछे बैठकर दूरदर्शन गईं. वहाँ ऑडिशन में जब उनसे अपनी पसंद की कोई चीज़ सुनाने के लिए कहा गया तो उन्होंने बाँग्लादेश का राष्ट्र गान 'आमार शोनार बाँगला’ सुनाया''

''उन्हें चुन लिया गया और वो बंबई दूरदर्शन पर मराठी में समाचार पढ़ने लगीं. उस ज़माने में ब्लैक एंड वाइट टेलिविजन हुआ करता था. ''

''स्मिता की बड़ी बिंदी, लंबी गर्दन और बैठी हुई आवाज़ ने सबका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया. उस दिनों स्मिता के पास हैंडलूम साड़ियों का बेहतरीन संग्रह हुआ करता था.''

''दिलचस्प बात ये थी कि वो समाचार पढ़ने से कुछ मिनटों पहले अपनी जींस पर ही साड़ी बाँध लेती थीं.’ बहुत से लोग जो मराठी बोलना नहीं जानते थे, शाम को दूरदर्शन का मराठी का समाचार सुना करते थे ताकि वो शब्दों का सही उच्चारण करना सीख सकें.''

''श्याम बेनेगल ने पहली बार स्मिता को टेलिविजन पर ही देखा था और उनके मन में उन्हें अपनी फ़िल्म में लेने की बात आई थी.''

''मनोज कुमार और देवानंद भी उन्हें अपनी फ़िल्म में लेना चाहते थे. देवानंद ने बाद में उन्हें अपनी फ़िल्म 'आनंद और आनंद’ में लिया भी. विनोद खन्ना स्मिता पाटिल से इतने प्रभावित थे कि बंबई में कहीं भी हों वो उनका समाचार सुनने के लिए नियम से अपने घर पहुँच जाते थे.''

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श्याम बेनेगल ने चुना था स्मिता को फ़िल्म 'निशांत’ के लिए

स्मिता पाटिल ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत अरुण कोपकर की एक डिप्लोमा फ़िल्म से की थी. उन दिनों श्याम बेनेगल अपनी फ़िल्म 'निशांत’ के लिए एक नए चेहरे की तलाश में थे.

उनके साउंड रिकॉर्डिस्ट हितेंदर घोष ने उसने स्मिता पाटिल की सिफ़ारिश की.

बेनेगल ने स्मिता का ऑडिशन लिया. उन्हें चुन लिया गया लेकिन बेनेगल ने उन्हें सबसे पहले अपनी फ़िल्म 'चरणदास चोर’ में 'प्रिंसेस’ का रोल दिया.

छत्तीसगढ़ मे 'चरणदास चोर’ की शूटिंग के दौरान बेनेगल को स्मिता की असली प्रतिभा का पता चला. उन्होंने उन्हें 'निशांत’ में रोल देने का फ़ैसला किया.

स्मिता के अभिनय की ख़ासियत थी किसी भी रोल में अपने आपको पूरी तरह से ढ़ाल लेना. राजकोट के पास 'मंथन’ की शूटिंग के दौरान वो गाँव की औरतों के साथ उन्हीं के कपड़े पहने बैठी हुई थीं.

तभी वहाँ कालेज के कुछ छात्र फ़िल्म की शूटिंग देखने आए. उन्होंने पूछा कि फ़िल्म की हीरोइन कहाँ है ?

जब किसी ने गांव की महिलाओं के पास बैठी हुई स्मिता पाटिल की तरफ़ इशारा किया तो उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ कि किसी फ़िल्म की हीरोइन इतनी सहजता से गाँव वालों के साथ कैसे बैठ सकती है.

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छोटे बजट की समानांतर फ़िल्मों के साथ कॉमर्शियल फ़िल्में भी

स्मिता पाटिल ने भूमिका, मंथन, अर्थ, मंडी, गमन और निशांत जैसी कई समानाँतर फ़िल्में तो की हीं, बड़े बजट की फ़ार्मूला फ़िल्मों जैसे 'शक्ति’और 'नमकहलाल’ में भी उन्होंने अपना हाथ आज़माया.

मंथन फ़िल्म में उन्होंने गाँव की एक महिला की भूमिका निभाई जो पहले तो मिल्क कोऑपरेटिव का विरोध करती है लेकिन फिर उसका हिस्सा हो जाती है.

'भूमिका’ फ़िल्म में उन्होंने बाग़ी मराठी अभिनेत्री हंसा वाडकर का रोल निभाया जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.

केतन मेहता की मराठी फ़िल्म 'भवनी भवाई’ में उन्होंने मुखर जनजातीय महिला की भूमिका निभाई. जब्बार पटेल की मराठी फ़िल्म 'अंबरथा’ में जिसे बाद में 'सुबह’ नाम से हिंदी में भी बनाया गया स्मिता ने एक ऐसी महिला का रोल किया जो अपने पति के दूसरी स्त्री के साथ संबंधों का पता चलने पर उसका घर छोड़ देती है.

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अपने कंधे पर पूरी फ़िल्म को उठाए रखने का दम

उस समय में हिंदी फ़िल्मों में हीरो का बोलबाला था, स्मिता ने पूरी फ़िल्म अपने कंधे पर उठा कर दिखाई.

स्मिता की दोस्त और जानीमानी पत्रकार कुमकुम चड्ढा अपनी किताब 'द मैरीगोल्ड स्टोरी’ में लिखती हैं, ''स्मिता शुरू से ही छोटे बजट की समानांतर फ़िल्में करती थीं.

''लेकिन जब छोटे बजट वाले निर्देशकों ने बड़े नामों के पीछे दौड़ना शुरू कर दिया तो स्मिता ने भी बड़े बजट के फ़िल्मों की तरफ़ अपना रुख़ किया. उन्होंने मन ही मन अपने से वादा किया कि अगर वो बड़े नाम चाहते हैं तो मैं भी बड़ा नाम बनकर दिखाऊंगी.''

जब उन्होंने 'नमकहलाल’ फ़िल्म में बारिश में भीगते हुए सेक्सी डाXस शूट किया तो शॉट के बाद वो रो पड़ीं. इसलिए नहीं कि वो डांस एक कमर्शियल फ़िल्म का हिस्सा था बल्कि इसलिए कि वो एक अभिनेत्री के रूप में अब तक दुनिया को जो दिखाती आईं थीं वो उसके ठीक विपरीत था.’

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कई क्षेत्रीय भाषाओं की फ़िल्मों में काम

स्मिता पाटिल ने मृणाल सेन की फ़िल्म 'अकालेर सॉन्धाने ने’ में एक हिंदी अभिनेत्री का रोल किया. केतन मेहता की गुजराती फ़िल्म 'भवनी भवई’ मे भी उनके रोल की तारीफ़ हुई.

कुमकुम चड्ढ़ा लिखती हैं, "’जेत रे जेत’ फ़िल्म की शूटिंग के दौरान स्मिता पाटिल की वास्तविक सिनेमा के प्रति प्रतिबद्धता का एक नमूना देखने को मिला. फ़िल्म में काम करने वाले सभी लोग पुणे के पास रायगढ़ ज़िले की एक जगह ठाकरवाड़ी में रुके हुए थे.

स्मिता वहाँ रुक कर न सिर्फ़ गांव की महिलाओं के साथ सोईं और खाना खाया बल्कि पास के पहाड़ी तालाब मे जा कर स्थानीय स्त्रियों के साथ स्नान भी किया."

"जब उन्होंने एक मलयालम फ़िल्म चिदंबरम में एक तमिल महिला की भूमिका निभाई तो उस फ़िल्म के निर्देशक जी अरविंदन ने उनसे अनुरोध किया कि वो इस फ़िल्म के लिए रिहर्सल न कर सीधे शॉट दें. तमिल न जानते हुए भी उन्होंने निर्देशक के इस अनुरोध को मान लिया."

अपने 12 साल के फ़िल्मी करियर में स्मिता ने वो सब हासिल किया जो चोटी के अभिनेता अपने पूरे फ़िल्मी जीवन मे हासिल नहीं कर पाते.

स्मिता में हास्य क्षमता भी थी: शबाना आज़मी

शबाना आज़मी के साथ प्रतिस्पर्द्धा

पाटिल और शबाना आज़मी ने एक साथ कई फ़िल्मों में काम किया जिसमें महेश भट्ट की 'अर्थ’ और श्याम बेनेगल की 'मंडी’ शामिल है.

शबाना ने स्मिता के प्रति कभी गर्मजोशी का भाव नहीं दिखाया हालांकि स्मिता के माता-पिता और बहनों से उनकी बहुत नज़दीकी थी.

शबाना ने एक जगह स्वीकार किया कि स्मिता का अभिनय उन्हें परेशान कर देता था लेकिन करीब न होते हुए भी दोनों के अंदर एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव था.

स्मिता की असमय मृत्यु से शबाना को बहुत धक्का पहुंचा था.

तब उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि सिर्फ़ स्मिता में ही उनसे यानि शबाना से अपना सर्वश्रेष्ठ निकलवा पाने की क्षमता थी.

मैथिली राव लिखती हैं, "शबाना ने स्वीकार किया था कि उन्हें 'मंडी’ के सेट पर स्मिता के थोड़ा नज़दीक आने का मौका मिला था. दोनों को अपने होटल से शूटिंग स्थल पर पहुंतने के लिए एक एक कार दी गई थी. ये जगह उनके होटल से दो घंटे की दूरी पर थी. लेकिन एक दिन के बाद दोनों ने अपनी कार छोड़ यूनिट के दूसरे सदस्यों के साथ बस पर लोकेशन पर जाना शुरू किया. ''

''रास्ते में सभी लोग हँसते गाते और अंताक्षरी खेलते हुए जाते थे. वहीं शबाना को पता चला कि चुपचाप रहने वाली स्मिता पाटिल असल में 'टॉमबॉय’ हैं. वो मर्दों के साथ वॉलीबॉल खेलती थीं जो शबाना के बस की बात नहीं थी."

शबाना पाटिल और स्मिता आज़मी !

'अर्थ’ फ़िल्म में शबाना आज़मी के आमने-सामने

अर्थ’ फ़िल्म में महेश भट्ट ने स्मिता पाटिल और शबाना आज़मी दोनों को साइन कर एक तरह का 'कास्टिंग कू’किया था. महेश भट्ट् की शुरुआती फ़िल्में आत्मकथात्मक होती थीं.

'अर्थ’ में उन्होंने अपनी शादी टूटने की कहानी और मानसिक रूप से अस्थिर परवीन बाबी के साथ अपने संबंधों को दिखाने की कोशिश की थी.

मैथिली राव लिखती हैं, "अगर आपमें अपने अभिनय के प्रति आत्मविश्वास हो तभी आप 'दूसरी औरत’ और घर तोड़ने वाले की भूमिका निभाने के लिए तैयार हो सकती हैं, ये जानते हुए भी कि शबाना के रोल को लेखक का समर्थन मिला हुआ है और एक महिला के साथ जिसके साथ ज़्यादती हुई है सारे देश की महिलाएं अपनेआप को जोड़ कर देखेंगी और स्मिता के साथ बहुत कम लोगों की सहानुभूति होगी."

महेश भट्ट को भारत की इन बेहतरीन अभिनेत्रियों की प्रतिस्पर्धा के बारे में पता था और वो अंदर ही अंदर अपने तरीके से इन दोनों से एक दूसरे से बेहतर अभिनय करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे. शबाना को 'अर्थ’ में निभाई अपनी भूमिका के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला लेकिन महेश भट्ट ने स्वीकार किया कि 'अगर आप फ़िल्म से स्मिता को हटा दें तो फ़िल्म में कुछ बचता ही नहीं. मुझे इस फ़िल्म में इन दोनों महिलाओं के अभिनय पर गर्व है.’

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राज बब्बर से प्यार

स्मिता पाटिल को अपने सह भिनेता राज बब्बर से प्यार हो गया. वो शादीशुदा थे और दो बच्चों के बाप थे. स्मिता पर राज और नादिरा बब्बर का घर तोड़ने का आरोप लगा.

अंग्रेज़ी पत्रिका 'फ़ेमिना’ की संपादक विमला पाटील ने स्मिता को खुला पत्र लिख कर राज बब्बर से अपने संबंधों को ख़त्म करने के लिए कहा. यहाँ तक कि स्मिता को बहुत चाहने वाली उनकी माँ विद्या भी बब्बर के साथ उनके संबंधों के ख़िलाफ़ थीं लेकिन स्मिता ने उनकी भी एक न सुनी.

दोनों ने कलकत्ता (अब कोलकाता) के एक मंदिर में विवाह कर लिया और इस शादी को उनके बेटे प्रतीक के पैदा होने तक बाहरी दुनिया से गुप्त रखा. उनके दोस्तों ने सवाल किया कि बुद्धिजीवी स्मिता पाटिल ने पहले से शादीशुदा राज बब्बर से संबंध बनाने के बारे में कैसे सोचा ?

कुमकुम चड्ढ़ा लिखती हैं, 'मैंने भी एक बार झिझकते हुए ये सवाल स्मिता पाटिल से पूछा था. उनका कहना था मैं बब्बर की संवेदनशीलता के कारण उनकी तरफ़ आकृष्ट हुई थी. ये एक ऐसा गुण हैं फ़िल्मी लोगों में तो बिल्कुल नहीं पाया जाता है.’

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समय से पहले मृत्यु

28 नवंबर, 1986 को उनके बेटे प्रतीक का जन्म हुआ. उसके बाद वो घर आ गईं. उनको बुख़ार रहने लगा और उनकी तबियत बिगड़ती चली गई. वो दोबारा अस्पताल जाने के लिए तैयार नहीं थीं. उस समय राज बब्बर एक चैरिटी शो 'होप 86’ करने में व्यस्त थे. आख़िरकार दो व्यक्तियों ने जिसमें उनके पति भी शामिल थे उनको सीढ़ियों से ज़बरदस्ती उतारकर जसलोक अस्पताल में भर्ती कराया. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

उनकी बहन का मानना था कि बेटे को जन्म देने के बाद उनका स्वास्थ्य गिरता चला गया. उनको वायरल इंफ़ेक्शन हो गया. कुछ ने कहा वो मेनेंजाइटिस की चपेट में आ गईं. एक एक कर उनके सभी अंगों ने काम करना बंद कर दिया और 13 दिसंबर, 1986 को स्मिता पाटिल ने दम तोड़ दिया. उस समय उनकी उम्र थी मात्र 31 वर्ष.

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ज़मीन से जुड़ी हुईं महिला

स्मिता पाटिल एक संवेदनशील, भावुक और दयालु महिला थीं. उनकी बहन उनके लिए 'आज़ाद पक्षी’ शब्द का इस्तेमाल करती थीं. उनको गाड़ी चलाने का बहुत शौक था. वो अक्सर अपने ड्राइवर को पीछे बैठा कर स्टेरिंग सँभाल लेती थीं.

अनीता बताती हैं, "वो गाड़ी तेज़ चलाती थीं. एक बार उन्हें सेना की गाड़ी 'जोंगा’ चलाने का शौक चर्राया. उनके एक दोस्त दिलशाद ने किस तरह एक जोंगा का इंतेज़ाम किया. वो दोनों दिल्ली से बंबई उस जोंगा को चला कर लाए.

''स्मिता ने मुझसे वादा ले लिया कि वो जब तक बंबई नहीं पहुंच जाती इस बारे में उनकी माँ को नहीं बताएंगी. जब तक वो बंबई नहीं पहुंची मैं बहुत घबराई रही. उनको मोटर साइकिल चलाने का भी बहुत शौक था."

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स्मिता पाटिल की दरियादिली

स्मिता को दूसरों की मदद करने का भी शौक था.

अनीता एक किस्सा बताती हैं, "एक बार वो स्टूडियो जा रही थीं. तभी एक अजनबी ने उसने आकर कहा कि वो बहुत मुसीबत में है. आप मेरी मदद कीजिए.''

'' स्मिता ने उसके पर्स में जितने पैसे थे निकाल कर उस शख़्स को दे दिए जब कि वो उस शख़्स को जानती तक नहीं थीं. जब थोड़ी देर बाद वो अपनी कार में पेट्रोल भरवाने गईं तो उनके पर्स में एक रुपया भी नहीं था.''

''उनको पेट्रोल के लिए अपने ड्राइवर से पैसे उधार लेने पड़े. राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने पर उन्हें जो धनराशि मिली थी उसे उन्होंने एक धर्मार्थ संस्था को दान कर दिया था."

स्मिता की वजह से आया फ़िल्मों में: नाना

'स्मिता के पास छठी इंद्री थी'

उनकी मृत्यु के बाद अमिताभ बच्चन ने 'लहरें’ को एक इंटरव्यू दिया था जिसमें उन्होंने बताया था कि स्मिता के पास छठी इंद्री थी. अमिताभ बच्चन ने कहा था, 'मैं बंगलौर में 'कुली’ फ़िल्म की शूटिंग कर रहा था और वहाँ के वेस्ट एंड होटल में ठहरा हुआ था. स्मिता से मेरी सेट पर ही थोड़ी बहुत जानपहचान हुई थी.

एक रात करीब 1 बजे मेरे पास उनका फोन आया.

उन्होंने कहा, "अमितजी मैं इस समय आपको डिस्टर्ब कर बहुत दुखी हूं. मैं ये जानना चाहती थी कि आप ठीक तो हैं. मैंने कहा मैं बिल्कुल ठीक हूँ. तब स्मिता ने बताया कि उन्होंने मेरे बारे में एक बहुत बुरा सपना देखा है. अगले दिन ही मेरे साथ एक दुर्घटना हो गई जिसमें मैं मरते मरते बचा. मैं दो तीन महीने तक आईसीयू में रहा जहाँ वो मुझे अक्सर देखने आती थीं."

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