सिद्दारमैया की कुर्सी कबतक बचा सकेगी कांग्रेस? कर्नाटक में 14 साल पहले बीजेपी के सामने भी खड़ा हुआ था यह संकट

Karnataka Politics: कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के खिलाफ मैसूर अर्बन एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MUDA) में कथित जमीन घोटाले में मुकदमा चलाने की मंजूरी से कांग्रेस सरकार पर पहले से मंडरा रहे संकटों की गंभीरता और बढ़ गई है। राज्य में 14 साल पहले बीजेपी के सामने भी ऐसी ही स्थिति आई थी और आखिरकार तत्कालीन सीएम येदियुरप्पा को कुर्सी गंवानी पड़ गई थी।

कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मूडा जमीन घोटाले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहित की धारा 218 के तहत प्रदेश के सीएम सिद्दारमैया के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी है।

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मैसूर जमीन घोटाले में सीएम पर केस चलाने की अनुमति
कर्नाटक में विपक्षी बीजेपी का दावा है कि मूडा घोटाला करीब 3,000 से 4,000 करोड़ रुपए के बीच का है। राज्यपाल से सीएम के खिलाफ यह शिकायत ऐक्टिविस्ट प्रदीप कुमार एसपी, टीजे अब्राहम और स्न्हेमयी कृष्णा ने की थी। इसपर गवर्नर ने मुख्यमंत्री को 26 जुलाई को कारण बताओ नोटिस देकर 7 दिनों में जवाब देने को कहा था।

राज्यपाल बीजेपी की कठपुतली की तरह काम कर रहे- सिद्दारमैया
हालांकि, मुख्यमंत्री ने मंत्रिपरिषद की बैठक बुलाकर राज्यपाल के कारण बताओ नोटिस का जवाब देने की जगह न सिर्फ इसकी आलोचना की, बल्कि उन्हें हटाए जाने तक की मांग कर दी थी। अब जब राज्यपाल ने उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मंजूरी दे दी है तो सिद्दारमैया राजभवन का राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप लगा रहे हैं।

उन्होंने आरोप लगाया है, 'गवर्नर केंद्र की कठपुतली की तरह काम कर रहे हैं। हमें ऐसी ही उम्मीद थी। गवर्नर ने 26 जुलाई को मुझे कारण-बताओ नोटिस जारी कर दिया, जिस दिन उन्हें याचिका मिली थी। इसका मतलब क्या है?'

14 साल पहले राज्यपाल ने येदियुरप्पा पर केस चलाने की दी थी मंजूरी
लेकिन, अगर हम 14 साल पहले कर्नाटक की राजनीति के इतिहास को टटोलें तो सिद्दारमैया उसी जगह खड़े थे, जहां आज भाजपा और जेडीएस के नेता खड़े हैं। दिसंबर 2010 में कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में ही मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी।

येदियुरप्पा से इस्तीफा मांगने में सबसे आगे थे सिद्दारमैया
तब केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार थी और राज्य में कांग्रेस विरोध में थी। तब गवर्नर से मुकदमा चलाने की इजाजत मिलने के बाद येदियुरप्पा से इस्तीफा मांगने वालों में सिद्दारमैया सबसे आगे थे। तब जेडीएस और कांग्रेस विपक्ष में थी और दोनों ही राज्यपाल के फैसले का समर्थन कर रहे थे।

येदियुरप्पा राज्य में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री थे। गवर्नर से उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति मिलने के बाद पार्टी बहुत ज्यादा राजनीतिक दबाव में थी। येदियुरप्पा कुर्सी छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। लेकिन, इसी दौरान तत्कालीन लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने खनन घोटाले में उनपर मुकदमा शुरू किया तो उन्हें आखिरकार कुर्सी छोड़नी ही पड़ी। हालांकि, 2016 में येदियुरप्पा को क्लीनचिट भी मिल गई।

मौजूदा मुख्यमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में मुकदमा चलाने की राजभवन से अनुमति मिलने के बाद पैदा हुई राजनीतिक परिस्थितियों का सामना तमिलनाडु और बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्रियों को भी करनी पड़ी थी। तमिलनाडु की पूर्व सीएम दिवंगत जे जयललिता और बिहार के पूर्व सीएम लालू यादव के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के मामलों में राज्यपालों ने केस शुरू करने की अनुमति दी थी। दोनों ही नेताओं को आखिरकार अपनी कुर्सी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ गया था।

हाई कमान मेरे साथ है- सिद्दारमैया
फिलहाल, सिद्दारमैया यह तर्क देकर अपनी कुर्सी संभाल रहे हैं कि ' (कांग्रेस)हाई कमान मेरे साथ है, पूरी कैबिनेट और सरकार मेरे साथ है। कांग्रेस के सभी एमएलए, एमएलसी, लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य मेरे साथ हैं....मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है कि इस्तीफा दूं।'

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