सूटकेस, फार्महाउस और संसद सौदा! जब सरकार बचाने के बदले मिली थी घूस, शिबू सोरेन की विरासत का सबसे काला अध्याय
Shibu Soren bribery scandal: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक नेता शिबू सोरेन का दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में 81 वर्ष की उम्र में निधन (shibu soren death) हो गया। किडनी संबंधी बीमारी से जूझ रहे सोरेन पिछले एक महीने से अस्पताल में भर्ती थे। उनके निधन की खबर से पूरे झारखंड में शोक की लहर दौड़ गई है। झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन, इस दौरान अस्पताल में मौजूद थे। उन्होंने भावुक पोस्ट में लिखा, 'आज मैं शून्य हो गया हूं...'
हालांकि, शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर जितना प्रेरणादायक रहा, उतना ही विवादों से भी घिरा रहा। शिबू सोरेन का नाम भारतीय राजनीति के सबसे बड़े भ्रष्टाचार मामलों में से एक, 1993 के 'सांसद घूसकांड' से भी जुड़ा रहा है। यह वह घोटाला था जिसने संसद की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए थे और भारतीय लोकतंत्र को झकझोर कर रख दिया था। इस रिपोर्ट में हम शिबू सोरेन के उस विवादित अध्याय पर विस्तार से नज़र डालते हैं।

1993 का संसद घूसकांड: शिबू सोरेन ने बचाई गई नरसिम्हा राव सरकार
1991 के आम चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में सरकार बनी। लेकिन जुलाई 1993 में जब सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया, तो केंद्र की अल्पमत सरकार गिरने की कगार पर थी। उस समय झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के चार सांसदों शिबू सोरेन, शैलेंद्र महतो, सूरज मंडल और साइमन मरांडी पर आरोप लगे कि उन्होंने घूस लेकर नरसिम्हा राव सरकार के पक्ष में वोट किया।
सीबीआई जांच में खुलासा हुआ कि कांग्रेस नेता बूटा सिंह ने इन सांसदों को घूस देने की व्यवस्था की और फार्महाउस में पार्टी कर उन्हें नोटों से भरे सूटकेस सौंपे गए। शैलेंद्र महतो ने खुद अटल बिहारी वाजपेयी के सामने संसद में यह स्वीकार किया कि उन्हें 50-50 लाख रुपये की घूस दी गई थी।
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सीबीआई चार्जशीट और पैसों का लेनदेन
सीबीआई की चार्जशीट के अनुसार, मारुति जिप्सी में सूटकेस भरकर पैसे लाए गए थे और सूरज मंडल, शिबू सोरेन समेत अन्य सांसदों के घर पहुंचाए गए। पीएनबी के दिल्ली स्थित सरोजिनी नगर ब्रांच में अलग-अलग खातों में पैसे डाले गए। इस रकम को 'पार्टी फंड' बताया गया और बाद में इसे अलग-अलग योजनाओं में निवेश करने, फर्जी कूपन छपवाने और ब्याज पर कर्ज देने जैसी कोशिशें की गईं ताकि उसे वैध दिखाया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला (1998)
शिबू सोरेन ने अपने खिलाफ चल रहे मुकदमे में संसद सदस्य होने का विशेषाधिकार होने की दलील दी। सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में 'पीवी नरसिम्हा राव बनाम CBI' मामले में 3:2 के बहुमत से फैसला देते हुए यह कहा कि संसद में भाषण या वोटिंग करने पर सांसदों को आपराधिक मुकदमे से छूट है। इसी के आधार पर शिबू सोरेन और अन्य सांसदों पर दर्ज केस रद्द कर दिया गया।
राजनीतिक विरासत
हालांकि, यह विवाद उनके राजनीतिक जीवन की काली छाया रहा, लेकिन शिबू सोरेन ने झारखंड की राजनीति में गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने तीन बार मुख्यमंत्री पद संभाला और आदिवासी समुदाय के लिए ऐतिहासिक संघर्ष किए। उनका जाना झारखंड की राजनीति में एक युग के अंत जैसा है। शिबू सोरेन एक जटिल लेकिन प्रभावशाली राजनीतिक शख्सियत रहे। उनके योगदान और विवाद दोनों ही आने वाले वर्षों तक झारखंड और भारतीय राजनीति में याद किए जाएंगे।
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