शीला दीक्षित : कांग्रेस की बुजुर्ग नेता सरकार बचाने में विफल

एक संकोची राजनेता के रूप में शुरुआत करने वाली शीला दीक्षित कभी भी दूसरों की जैसी नहीं रही। कांग्रेस के भीतर और बाहर की चुनौतियों को परे रखती हुई वे आगे निकलती रहीं। अंत में वे केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों के खिलाफ लोगों के गुस्से और असंतोष के कारण खुद की सरकार को बचाने में नाकामयाब रहीं।
अपने सत्ताकाल के वर्षो में शीला दीक्षित दिल्ली में कांग्रेस का सबसे जाना पहचाना चेहरा बनकर उभरी। शहर के त्वरित विकास की गति के साथ ही उनकी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ता रहा। वे करीब-करीब सभी मोर्चो पर आगे रही। यहां तक कि कानून एवं व्यवस्था जो कि उनके दायरे में नहीं आता था, उस पर भी नियंत्रण रखने का पुरजोर प्रयास किया। लेकिन दिल्ली में हाल के दिनों में दुष्कर्म की घटनाओं और असुरक्षा बढ़ते जाने के लिए लोग उनकी सरकार को जिम्मेवार ठहराते हैं।
राजीव गांधी के करीबी माने जाने वाले आईएएस अधिकारी विनोद दीक्षित की पत्नी शीला दीक्षित ने अपने स्वसुर की मदद करने के जरिए राजनीतिक प्रशिक्षण की शुरुआत की। उनके स्वसुर उमा शंकर दीक्षित उत्तर प्रदेश के कद्दावर कांग्रेसी नेता थे और इंदिरा गांधी के काबीने के सदस्य थे। पहली बार इंदिरा गांधी ने ही शीला दीक्षित को संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधिमंडल के लिए चुना था।
नेहरू-गांधी परिवार के प्रति निष्ठा ने शीला को लाभ दिया। हृदय गति रुकने से पति का निधन होने के बाद वे 1984 में उत्तर प्रदेश से लोकसभा में चुनकर आईं और राजीव गांधी सरकार में मंत्री बनाई गईं। बाद में वे प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री बनीं।
शीला दीक्षित को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की करीबी माना जाता है। गुटबाजी से आक्रांत दिल्ली में सोनिया ने मई 1998 में उन्हें अध्यक्ष बनाया और इसके छह महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में वे सत्ता पाने में कामयाब रहीं।
इसके बाद वर्ष 2003 और 2008 में उनका जादू बरकार रहा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












Click it and Unblock the Notifications