Shahu Maharaj Punyatithi: कौन थे मराठा छत्रपति शाहू महाराज, कोल्हापुर की रियासत के थे पहले महाराजा

Shahu Maharaj Punyatithi: भारत में सामाजिक लोकतंत्र की नींव रखने वाले आरक्षण के जनक छत्रपति शाहूजी महाराज आज की पुण्यतिथि है। उनका निधन 6 मई 1922 को हुआ था।

Shahu Maharaj Punyatithi 2023

Shahu Maharaj Punyatithi 2023: मराठा छत्रपति शाहू महाराज की 06 मई को पुण्यतिथी है। महाराष्ट्र के लोग इनकी पुण्यतिथी बड़े धूमधाम से मनाते हैं। मराठा छत्रपति शाहू महाराज मराठा के भोंसले राजवंश के राजा थे। शाहू महाराज को कोल्हापुर की भारतीय रियासतों का पहला महाराजा कहा जाता है। शाहू महाराज का शासन काल 1894 से 1900 तक था।

शाहू महाराज को भारत में सामाजिक लोकतंत्र की नींव रखने वाला और शोषितों और वंचितों का मसीहा कहा जाता है। शाहू महाराज को लोकतांत्रिक और सामाजिक सुधारक कहा जाता है। अपने शासन काल के दौरान शाहू महाराज ने निचली और पिछड़ी जाति के लिए कई काम किए। उन्होंने अपने शासन के दौरान जाति और पंथ के बावजूद हमेशा सभी को प्राथमिक शिक्षा दी।

शाहू महाराज का जन्म कोल्हापुर जिले के कागल गांव के घाटगे शाही मराठा परिवार में 26 जून 1874 को हुआ था। उनका जन्म से नाम यशवन्तराव घाटगे था। उनके पिता का नाम जयसिंह राव था और उनकी मां का नाम राधाबाई था। कहा जाता है कि छोटी उम्र में ही शाहू महाराज ने अपने माता-पिता को खो दिया था। राजकोट के राजकुमार कॉलेज से शाहू महाराज ने अपनी औपचारिक शिक्षा पूरी की थी।

1894 में शाहू महाराज कोल्हापुर के सिंहासन पर बैठ गए थे। इसी दौरान यशवन्तराव घाटगे का नाम छत्रपति शाहूजी महाराज रखा गया था। 1891 में शाहू महाराज ने बड़ौदा के मराठा के एक राजा की बेटी लक्ष्मीबाई खानविलाकर से शादी की थी। इनके चार बच्चे दो बेटे और दो बेटियां थे।

शाहू महाराज सामाजिक सुधारक ज्योतिराव गोविंदराव फुले से काफी प्रभावित थे। छत्रपति शाहू ने 1894 से 1922 तक, लगातार 28 सालों तक शासन किया है। इस दौरान उन्होंने कई सामाजिक सुधार किए। खासकर उन्होंने पिछड़े समुदाय और निचली जातियों के लिए कई बदलाव किए। उन्होंने सभी के लिए समान अवसर दिया।

शाहू महाराज ने ये सुनिश्चित किया कि शिक्षित छात्रों को रोजगार मिले। उन्होंने कमजोर वर्गों के लिए 50 फीसदी आरक्षण देने का भी काम किया था। इनमें से कई परोपकारी कार्यों को 26 जुलाई 1902 में प्रभावित किया गया था।

छत्रपति शाहू महाराज समाज में सभी लोगों को समान अधिकार मिलने के पक्षधर थे। उन्होंने समाज के उच्च वर्गों को किसी भी तरह का खास दर्जा देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने ब्राह्मणों को रॉयल धार्मिक सलाहकारों के पद से भी हटा दिया था।

शाहू महाराज ने महिलाओं की स्थितियों के सुधार की दिशा में भी कई काम किए हैं। उन्होंने लड़कियों के लिए अलग से स्कूल-कॉलेज की स्थापना भी की थी। उन्होंने देवदासी प्रथा पर प्रतिबंध लगाने की भी सिफारिश की थी। उन्होंने 917 में विधवा पुनर्विवाहों को वैध बनाया और बाल विवाह को रोकने के लिए कोशिश की।

शाहू महाराज का निधन 6 मई 1922 को हुआ था। अपने निधन के पहले उन्होंने अपने सबसे बड़े पुत्र राजाराम III को कोल्हापुर के महाराजा घोषित किया था।

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