SCO: मोदी जहां गए हैं, वहां का राजमा खाता है भारत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई कॉरपोरेशन ऑर्गनाइजेशन की बैठक में हिस्सा लेने के लिए किर्ग़िस्तान की राजधानी बिश्केक गए हैं.
लेकिन ये मोदी की पहली बिश्केक यात्रा नहीं है. इससे पहले वह 2015 में भी एक बार बिश्केक का दौरा कर चुके हैं.
दिल्ली से मात्र तीन घंटे की हवाई यात्रा की दूरी पर स्थित बिश्केक शहर का भारत से एक ख़ास नाता है.
प्राचीन सिल्क रूट के रास्ते में अला-टू पर्वत श्रंखला की तलहटी में स्थित इस देश से भारत राजमा के साथ सैन्य साज़ो-सामान ख़रीदता आया है.
इसके साथ ही ऐतिहासिक दृष्टि से भी इस देश और भारत के बीच गहरे संबंध रहे हैं.
बिश्केक का ऐतिहासिक पहलू
एक समय में इस शहर का नाम पिश्पेक हुआ करता था जो कि एक क़िले के नाम पर रखा गया था.
इस क़िले को प्राचीन किर्ग़िस्तानी राज्य कोकंड के राजा खानाते ने बनवाया था ताकि ताशकंद और इसिक-कुल झील के बीच स्थित कारवां मार्ग को सुरक्षित बनाया जा सके.
इसके बाद 1860 में बोल्शविक राज्य ने पिश्पेक को नष्ट करके अपनी एक नई बस्ती बनाई.
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साल 1926 में इस शहर को फ्रूंज़ के नाम से जाना जाने लगा क्योंकि एक सोवियत नेता मिखाइल फ्रूंज़ इसी शहर में 1885 में जन्मे थे.
लेकिन 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद इस शहर को एक बार फिर बिश्केक बुलाया जाने लगा.
बिश्केक की संस्कृति में दूध का एक विशेष स्थान है और इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिश्केक लकड़ी के उस तख्ते को कहा जाता था जिससे घोड़ी के दूध को घुमाकर कुमी नाम का पेय पदार्थ बनाया जाता था.
बिश्केक की भौगोलिक विरासत की बात करें तो ये एक बेहद ही प्राचीन शहर है लेकिन इसे एक समृद्ध शहर नहीं कहा जा सकता है.
कभी इस शहर को सोवियत संघ का स्विट्जरलैंड कहा जाता था और इसकी वजह इसकी ख़ूबसूरत वादियां हैं.
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प्रधानमंत्री मोदी अपने इस दौरे में अला-अरछा पहाड़ियों में बसे स्टेट कॉटेज़ में रुकेंगे जिसके आसपास बर्फ़ से लदी पहाड़ियां हैं.
शहर को देखते ही आपको सोवियत आर्किटेक्चर की याद आती है.
क्योंकि इस शहर को ग्रिड पैटर्न पर बसाया गया है जिसमें बड़े-बड़े बाग हैं और दोनों ओर पेड़ लगाए गए हैं.
इस शहर में आज भी सोवियत युग की छाप नज़र आती है लेकिन समय के साथ-साथ बिश्केक में आधुनिक इमारतें नज़र आने लगी हैं.
इस शहर में 80 देशों के लोग रहते हैं जिनमें कोरियाई, यहूदी, जर्मन, उज़्बेक, तज़ाकिस्तानी, रूसी, उइगर, तुंगन, अर्मेनियन, अज़ारी, चेचन, दागिस्तानी और यूक्रेनी लोग शामिल हैं.
स्टालिन युग के समय इन लोगों को जबरन इस शहर में बसाया गया था.
शहर में आज भी लोग रूसी भाषा बोलते हैं लेकिन अंग्रेज़ी भाषा धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने लगी है.
शहर के बीचों-बीच व्हाइट-हाउस नाम की इमारत है जिसके सामने पौराणिक राजा मानस की मूर्ति लगी हुई है.
बिश्केक में अलग-अलग तरह का खाना परोसने वाले कई रेस्तरां हैं जिनमें भारतीय, यूरोपीय, चीनी और रूसी व्यंजन परोसे जाते हैं.
हथियारों का अड्डा
द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में सोवियत संघ ने इस शहर के औद्योगिकीकरण के प्रयास किए.
साल 1940 में रूस में कार्यरत कई फैक्ट्रियों को यहां स्थापित किया गया.
इनमें से कई कंपनियां आज भी कार्यरत हैं जिनमें लेनिन वर्क्स शामिल है.
ये कंपनी हर तरह की बंदूकों के लिए गोलियों को बनाती है और भारत भी इसके ख़रीदारों में शामिल है.
भारतीय वायुसेना की ट्रेनिंग के लिहाज से ख़ास
साल 1941 में ओडेसा मिलिट्री एविएशन पायलट्स स्कूल को फ्रूंज़ में फिर से स्थापित किया गया.
इसके बाद इसका नाम 'फ्रूंज़ मिलिट्री स्कूल फॉर यूएसएसआर एयरफोर्स पायलट' का रखा गया.
इसी स्कूल ने शीत युद्ध के दौरान कई जाने-माने पायलटों को पैदा किया था.
भारत के भी कई वायुसेना अधिकारियों ने भी इसी स्कूल से ट्रेनिंग हासिल की है. इनमें एयर चीफ़ मार्शल दिलबाग़ सिंह भी शामिल हैं.
इसके साथ ही सीरिया के पूर्व राष्ट्रपति हफ़ज-अल-असद, मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक, मोज़ाम्बिक़ के पूर्व वायुसेना कमांडर अहमद हुसैन भी इसी स्कूल से पढ़े हुए हैं.
इस स्कूल को अब किर्ग़िस्तानी गणतंत्र की सशस्त्र सेनाओं के सैन्य संस्थान कहा जाने लगा है.
इस शहर के फ्रूंज एयरपोर्ट का नाम बदलकर मानस एयरपोर्ट कर दिया गया है.
इसी जगह पर अमरीका ने 2003 में अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य अभियान के लिए अपना एयर बेस बनाया था.
वहीं, रूस भी बिश्केक से मात्र 20 किलोमीटर की दूरी पर कांत में अपना एयरबेस बनाए हुए है.
बिश्केक में दूसरे अन्य सैन्य साज़ो-सामान भी बनाए जाते हैं जिनमें इलेक्ट्रिक टॉरपीडो बनाने वाली कंपनी दास्तान भी शामिल है.
भारतीय वायुसेना के दास्तान के साथ बेहतरीन संबंध हैं. क्योंकि ये कंपनी आधुनिक ऑक्सिज़न टॉरपीडो 53-65KE और इलेक्ट्रिक टॉरपीडो SET-92HK बनाती है.
हथियारों के अलावा ये शहर कपड़े, जूते और भारी इंजीनियरिंग के सामान बनाता है.
राजमा और भारत से नाता
कज़ाकस्तान और उज़्बेकिस्तान की तरह किर्ग़िस्तान में प्राकृतिक संपदा ज़्यादा नहीं है.
इस वजह से यहां की अर्थव्यवस्था एक बुरे दौर से गुज़री है. इससे पहले इस शहर ने दूसरे गणराज्यों को हाइड्रो-पावर की आपूर्ति की है.
लेकिन यह क्षेत्र कृषि उत्पादन और पशुपालन से समृद्ध है. चूय वादी में भारी मात्रा में अनाज़, फल और सब्जियां उगाई जाती हैं.
इसके साथ ही तुर्की कंपनियां यहां पर राजमा की पैदावार भी करती हैं जिसे भारत को भी निर्यात किया जाता है.
भारत ने तलास शहर में आलू के चिप्स बनाने की एक फैक्ट्री भी खोली है क्योंकि ये शहर अपने आलू उत्पादन के लिए चर्चित है.
चीन का प्रभाव
बिश्केक में बीते कुछ समय में खनन उद्योग विकसित होना शुरू हुआ है. लेकिन चीनी कंपनियां इस क्षेत्र पर हावी हैं.
यहां के स्थानीय बाज़ार पर चीनी उत्पादों की धमक साफ़ दिखाई पड़ती है जोकि शिनजियांग प्रांत से लगने वाली की सीमा से होकर आते हैं.
यहां स्थित दोरदोय बाज़ार में थोक विक्रेता चीनी सामान को दूसरे मुल्कों में निर्यात करते हैं.
बिश्केक से लगभग 220 किलोमीटर दूर प्रसिद्ध इस्सेक-कुल झील है.
यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी खारी झील है जो बर्फ से ढकी तियान-शान रेंज से घिरी है.
दशकों पहले सोवियत समाज के अभिजात्य वर्ग के लिए ये झील और इसके आसपास का क्षेत्र पर्यटन का अहम केंद्र थे.
पोलित ब्यूरो के सदस्य, वैज्ञानिक और विद्वान यहां आकर स्वास्थ्य लाभ किया करते थे.
इस झील के उत्तरी कोने पर काराकोल नाम की जगह पर उलान टॉरपीडो रेंज (यूटीआर) स्थित है जो कि नौसेना के आयुध और पनडुब्बियों का परीक्षण करने के लिए एक अद्वितीय सोवियत निर्मित फेसिलिटी है.
यहां पर किसी भी युद्ध उपकरण का परीक्षण किया जा सकता है और भारतीय नौसेना 1997 से अपने प्रोटोटाइप टारपीडो का परीक्षण कर रही है.
भारत यहां हर साल औसतन 20 परीक्षण करता है.
बिश्केक को मध्य एशिया में लोकतंत्र का आइलैंड भी कहा जाता है क्योंकि यहां के पहले राष्ट्रपति अस्कर आकेव ने 1991 में यहां लोकतंत्र के बीज बोए थे.
इंदिरा नाम का असर
इस जगह ने दो कलर रिवॉल्युशन भी देखी हैं जिनमें से 2010 में हुई ट्युलिप क्रांति शामिल है.
बिश्केक के साथ भारतीय संबंध सोवियत संघ के दिनों से चले आ रहे हैं. और कई लोगों नें मुझे बताया कि जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1950 के दशक के मध्य में फ्रूंज़ का दौरा किया था तो उसके बाद यहां पैदा हुई हजारों लड़कियों को इंदिरा नाम दिया गया. बिश्केक में अभी भी ये एक लोकप्रिय नाम है.
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सोनिया गांधी के साथ 1985 में बिश्केक का दौरा किया था और बिश्केक के मुख्य चौराहे में एक पेड़ लगाया था.
तब से दोनों देशों के संबंध काफ़ी प्रगाढ़ हो गए.
भारत मार्च 1992 में बिश्केक में अपना राष्ट्रीय झंडा तिरंगा फहराने वाले पहले राष्ट्रों में से एक था, जब वहां भारतीय मिशन की शुरुआत की गई.
साल 1995 में, प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने किर्गिज़ संसद के दोनों सदनों के संयुक्त सत्र को संबोधित किया था.
ऐतिहासिक दृष्टि से बिश्केक कभी सकस (सीथियन) की भूमि हुआ करती थी जिसका प्रभाव दूसरी शताब्दी में कुषाण काल में उत्तरी भारत तक पहुँचा.
बाद में, भारतीय व्यापारियों और समरकंद के सोग्डियन लोग बौद्ध धर्म को सिल्क रूट के रास्ते यहां ले आए.
कश्मीर के बौद्ध केंद्रों से संबंध
चुय घाटी में ग्रीको-बौद्ध धर्म, गांधार और कश्मीरी बौद्ध धर्म के पुरातात्विक अवशेष स्पष्ट रूप से पाए जाते हैं जो कि रेशम मार्ग पर स्थित है.
सुयब और नवकेत में मिले पुरातात्विक बौद्ध परिसर भारतीयों और चीनी यात्रियों को अपनी ओर खींचते हैं.
इसी तरह, तोकमक में स्थित बौद्ध स्थान (अ-बिशिम, क्रास्नाया रेक्का, नोवोपाकोवका और नोवोपावलोव्का) का संबंध कश्मीर के बौद्ध केंद्रों से था.
सूफी कनेक्शन
भारत के साथ किर्ग़िस्तान का एक और संबंध प्रसिद्ध सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के रूप में मिलता है. काकी भारत में प्रचलित चिश्तिया सिलसिले के 12वीं सदी के संत माने जाते हैं जिन्होंने दिल्ली में चिश्ती सिलसिले की स्थापना की.
उनकी दरगाह दिल्ली के महरौली में है जहां हर साल उनकी याद में उर्स का आयोजन होता है.
इसके साथ ही इतिहासकार मानस और महाभारत के बीच समानताएं पाते हैं. इसके सम्मान में भारत ने दिल्ली के चाणक्य पुरी में एक सड़क का नाम मानस रखा है.
किर्ग़िस्तानी लोग अपने प्रसिद्ध साहित्यकार चिंगिज़ एतमातोव पर भी काफ़ी गर्व करते हैं.
भारत ने भी एतमातोव को जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया था.
बिश्केक अपने शैक्षणिक संस्थानों के लिए भी जाना जाता है. यहां तक कि अमरीका, रूस, चीन और तुर्की ने बिश्केक में अपने विश्वविद्यालय स्थापित किए हैं.
हालांकि, भारत के यहां पर एक विश्वविद्यालय स्थापित करने का वादा अब तक अधूरा है.
किर्ग़िस्तान के विभिन्न चिकित्सा संस्थानों में 1,000 से अधिक भारतीय छात्र मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं. कुछ व्यवसायी किर्ग़िस्तान में व्यापार और सेवाओं में लगे हुए हैं.
वे ज़्यादातर चाय और फार्मास्यूटिकल्स का कारोबार करते हैं. यहां कुछ ऐसे भारतीय रेस्तरां भी हैं जो पश्चिमी राजनयिकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं.
किर्गिज़ गणराज्य के साथ भारत के राजनीतिक संबंध ज़्यादातर प्रगाढ़ रहे हैं.
हाल ही में, राष्ट्रपति सोरोनबाय शारिपोविच जीनबेकोव ने 30 मई, 2019 को नई दिल्ली में प्रधान मंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लिया था.
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