महिला की न्यूड तस्वीर हमेशा अश्लील नहीं: सुप्रीम कोर्ट

supreme court
नयी दिल्ली। देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता के 154 साल पुराने 'अश्लीलता' के प्रावधान की नई व्याख्या करते हुए कहा है कि महिलाओं की नग्न तस्वीर हमेशा अश्लील नहीं होती। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आईपीसी निषेधाज्ञा ऐक्ट, 1986 के अंतर्गत किसी महिला की प्रकाशित नग्न तस्वीर को हमेशा अश्लीलता नहीं माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस केएस राधाकृष्णन और एके सीकरी की बेंच ने अहम सुनवाई करते हुए कहा है कि एक न्यूड या सेमि-न्यूड तस्वीर को तब तक अश्लील नहीं कहा जा सकता जब तक कि उसमें एक भड़काऊ प्रवृत्ति न हो। कोर्ट ने कहा कि 'कोई लेख या किताब अश्लील है या नहीं, इसे तय करने से पहले कोर्ट को आधुनिकता और राष्ट्रीय मानकों का ख्याल रखना चाहिए न कि आसानी से प्रभावित हो जाने वाले अथवा संवेदनशील लोगों का।'

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी पत्रिका या प्रकाशन द्वारा छापी गई नग्‍न महिला की तस्वीर को भारतीय दंड संहिता या महिलाओं का अश्लील चित्रण अधिनियम, 1986 के तहत तब तक अश्लील नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसका उद्देश्य सिर्फ उत्तेजना फैलाना या सेक्‍स की इच्‍छा भड़काना मात्र न हो। गौरतलब है कि 1993 में जर्मन खेल पत्रिका ने ब्रिटिश टेनिस खिलाड़ी बोरिस बेकर और उनकी अश्‍वेत प्रेमिका बारबरा का सेमी न्यूड फोटो छापा था। इसमें बेकर और अंधेरे में खड़ी उनकी प्रेमिका के तन पर कपड़े नहीं थे। यह फोटो बारबरा के पिता द्वारा ही खींची गई थी। इसका मकसद यह दिखाना था कि बोरिस रंगभेद के सख्‍त विरोधी हैं।

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