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ढाई रुपए में सैनिटरी पैड, पर कितने कारगर?

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    दो दिन से बिमला काम पर नहीं गई. तीसरे दिन जब काम पर लौटीं तो सुनीता ने छुट्टी लेने की वजह पूछी.

    बिमला ने जवाब दिया, "दीदी, बहुत बीमार हूं. डॉक्टर ने कहा है महीने (मासिक धर्म) के समय कपड़ा इस्तेमाल करने से इंफेक्शन हो गया है."

    रोती हुई आवाज़ में वो आगे बोली, "कोई शौक़ से तो कपड़ा नहीं लेता, दीदी. बहुत तकलीफ़ होती है. ख़ासकर गर्मियों के दिनों में. पांच दिन में खाल छिल जाती है, दाने निकल आते हैं लेकिन क्या करें. खाने को पैसे नहीं तो पैड कहां से लाएं."

    एक सांस में बिमला ने अपनी हालत और मजबूरी दोनों बयां कर दी. बिमला दक्षिण दिल्ली में घरों में सफाई का काम करती है.

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    साकेंतिक तस्वीर
    Getty Images
    साकेंतिक तस्वीर

    ये सिर्फ़ बिमला की कहानी नहीं है. ऐसी सभी औरतों की है जो दो समय की रोटी जुटाने के लिए घंटों मजदूरी करती हैं.

    इन्हें कम खर्च में इस तकलीफ़ से निजात मिल सके, इसलिए केन्द्र सरकार 2.50 रुपए में सैनिटरी पैड मुहैया कराने जा रही है.

    'सुविधा' क्या है?

    महिला दिवस पर शुरू की गई इस योजना को 'सुविधा' नाम दिया गया है. केन्द्रीय रसायन एंव उर्वरक मंत्रालय ने भारतीय जन औषधि परियोजना के तहत इसकी शुरुआत की है.

    सरकार के मुताबिक़ 'सुविधा' स्कीम में ऑक्सी-बायोडिग्रेडेबल यानी अपने आप गलकर ख़त्म हो जाने वाले सैनिटरी पैड बांटे जाएंगे.

    ये किफ़ायती सैनिटरी पैड देश में मौजूद सभी 3200 जन-औषधि केंद्रों पर मिलेंगे. एक पैकेट में चार पैड हैं और पैकेट की क़ीमत है 10 रुपये.

    'सुविधा' पैड की बिक्री इस साल 28 मई से शुरू होगी. जिस दिन अंतरराष्ट्रीय मासिक धर्म हाइजीन दिवस भी मनाया जाता है.

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    ऑक्सी-बायोडिग्रेडेबल पैड क्यों?

    'सुविधा' पैड बनाने वाली कंपनी के सीईओ विप्लव चटर्जी के मुताबिक़, "इसमे एक ख़ास तरह का पदार्थ मिलाया जाता है जिससे इस्तेमाल के बाद ऑक्सीजन के संपर्क में आकर पैड बायोडिग्रेडेबल हो जाते हैं यानी ख़ुद-ब-ख़ुद गलकर ख़त्म हो जाता है."

    विप्लव चैटर्जी के मुताबिक, "अगर पैड्स बायोडिग्रेडेबल न हों तो 1 पैड को गलने में 500 साल लग जाते हैं. और उनके दाम भी दोगुने से ज्यादा होते हैं. लेकिन हमारे प्रॉडक्ट का दाम आधे से भी कम है और इसे गलने में 3-6 महीने का ही वक्त लगता है."

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    लेकिन मेंस्ट्रूपीडिया डॉट कॉम की संस्थापक अदिति गुप्ता कहती हैं कि वो इस बायोडिग्रेडेबल के कॉन्सेप्ट से ही इत्तेफाक नहीं रखतीं.

    उनके मुताबिक़, "ये पूरी चर्चा अपने आप में अधूरी है. इसे सुन कर ऐसा लगता है कि पर्यावरण को बचाने की पूरी ज़िम्मेदारी महिलाओं के ऊपर है और वो भी मासिक धर्म के समय पर. "

    अदिति के मुताबिक़ वो घर के दूसरे काम करते समय भी पर्यावरण का ख़ासा ख्याल रखती हैं. वो बताती हैं कि, "पैड इस्तेमाल करते समय मैं सिर्फ़ दो बातों के बारे में सोचती हूं - उसकी क्वालिटी और बहाव सोखने की शक्ति. मैं ये कभी नहीं देखूंगी कि पैड बायोडिग्रेडेबल हैं या नहीं."

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    सैनिटरी पैड बनाती महिलाएं
    BBC
    सैनिटरी पैड बनाती महिलाएं

    अदिति की चिंता है कि दाम कम रखने के लिए पैड की क्वालिटी से समझौता नहीं होना चाहिए.

    'सुविधा' बनाने वाली कपंनी का दावा है कि उनके पैड अमरीकन सोसाइटी ऑफ टेस्टिंग एंड मैटेरियल के मानकों पर पूरे उतरते हैं.

    अमरीका की ये टेस्टिंग एजेंसी ये बताती है कि कोई सामान सही में बायोडिग्रेडेबल है या नहीं.

    कितने कारगर हैं सुविधा पैड?

    लेकिन सुविधा पैड बहाव सोखने में कितने कारगर हैं इसका अभी टेस्ट नहीं हुआ है. और यहीं फंसा है सारा पेंच.

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    कितना सुरक्षित है सैनिटरी पैड का इस्तेमाल?

    सांकेतिक तस्वीर
    Getty Images
    सांकेतिक तस्वीर

    आम तौर पर एक महिला अपने हर मासिक धर्म के दौरान 12 पैड का इस्तेमाल करती है.

    बाज़ार में दूसरे ब्रांड के बायोडिग्रेडेबल पैड की कीमत 6 से 8 रुपए प्रति पैड है, जबकि एक 'सुविधा' पैड की कीमत ढाई रुपए है.

    राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) की मानें तो 15 से 24 साल तक की उम्र की 58 फ़ीसदी महिलाएं स्थानीय स्तर पर तैयार नैपकिन या रूई के फोहे का इस्तेमाल करती हैं.

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    English summary
    Sanitary pads in two and a half rupees but how effective

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