कौन थे पेरियार, तमिलनाडु की राजनीति में जिनके नाम का अब भी चलता है सिक्का?
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और राज्य में मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म पर पहले आपत्तिजनक टिप्पणी की। फिर घुमा-फिराकर खुद को सही साबित करने की कोशिशों में जुट गए। जब चौतरफा विपक्ष के निशाने पर आए तो पेरियार के नाम का पत्ता फेंक दिया।
उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म पर अपनी टिप्पणी के बचाव में कहा, 'हम पेरियार, अन्ना और कलैगनार के अनुयायी सामाजिक न्याय को कायम रखने और एक समतावादी समाज की स्थापना के लिए हमेशा लड़ते रहेंगे....'

पेरियार बना सियासत का सदाबहार नाम
इसी साल अप्रैल में उदयनिधि स्टालिन ने खुद कबूल किया था कि पेरियार के निधन के 50 वर्ष बाद भी उनका नाम और भाषण अभी भी तमिलनाडु की राजनीति तय करता है। स्टालिन या उनका परिवार अकेला नहीं है, तमिलनाडु के अधिकतर नेताओं की जुबान पर पेरियार सदाबहार शब्द की तरह से बैठ चुका है। पेरियार के सम्मान में कसीदे पढ़े बिना तमिलनाडु में कोई भी राजनीति सफल नहीं हो सकती।
पेरियार कौन थे?
पेरियार का असली नाम ईवी रामासामी (इरोड वेंकट नायकर रामासामी) था। उनका जन्म 17 सितंबर, 1879 को तमिलनाडु के इरोड में हुआ था, जो तब मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। वह ब्राह्मणवाद, जाति और लैंगिक भेदभाव के कट्टर विरोधी थे। उन्हें 'द्रविड़ आंदोलन का जनक' कहा जाता है। उनका पेरियार नाम उनके समर्थकों के उनके प्रति सम्मान की वजह से पड़ा है, जिसका मतलब है, सम्मानित व्यक्ति या पवित्र आत्मा।
परंपरागत संपन्न हिंदू परिवार में जन्मे थे
वह खुद एक परंपरागत संपन्न हिंदू परिवार में जन्मे थे, लेकिन वर्ण व्यवस्था के विरोध का ऐसा बीड़ा उठाया कि तमिलनाडु की राजनीति की धारा हमेशा के लिए बदल गई। उन्होंने हिंदू धर्म में तब मौजूद बुराइयों का पूरजोर विरोध किया। बाल विवाह, विधवा विवाह के खिलाफ मानसिकता, महिलाओं और दलितों के शोषण से लेकर देवदासी प्रथा तक उनकी राजनीति के निशाने पर रहे। 2021 से तमिलनाडु में उनके जन्म दिवस को 'सामाजिक न्याय दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
पेरियार की राजनीति का उद्देश्य
पेरियार 1919 में कांग्रेस में शामिल हुए थे, लेकिन 1925 में इस वजह से उससे बाहर हो गए, क्योंकि उन्हें लगा कि पार्टी में मुख्य तौर पर ब्राह्मणों के हित साधे जाते हैं। 1926 में उन्होंनेआत्म-सम्मान आंदोलन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य जाति, धर्म और ईश्वर से रहित एक तर्कसंगत समाज का निर्माण करना था। उनके उद्देश्यों में ब्राह्मणवाद का प्रभुत्व मिटाना और चारों द्रविड़ भाषाओं- तमिल, तेलुगू, मलयालम और कन्नड़ को पुनर्जीवित करना भी था।
द्रविड़ राजनीति के सूत्रधार थे पेरियार
उन्होंने तमिल पहचान पर जोर दिया और कहा कि उत्तर भारत से पैदा हुए संस्कृत बोलने वाले आर्यन ब्राह्मणों ने तमिल क्षेत्र में भी जाति व्यवस्था कायम की है। उन्होंने हिंदी 'थोपे जाने का' भी जबर्दस्त विरोध किया। 1939 में वे जस्टिस पार्टी के प्रमुख बने और 1944 में उसका नाम द्रविड़ कड़गम कर दिया। बाद में सीएन अन्नादुरई ने पार्टी विभाजित कर दी, जिसकी वजह से 1949 में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) का गठन हुआ।
उदयनिधि स्टालिन डीएमके के तीसरी पीढ़ी के नेता हैं। उनके दादा एम करुणानिधि तमिलनाडु में पांच बार मुख्यमंत्री रहे थे। उदयनिधि के पिता एमके स्टालिन अभी राज्य के सीएम हैं और पार्टी के प्रमुख भी।
देवी-देवता के पोस्टर जलाकर भी की राजनीति
1950 के दशक में हिंदुओं के प्रति पेरियार के विरोध का स्तर इतना बढ़ गया था कि वे और उनके समर्थकों ने हिंदू देवी-देवताओं के पोस्टर भी जला डाले थे। जानकारी के मुताबिक उनकी यह राजनीति 1970 के दशक तक कायम रही। कहा जाता है कि उन्हें हिंदुओं की निचली जाति को ब्राह्मणों के कथित दबाव से छुटकारा दिलाने के लिए दूसरे धर्मों में धर्मांतरण भी एक रास्ता नजर आया।
हिंदी विरोध भी द्रविड़ राजनीति के लिए बड़ा आधार
तमिलनाडु की दूसरी प्रमुख पार्टी एआईएडीएमके (AIADMK) भी पेरियार के सिद्धांतों पर ही बनी पार्टी है। इसे एमजी रामचंद्रन (MGR) ने बनाया था, जिन्हें करुणानिधि ने डीएमके से निकाल दिया था। पेरियार की सोच की विरासत आज भी तमिलनाडु की राजनीति पर हावी है। उनका तर्कवाद, जाति के आधार पर उत्पीड़न का कथित विरोध सियासत का आधार है और इसी तरह से हिंदी के विरोध से भी संजीवनी मिलती है।
इस तरह से पेरियार की राजनीति के चलते कई दशकों से तमिलनाडु की सियासत से ब्राह्मणों की पकड़ बिल्कुल ही खत्म हो गई। पिछले कुछ दशकों में प्रदेश से ब्राह्मणों की बड़ी आबादी बाहर निकल गई और कुछ तो प्रतिष्ठित नौकरियों और कारोबार के लिए देश से बाहर भी चले गए।
आज तमिलनाडु की राजनीति बहुत ही दिलचस्प मोड़ पर है। वोट बैंक पॉलिटिक्स के लिए डीएमके और एआईएडीएम दोनों ही चुनावों के दौरान जमकर जातिगत राजनीति करती है, लेकिन पेरियार अपने निधन के आधी सदी बाद भी वोट खींचने के सबसे बड़े हथियार बने हुए हैं।












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