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समझौता ब्लास्ट केस: विशेष जज ने NIA की जांच पर उठाए सवाल, कहा-पेश नहीं किए गए अहम सबूत

नई दिल्ली। समझौता ब्लास्ट केस में पंचकूला की स्पेशल कोर्ट के जज ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए) को लताड़ लगाई है। कोर्ट ने इस मामले पर पिछले सप्ताह सुनाए गए अपने फैसले की कॉपी की अब सार्वजनिक कर दिया है।ब्लास्ट के आरोपियों की रिहाई का आदेश देने वाले जज ने अपने फैसले में कहा है कि एनआईए सबसे मजबूत सबूत ही अदालत में पेश करने में नाकामयाब रही, साथ ही मामले की जांच में भी कई लापरवाही बरती गई। बता दें कि, ​​20 मार्च को समझौता ब्लास्ट मामले में आरोपी स्वामी असीमानंद, लोकेश शर्मा, कमल चौहान और राजिंदर चौधरी को कोर्ट ने बरी कर दिया गया था।

160 पन्नों का फैसला हुआ सार्वजनिक

160 पन्नों का फैसला हुआ सार्वजनिक

विशेष एनआईए अदालत के न्यायाधीश जगदीप सिंह ने अपने फैसले में कहा कि, मैं गहरी पीड़ा और व्यथा में अपना फैसला सुना रहा हूं क्योंकि, नृशंस हिंसा का कृत्य बिना किसी सजा के समाप्त किया जा रहा है। गुरुवार को 160 पन्नों का वह आदेश जारी किए गए, जिसमें विशेष एनआईए अदालत के न्यायाधीश जगदीप सिंह ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा "सबसे महत्वपूर्ण सबूतों को पेश नहीं किया गया औऱ ना ही उन्हें रिकॉर्ड पर लाया गया। इसके अलावा कई स्वतंत्र गवाहों से पूछताछ नहीं की गई। जब उन्होंने अभियोजन मामले का समर्थन करने से मना कर दिया तो उन्हें जिरह के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया ।

 अभियोजन द्वारा पेश किए गए सबूतों में कई लापरवाही थी

अभियोजन द्वारा पेश किए गए सबूतों में कई लापरवाही थी

बता दें कि, भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में 18 फरवरी 2007 को हरियाणा के पानीपत के पास धमाका हुआ। उस वक्त रेलगाड़ी अटारी जा रही थी जो भारत की तरफ का आखिरी स्टेशन है। इस बम विस्फोट में 68 लोगों की मौत हो गई थी। जज ने अपने फैसले में कहा कि, अभियोजन द्वारा पेश किए गए सबूतों में कई लापरवाही थी, जिससे इस हिंसक घटना में किसी को सजा नहीं हो सकी।आतंकवाद का कोई महजब नहीं होता क्योंकि दुनिया में कोई भी मजहब हिंसा का संदेश नहीं देता।

अदालत का आदेश लोगों की जनभावना के आधार पर नहीं होने चाहिए

अदालत का आदेश लोगों की जनभावना के आधार पर नहीं होने चाहिए

जज जगदीप सिंह ने 28 मार्च को सार्वजनिक किए गए अपने फैसले में कहा कि चूंकि कानून के अनुसार अदालत के निष्कर्ष स्वीकार्य साक्ष्य पर आधारित हैं। जब ऐसे जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले अपराधी अज्ञात और अप्रभावित रहते हैं, तो दर्द और ज्यादा बढ़ जाता है। अदालत का आदेश लोगों की जनभावना के आधार पर नहीं होने चाहिए या फिर किसी राजनीति से प्रेरित नहीं होने चाहिए। यह सिर्फ सबूतों के आधार पर होना चाहिए। आपराधिक मामलों में, सजा नैतिकता के आधार पर नहीं हो सकती है।

अदालत में अपराधियों को लेकर कोई भी सबूत नहीं लाया गया

अदालत में अपराधियों को लेकर कोई भी सबूत नहीं लाया गया

उन्होंने कहा कि, वर्तमान मामले में, आरोपी व्यक्तियों के बीच अपराध करने के लिए किसी भी समझौते के बारे में कोई सबूत नहीं है। अपराध करने के लिए अभियुक्तों के बीच किसी भी बैठक के बारे में कोई सबूत नहीं है। विचाराधीन अपराध में अभियुक्त से जुड़ा कोई ठोस मौखिक, दस्तावेजी या वैज्ञानिक सबूत नहीं लाया गया है। उन्होंने कहा कि आरोपियों की ओर से अपराध में लिप्त होने के लिए कोई मकसद कोर्ट में पेश नहीं किया गया।

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