Same Sex Marriage: बायोलॉजिक बच्चे का होना जरूरी नहीं: चीफ जस्टिस
Same Sex Marriage: समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि बच्चों का बॉयोलॉजिकल होना जरूरी नहीं।

Same Sex Marriage: समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पिछले कई दिनों से सुनवाई चल रही है। इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि इसके लिए बायोलॉजिक बच्चे का होना जरूरी नहीं है।
चीफ जस्टिस ने कहा कि विवाह के लिए बच्चों का बायोलॉजिकल होना जरूरी नहीं है। अगर किसी बच्चे की मां का देहांत हो जाता है तो पिता मां और बाप दोनों के फर्ज को अदा करता है।
दरअसल एएसजी भाटी ने कानून का हवाला देते हुए कहा कि हमारा कानून कहता है कि सिंगल पुरुष लड़की को गोद नहीं ले सकता है। इसी पर चीफ जस्टिस ने कहा कि बच्चे की मां का निधन होने पर मां-पिता दोनों की जिम्मेदारी पिता निभाता है।
अडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि बच्चों को प्रेम और सुरक्षा की जरूरत होती है। अगर स्पेशल मैरिज एक्ट में माता-पिता पढ़ा जाएगा तो बच्चों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। कोर्ट का फैसला बच्चों को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए।
एक अकेला पुरुष या अकेली महिला को कोई अधिकार नहीं है। अकेला पुरुष लड़की को गोद नहीं ले सकता है। कानून ऐसे ही बना है। 30 हजार रजिस्टर्ड पैरेंट हैं जो बच्चों को गोद लेना चाहते हैं जबकि 1500 बच्चे सिर्फ गोद लेने के लिए उपलब्ध हैं।
बता दें कि समलैगिंक विवाह को कानूनी मंजूरी देने को लेकर दायर की गई याचिका पर आज 9वें दिन सुनवाई चल रही है। इस याचिका की सुनवाई पांच जजों की सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच कर रही है। बेंच की अगुवाई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ कर रहे हैं जबकि इस बेंच में जस्टिस एसके कौल, एसआर भट्ट, हिमा कोहली, पीएस नरसिम्हा शामिल हैं।
इस मामले में मंगलवार को सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल जमात उलेमा ए हिंद की ओर से पेश हुए थे। उन्होंने कहा कि फैसला देते वक्त विदेश में दिए गए फैसलों को आधार नहीं बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हमारा संविधान जीता-जागता दस्तावेज है, इसके कानून में समय के साथ बदलाव होते रहने चाहिए।












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