सनातन धर्म को किसी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं, यह हमेशा था और रहेगा: मोहन भागवत
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि सनातन को किसी भी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है, यह हमेशा से था है और रहेगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने उत्तराखंड में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सनातन धर्म की महिमा और भगवा रंग के महत्व पर बयान दिया। संघ प्रमुख ने कहा कि भगवा रंग की जो प्रतिष्ठा है, उसे ही धारण करते हुए आप उसे और आगे बढ़ाने का व्रत आप लोग ले रहे हैं। जो सनातन है, उसको किसी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है। काल की कसौटी पर वही एक सत्य सिद्ध हुआ है, बाकी सब बदलता है, वह तब से है और आगे भी रहेगा। इस सनातन को हमको अपने आचरण से लोगों को समझाना पड़ेगा। मोहन भागवत ने कहा कि सनातन समय की कसौटी पर खरा साबित हुआ है, बाकी सब बदलता है,लेकिन यह नहीं बदलता है, यह हमेशा रहेगा।
संघ प्रमुख मोहन भागवत उत्तराखंड में ब्रह्मचर्य जीवन की शुरुआत कर रहे और भगवा धारण कर रहे साधु-संतों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान मंच पर स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण मंच पर मौजूद थे। मोहन भागवत ने कहा कि अब भगवान की इच्छा है कि सनातन धर्म का उत्थान हो, लिहाजा ऐसी स्थिति में हिंदुस्तान का उत्थान भी निश्चित है।
सूर्योदय होते ही लोग नींद छोड़कर काम पर लग जाते हैं, अब जितने भी आलसी सोने वाले लोग हो तो भी दिन के प्रकाश में सो नहीं सकते हैं, आपको कुछ अंधेरा करना पड़ता है। आपको यह कर्मशीलता का भी प्रतीक है। मदुरै में एक मंदिर है मीनाक्षी मंदिर, वहां एक छोटा सा साइंस म्यूजियम है, वहां मैंने विभिन्न रंगों का मनुष्य के स्वभाव पर क्या परिणाम होता है, यह दिखाया गया है। वहां भगवा रंग भी है। भगवा रंग पहनने और घर की दीवारों भगवा रंग की होने से इससे लोगों में कर्मशीलता और सबके प्रति आत्मीयता का भाव पैदा होता है।
मोहन भागवत ने कहा कि हमारे यहां प्राचीन काल से ही जिस किसी ने भी परित्याग किया, वह सफेद कपड़ा पहनकर प्रारंभ करता है और भगवा कपड़ा ओढ़ने में उसकी परिणिती होती है। इन रंगों के साथ हम लोगों का सहचर्य का भाव बना है, भगवा यानि त्याग। हमारी मान्यता है, त्याग से ही वह प्राप्त होता है, जो सत्य, संपूर्ण सत्य, अंतिम सत्य, जिसका अविष्कार विविधता भरी दुनिया है, उस सत्य को जानने का एक ही मार्ग है, सत्य के चारो ओर जो आभा फैली है उसे एक-एक करके छोड़ते जाओ। ऐसे में जो बचता है, जिससे आप ना कह रहे हैं, उसे भी छोड़ दें, फिर जो बचता है वह तत्व होता है, उसका अनुभव होता है। यही एक मार्ग है।












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