कृषि कानून पर मोदी सरकार के यू-टर्न के पीछे RSS! बताई जा रही ये खास वजह
नई दिल्ली, 20 नवंबर: केंद्र सरकार की ओर से तीनों कृषि कानून को वापस लेने का ऐलान कर दिया गया है। इस फैसले के बाद किसान संगठनों में खुशी की लहर है। विपक्ष भी केंद्र सरकार के इस फैसले को आने वाले राज्यों में चुनावों में हार के मद्देनजर देख रहा है और इसे किसानों के संघर्ष की बड़ी जीत बता रहा है। इस बीच एक खबर ये भी सामने आई है कि देश में करीब एक साल के ज्यादा के वक्त से जारी किसान आंदोलन से आरएसएस को डर था कि यह प्रदर्शन सामाजिक एकता को प्रभावित कर रहा है।

इंडियन एक्सप्रेस में छपि रिपोर्ट के मुताबिक तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों को निरस्त करने के सरकार के फैसले को आरएसएस की ओर से सूचित किया गया था कि सरकार के खिलाफ लगातार विरोध सामाजिक एकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा था। रिपोर्ट के अनुसार संघ परिवार इस बात को लेकर विशेष रूप से चिंतित है कि उसे लगता है कि यह आंदोलन हिंदुओं और सिखों के बीच की खाई में तब्दील हो सकता है। जबकि संघ ने कभी भी कृषि कानूनों का खुले तौर पर विरोध नहीं किया और ना ही उनके वापसी के फैसले का समर्थन किया, लगभग एक साल तक सरकार को इस मुद्दे को हल करने में केंद्र की अक्षमता के बारे में अपनी परेशानी के बारे में संकेत देता रहा।
पश्चिमी यूपी में खतरा बना किसान आंदोलन!
रिपोर्ट में आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के हवाले से बताया गया कि लगातार आंदोलन जिसके परिणामस्वरूप कई किसानों की मौत हुई और लखीमपुर खीरी की घटना ने भी राजनीतिक रूप से बीजेपी को चिंतित में डालना शुरू कर दिया था। जमीनी स्तर पर प्रतिक्रिया यह थी कि पश्चिमी यूपी में कम से कम 20 सीटों पर जहां सिखों और जाटों की एक बड़ी आबादी है, वहां किसानों के आंदोलन और लखीमपुर खीरी की घटना का नकारात्मक प्रभाव होने वाला था। यहां तक की कार्यकर्ताओं और नेताओं के साथ बैठकों के दौरान चुनाव प्रचार के दौरान सिखों और जाटों के लिए किसी भी कठोर शब्दों का इस्तेमाल नहीं करने के लिए कहा था।
भारतीय किसान संघ कभी खुलकर नहीं आया
इधर, खासतौर पर किसानों के मुद्दों को देखने वाले आरएसएस संबद्ध संगठन भारतीय किसान संघ ने हमेशा कृषि कानूनों का समर्थन किया था, लेकिन पूरी तरह में कभी नहीं किया। पिछले साल सितंबर में किसानों की उपज और मूल्य आश्वासन से संबंधित दो प्रमुख विधेयकों को राज्यसभा द्वारा पारित किए जाने से पहले बीकेएस ने कहा था कि बिल अपने मौजूदा स्वरूप में स्वीकार्य नहीं थे। बीकेएस के सुझावों का मुख्य जोर यह था कि सभी व्यापारियों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम पर किसानों की उपज खरीदनी चाहिए। बीकेएस ने पर्याप्त चर्चा के लिए विधेयकों को स्थायी समिति के पास भेजने के लिए भी कहा था। इसने सरकार से कहा था कि या तो विधेयकों में सुनिश्चित एमएसपी को शामिल किया जाए या कोई अन्य कानून लाया जाए। हालांकि, दोनों विधेयकों को इसके सुझावों को शामिल किए बिना पारित कर दिया गया।
एमएसपी की गारंटी देने का वादा
कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को संबोधित अपने पत्रों में बीकेएस ने तब कहा था कि उसे संदेह है कि क्या सरकार द्वारा लाया गया अध्यादेश किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य प्रदान करने के उद्देश्य को पूरा करेगा। शुक्रवार को पीएम मोदी द्वारा कानूनों को निरस्त करने की घोषणा के बाद बीकेएस ने कहा कि तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने का सरकार का निर्णय एक अनावश्यक विवाद को टालने की दिशा में एक अच्छा कदम है। वहीं बीकेएस ने भी कानून के तहत एमएसपी की गारंटी देने की अपनी मांग दोहराई है।












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