रोहिंग्या मुसलमान और मोदी सरकार: क्या हो नीति, कैसे हैं हालात, जानें
नई दिल्ली। रोहिंग्या मुसलमानों के साथ हिन्दुस्तान कैसा व्यवहार करे- उसे शरण दे या नहीं, मानवीय मदद करे या नहीं और जो शरणार्थी भारत में हैं उन्हें देश से निकाले या नहीं? इस सवाल का जवाब देना थोड़ा मुश्किल जरूर है लेकिन सवाल से बचना, चुप रहना दरअसल समस्या को बढ़ाना होता है। इसलिए हमें अपना रुख तय करना होगा।
हर धर्म के लोगों को संकट की घड़ी में भारत ने दी है शरण
कोई ये नहीं कह सकता कि हिन्दुस्तानियों ने किसी को शरण नहीं दी है। 1893 में स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में जो ऐतिहासिक भाषण दिया था, उसमें यही बात जोरदार तरीके से कही गयी थी हमने हर धर्म के लोगों को और हर संकट की घड़ी में शरण दी है। हमने ज्ञान और सहिष्णुता दुनिया को सिखलाई है। आज़ादी के बाद भी तिब्बती, श्रीलंकाई तमिल, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आते रहे शरणार्थी सबको भारत ने शरण दी है। नेपाल और भारत में एक-दूसरे के यहां आने-जाने में कोई रुकावट ही नहीं है।

40 हज़ार रोहिंग्या शरणार्थी भारत में
चिन्ताजनक बात ये है कि बिना शरण दिए संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 40 हज़ार रोहिंग्या शरणार्थी पहुंच चुके हैं। इनमें 10 हज़ार तो अकेले जम्मू-कश्मीर में हैं। ये आंकड़ा वर्तमान रोहिंग्या संकट के पहले दस दिनों का है। ताजा आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। अब तक 3 लाख रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश में शरण ले चुके हैं। बांग्लादेश सरकार ने उन्हें शरण देने का एलान किया है।

बांग्लादेश से प्रिय रोहिंग्या को क्यों लग रहा है भारत?
सवाल ये है कि रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण क्यों चाहिए? बांग्लादेश जब उनकी मदद कर रहा है तो वे भारत में आने को क्यों आतुर हैं? निस्संदेह सुन्नी होने की वजह से हिन्दुस्तानी मुसलमानों में उनके प्रति सहानुभूति है। कश्मीर में 10 हज़ार के करीब रोहिंग्या मुसलानों का पहुंच जाना इसी का नतीजा है। मगर, धार्मिक आधार पर यह सहानुभूति क्या जायज है? कश्मीर अशांत है। वहां पत्थर फेंकने की नौकरी आसानी से मिल जाती है। मिलिटेंट और उन्हें समर्थन देने वाले सीमा पार के देश उन्हें पत्थर फेंकने की नौकरी देते हैं। ज़ाहिर है ये रोहिंग्या भी यहां पत्थर फेंकने की नौकरी पा लेंगे। संकट किनका बढ़ेगा?

बंगाल में भी हो रहा है रोहिंग्या मुसलमानों का स्वागत
प. बंगाल बांग्लादेश से सटा है और यहां ममता बनर्जी की सरकार है जो रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति नरम है। उनकेवोट बैंक के रूप में बदलने की उम्मीद इसकी बड़ी वजह है। पहले से बांग्लादेश से घुसपैठ करके पहुंची आबादी का अनुभव यही बताता है। मगर, जिस तरीके से प. बंगाल में सांप्रदायिक दंगे हुए हैं और हिन्दुओं को खदेड़ा गया है। उसे देखते हुए ये सांप्रदायिक दंगे और बढ़ेंगे और हिन्दुओं की स्थिति ख़राब होगी- ऐसा दावे के साथ कहा जा सकता है।

मानवीयता के नाते मदद से कतई इनकार नहीं
अगर इन चिन्ताओं को थोड़ी देर के लिए हम भूल जाएं और अपनी प्राचीन परम्परा का निर्वाह करते हुए शरणार्थियों को मानवीय आधार पर हम समर्थन देने को तैयार हो जाएं तो हमें क्या करना चाहिए? शरणार्थियों को देशभर में फैलने देने के बजाए एक जगह उनके लिए कैम्प बनाना चाहिए। मानवीय आधार पर उनके रहने और जीने का प्रबंध करना चाहिए। यह काम सीमावर्ती इलाकों में हो सकता है। मगर, इससे पहले कि सरकार इस बारे में कोई फैसला करे 40 हजार रोहिंग्या मुसलमानों का शरणार्थी बनकर भारत घुस आना शरणार्थियों से भी बड़ी चिन्ता है। वो कौन लोग हैं जो फैसले कर रहे हैं?

रोहिंग्या मुसलमानों को बाहर करने का फैसला कागजी
भारत सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों को देश से बाहर करने का फैसला लिया था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव और घरेलू राजनीति के सामने वह लाचार दिख रही है। यह फैसला कागज तक ही सिमट कर रह गया है। जब देश की सरकार घुसपैठ नहीं रोक सकी, तो शरणार्थियों को किस बूते निकाल पाएगी? इतना जरूर हुआ कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग को भारत की निन्दा करने का मौका मिल गया।

रोहिंग्या संकट का हल निकालना जरूरी
पीएम नरेन्द्र मोदी ने म्यांमार की यात्रा की और वहां रोहिंग्या मुसलमानों के मसले को भी उठाया। भारत ने राहत सामग्री भी उनतक पहुंचायी है। यह सब रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति मानवाधिकार की सोच के कारण भारत सरकार ने ऐसा किया है। बेहतर तरीका ये है कि म्यांमार के साथ बातचीत कर रोहिंग्या मुसलमानों को उसी अराकान प्रान्त के रखाइन इलाके में दोबारा भेजा जाए और वहां राजनीतिक स्थिरता का माहौल पैदा किया जाए। इसके लिए रोहिंग्या मुसलमानो को भी यह भरोसा दिलाना होगा कि वे दोबारा सुरक्षा बलों के साथ सशस्त्र संघर्ष नहीं करेंगे।

मानवीय आधार पर शरण नहीं दी जा सकती
मानवीयता के आधार पर सहायता बनती है। आगे बढ़ कर किया जाना चाहिए। मगर, मानवीयता के आधार पर रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण देने का तर्क गले नहीं उतरता। बांग्लादेश में शरणार्थियों का स्वागत हो रहा है। बांग्लादेश की मानवीयता रोहिंग्या मुसलमानों की कबूल करनी चाहिए। सिर्फ इसलिए कि भारत में जीने-खाने के बेहतर प्रबंध हो सकते हैं अगर रोहिंग्या भारत की तरफ रुख करेंगे तो यहां रहने वालों के बीच संसाधानों की जो मारामारी है, स्पर्धा है, जीने का संकट है, राजनीतिक व्यवस्था है उस पर भी दबाव पड़ेगा। इस दबाव को नहीं देखना भी अमानवीयता ही कही जाएगी। वर्तमान संकट का हल ढूंढ़ते हुए भविष्य के लिए बड़े संकट की आफत मोल लेना कहीं से बुद्धिमानी नहीं है।

भारत की डेमोग्रेफी को बचाना अधिक जरूरी
वर्तमान समय में देश की नीति यही होनी चाहिए कि जितना सम्भव हो, रोहिंग्या मुसलमानों की मदद की जाए। बांग्लादेश की भी मदद की जाए जहां रोहिंग्या मुसलमान सबसे बड़ी तादाद में इकट्ठा हुए हैं। लेकिन किसी भी सूरत में भारत की डेमोग्रेफी में फर्क आने नहीं देना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर में जिन हिन्दुओं को विस्थापित होना पड़ा है उन्हें दोबारा वहां बसाए जाने का वहीं के कश्मीरी मुसलमान विरोध कर रहे हैं। ऐसे में वहां रोहिंग्या मुसलमानों को शरणार्थी बनाकर रखने पर हिन्दू-मुसलमान तकरार और गम्भीर रूप धारण करेगा। आखिर ऐसी आफत को हिन्दुस्तान क्यों मोल ले?












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