सवर्णों की नाराजगी से परेशान है बीजेपी, मनाने के लिए मुख्यमंत्रियों को सौंपा गया ज़िम्मा
नई दिल्ली। इसी साल के आखिर में देश के तीन बड़े राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और इसके बाद 2019 का लोकसभा चुनाव है। बीजेपी ने इन्हें लेकर अपनी रणनीति बनाना शुरु कर दिया है। 28 अगस्त को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के साथ हुई मुख्यमंत्रियों और उपमुख्यमंत्री की बैठक में विस्तर से इन चुनावों को लेकर चर्चा हुई। शीर्ष नेतृत्व की ओर से कई दिशा-निर्देश दिए गए हैं कि कैसे इन चुनावों को लेकर हर राज्य में तैयारी होनी है। बैठक में केंद्र की नीतियों को समयबद्ध तरीके से लागू करने के साथ-साथ कई चुनावी फैकटर पर भी चर्चा हुई।

बीजेपी से उच्च जाति की नाराजगी बैठक में चिंता का एक प्रमुख कारण रही। बैठक में इस मामले पर विस्तार से चर्चा हुई कि कैसे उस समुदाय की नाराज़गी को दूर किया जाए जो हमेशा से पार्टी का वोट बैंक रहा है। ये समुदाय पार्टी से कहीं छिटक ना जाए इसे लेकर खास निर्देश दिए गए हैं। फॉर्मूला सुझाया गया है कि देशभर में उच्च जाति के समुदायों की नाराजगी को दूर करने के लिए इसी जाति के बीजेपी नेताओं का सहारा लिया जाए और लोगों को अपने पक्ष में किया जाए।

मुख्यमंत्रियों को खास निर्देश
बैठक में, बीजेपी नेताओं ने उन तमाम मुद्दों पर चर्चा की जो 2019 के लोकसभा चुनाव पर असर डाल सकते हैं। सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि कई बीजेपी शासित राज्यों में, ऊंची जाति के लोग कई कारणों से पार्टी से नाराज़ हैं, जिसमें समुचित प्रतिनिधित्व ना होना और संसद में हाल में पास किए गए नए कानून शामिल हैं।
बैठक में इस बात पर चर्चा हुई कि ऊपरी जातियों का बीजेपी से खुश ना होना एक बात है लेकिन उनका मुखर होकर पार्टी के खिलाफ बोलना ज़्यादा बड़ी चिंता है। मुख्यमंत्रियों को इस मुद्दे को गंभीरता से लेने और प्रभावी कदम उठाने को कहा गया है। निर्देश हैं कि मुख्यमंत्री और पार्टी के बड़े नेता लगातार इन समुदायों के नेताओं से मुलाकता करें, इनके मसलों को समझें और उन पर काम करें। पार्टी ने कहा कि लोगों को समझाया जाए कि ये कड़वी वास्तविकता है कि अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण को समाप्त नहीं किया जा सकता है।

बिगड़ सकते हैं चुनावी समीकरण
उत्तर भारत के कुछ राज्यों में ऊंची जाति के मतदाताओं की नाराज़गी पार्टी के सत्ता में आने की संभावना को कम कर सकती है। उत्तर प्रदेश पर ही नजर डालें तो यहां ऊंची जाति के वोटों में लगभग 12 प्रतिशत ब्राह्मण, 9 प्रतिशत राजपूत, वैश्य, भूमिहार, कायस्थ हैं और इसी तरह के कई और उच्च जातियां हैं जो इस संख्या को 24 से 25 फीसदी तक ले जाती हैं। ये संख्या किसी भी चुनाव का रुख पलटने के लिए काफी है। इसी तरह उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और कई अन्य राज्यों में भी उच्च जातियों का अपना एक दबदबा है।

कई मुद्दों पर है नाराज़गी
दरअसल उच्च जातियों में इसे लेकर नाराजगी है कि उनके नेताओं को पार्टी में उचित स्थान नहीं दिया गया है या फिर उन्हें पार्टी में हाशिए पर रख दिया गया है। इसके अलावा एससी-एसटी अत्याचार उन्मूलन (संशोधन)विधेयक 2018, पदोन्नति में एससी-एसटी आरक्षण का मामला और ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देना जैसे मामले ऊपरी जाति के लोगों के बीच डर पैदा कर रहे हैं। इन लोगों को लगने लगा है कि पार्टी के लिए कड़ी मेहनत करने के बावजूद, उन्हें धोखा दिया गया है।

यूपी में हार से सबक
बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में हुए लोकसभा उप चुनावों में हुई हार के बाद पार्टी सतर्क हो गई है। पार्टी ने महसूस किया है कि इन तीनों सीटों पर हुए चुनावों में ऊपरी जाति के मतदाता घर पर बैठे रहे और वोट डालने नहीं आए जिसका फायदा विपक्ष को मिला। इसी तरह मामला बिहार में भी है जहां आरजेडी एक बार फिर उभर रही है।
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