जानिए क्या है पुण्य प्रसून- अरविंद केजरीवाल के बीच डील का राज़
कहीं इन सबका कारण नरेंद्र मोदी, भाजपा और आरएसएस का बढ़ता प्रभाव तो नहीं जिसे मीडिया एक "दक्षिणपंथी " सोच के नाम पर नकारता रहा? इसमें कोई शक नहीं कि दक्षिणपंथी पार्टियों की लहर चल पड़ी है और देश में इसका प्रभाव तेजी से देखने को मिल रहा है। इस प्रभाव के बीच वामपंथी सोच पर खतरा मंडराता नजर आ रहा है। ये वो सोच है जो भारतीय मीडिया के डीएनए में घुसी हुई है।
नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक
देश का इतिहास इस बात का गवाह है कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल से लेकर वर्तमान में सोनिया के नेतृत्व तक सरकार और मीडिया हमेशा से वामपंथी वैचारिक प्रभाव के नीचे रहे। नेहरू को तो इसके लिये कांग्रेस के कई अधिवेशनों में कांग्रेस में कांग्रेस के धाकड़ नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद से सुननी पड़ी। इंदिरा गांधी के समय में पीएन हसकर का बोलबाला रहा जो समाजवाद के अंदर वामपंथ को ढोते रहे। वर्तमान में राहुल गांधी की एडवाइजरी कमेटी में कुछ दिन पहले तक योगेंद्र यादव की उपस्थिति और वर्तमान में नेशनल एडवाइजरी बोर्ड में भी तमाम वामपंथी सोच वाले लोगों का ही बोलबाला है।
कांग्रेस ने हमेशा वामपंथी सोच को बढ़ावा दिया। इसी लपेटे में भारतीय मीडिया भी आया और एक दो अखबारों को छोड़कर लगभग सभी इसी सोच का शिकार हुए।
इसी सोच के साथ फले-फूले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी वामपंथी विचार गहराते गये। इसके परिणाम स्वरूप कभी भी दक्षिणपंथियों को मीडिया में वो कवरेज नहीं मिला, जिनके वो हकदार थे। आज जब नरेंद्र मोदी की लहर चल पड़ी है, तब उसी सोच को रखने वाले टीवी चैनल इस बात से परेशान हैं कि कैसे भाजपा के पीएम कैंडिडेट को कवरेज दिया जाये।
Did You Know: 1780 में हुआ मीडिया का जन्म
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास कुछ नहीं है, जिसे आधार बनाकर मीडिया कांग्रेस का डंका बजा सके, वहीं मोदी और भाजपा को देख उनके मन में आता है कि जिसे 10 साल पहले कोसा था, आज उसके फेवर में कैसे न्यूज दें, आखिर विचारधारा का सवाल है।
सोशल मीडिया ने किया मजबूर
2002 में गुजरात दंगों के दौरान देश के लगभग सभी टीवी चैनल एक जुट हो गये थे और सभी ने सिर्फ वही खबरें दिखायीं, जिसमें सरकार की नाकामी दिख रही हो, वो खबरें नहीं दिखायीं, जिससे पता चल सके कि मोदी की सरकार ने क्या-क्या अच्छा काम उस दौरान किया था।
आज जब वही मोदी और दक्षिणपंथी सोच सोशल मीडिया पर स्वाभाविक रूप से मजबूती से उभरी तो टीवी चैनलों में खलबली मच गई, लेकिन चूंकि एक विशिष्ट सोच से बाहर निकलना सबके बस की बात नहीं होती, लिहाजा अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी उन्हें एक मात्र सहारा के रूप में दिखायी दे रहे हैं।
कुल मिलाकर पुण्य प्रसून जैसे तमाम पत्रकारों के पास अब अरविंद केजरीवाल एक मात्र चारा बचे हैं, टीआरपी बढ़ाने के लिये। हम आपको बता दें कि टीवी स्क्रीन पर जो कुछ भी जैसा दिखता है, कई बार वैसा होता नहीं है। कई बार वक्ता से कहा जाता है, कि आपको क्या बोलना है, कई बार तो वक्ताओं को स्क्रिप्ट तक दे दी जाती है और वो स्क्रिप्ट नहीं टीवी चैनल की विचारधारा होती है।
Did You Know: भारतीय मीडिया का जन्म 1780 में एक अखबार के साथ हुआ था।













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