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आशीष मिश्रा को मिली ज़मानत पर मृतकों के परिवार- 'उसके छूटने से हमको ख़तरा है, उनकी सरकार है, कुछ भी कर सकते हैं'

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उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में बीते साल तीन अक्टूबर को मारे गए चार किसानों (दलजीत सिंह, गुरविंदर सिंह, लवप्रीत सिंह, नक्षत्र सिंह) और पत्रकार रमन कश्यप की हत्या के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुख्य अभियुक्त आशीष मिश्र को गुरुवार को ज़मानत दे दी.

लवप्रीत सिंह, नक्षत्र सिंह और रमन कश्यप के परिवार वाले लखीमपुर खीरी में ही रहते हैं. गुरविंदर और दलजीत सिंह के परिवार वाले बहराइच के नानपारा के रहने वाले हैं.

मृतक गुरविंदर सिंह के परिवार वालों का आरोप था कि उन्हें गोली लगी थी लेकिन सरकार के कराए गए पोस्टमॉर्टम में ऐसा नहीं पाया गया था.

Reaction of family of deceased on bail granted to Ashish Mishra

मुख्य अभियुक्त और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्र को ज़मानत मिलने के बाद बीबीसी की टीम गुरविंदर सिंह के परिवार से मिलने बहराइच के नानपारा पहुँची.

गांव में गुरविंदर के पिता सुखविंदर सिंह और उनकी माँ दलजीत कौर से मुलाक़ात हुई. गुरविंदर सिंह के पिता सुखविंदर सिंह ने ज़मानत के फ़ैसले पर सवाल उठाते हुए कहा, "मौजूदा सरकारों से हमारा तो कहना यही है कि पाँच-पाँच किसानों की उसने कुचल कर हत्या कर दी, तो उसको इतनी जल्दी बेल क्यों मिली. उसको इतनी जल्दी बेल कैसे मिली? यह सब सरकार की मिली भगत है और जब तक इनका (आशीष मिश्र) पिता अजय मिश्र टेनी अपने पद पर बना रहेगा, तब तक हमको न्याय की कोई उम्मीद नहीं है."

एसआईटी की जाँच का हवाला देते हुए सुखविंदर सिंह कहते हैं कि आरोपी आशीष मिश्र मौक़े पर भी पाए गए थे लेकिन फिर भी उन्हें ज़मानत मिल गयी.

'उसके छूटने से हमको ख़तरा है, हमारे पूरे परिवार को ख़तरा है'

यूं तो अदालत के आदेश के बाद से ही सुखविंदर सिंह के घर पर पुलिस का पहरा है लेकिन आशीष मिश्र को ज़मानत मिलने के बाद वे अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं.

वह कहते है, "उनकी सरकार है, कुछ भी कर सकते हैं. वह बहार निकल कर आएगा, कल हमको भी मार देगा तो हम कुछ नहीं कर पाएंगे. उसके छूटने से हमको ख़तरा है. हमारे पूरे परिवार को ख़तरा है."

हाल ही में समाचार एजेंसी एएनआई को दिए गए एक इंटरव्यू में लखीमपुर खीरी से जुड़े सवाल के बारे में पूछे जाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, "सुप्रीम कोर्ट जो कमेटी बनाना चाहती थी, राज्य सरकार ने उसे सहमति दी, सुप्रीम कोर्ट जिस जज के नेतृत्व में जाँच कराना चाहती थी राज्य सरकार ने सहमति दी. राज्य सरकार पारदर्शी तरीक़े से काम कर रही है, तभी तो सुप्रीम कोर्ट के इच्छानुसार निर्णय करती है."

सुखविंदर सिंह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों के प्रति अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहते हैं, "अब मुख्यमंत्री तो हमारे योगी जी हैं. हम उन्हीं से गुहार लगा सकते हैं. इनके अलावा आगे जाने का हमारे पास कोई रास्ता है नहीं. लेकिन न योगी जी ने न मोदी जी ने, आज तक बीजीपी के किसी नेता ने हमारे पास न कोई फ़ोन किया है, न हमारे दरवाज़े पर आया, न हमारा हाल चाल ही पूछा है."

लेकिन सुखविंदर सिंह को सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिलने का पूरा का भरोसा है.

वह कहते हैं, "मामला अगर सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में है तो अच्छी बात है. सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में ना होता तो इनको जेल भी नहीं होती. लेकिन सुप्रीम कोर्ट अपनी जगह पर काम कर रहा है और यह अपनी जगह पर काम कर रहे हैं. कहीं न कहीं से कोई दबाव किसी तरफ़ से है जो इतनी जल्दी बेल मिल गयी. एक क़त्ल का आरोप होता है तो बेल नहीं मिलती है, छह-छह महीना, सात-सात महीना, साल साल भर लग जाते हैं और इनके ऊपर तो पाँच है."

सवाल पूछने पर गुरविंदर की माँ दलजीत सिर्फ़ रोती हैं. वह कहती हैं, "अब न्याय कहाँ मिलेगा हमको? न्याय मिलना होता तो ऐसे ज़मानत मिल जाती?"

'हमें सिर्फ़ इंसाफ़ चाहिए'

सुखविंदर सिंह के घर से 12 किलोमीटर दूर नानपारा में ही दलजीत सिंह का घर भी है. 37 साल के दलजीत सिंह भी तीन अक्टूबर को तिकुनिया में मारे गए थे.

दलजीत सिंह के भाई जगजीत सिंह कहते हैं, "जब वह मुख्य अभियुक्त हैं, साज़िशकर्ता हैं, साज़िश के तहत हमारे परिवारों को उजाड़ा है, तो उसके बाद कैसे कह सकते हैं कि यह जाँच के दायरे में हो रहा है. पारदर्शिता तो हमको दिखाई दे नहीं रही है."

किसान दलजीत सिंह की पत्नी परमजीत सिंह बात करते-करते रो पड़ती हैं.

वह कहती हैं, "हमें सिर्फ़ इंसाफ चाहिए. हमारे आदमी का कोई कुसूर बताये. जो चुपचाप जा रहा था उसके ऊपर गाड़ी...यह हमसे नहीं सहा जाता. छोटा सा बच्चा हमारे साथ में है, पाँच महीने हो रहे हैं वो खाना सही से नहीं खा रहा है."

परमजीत कहती हैं कि दलजीत आंदोलन में शामिल होने के लिए दिल्ली भी गए थे. पहले भी जाते थे प्रदर्शन करने, पहली बार नहीं गए थे. लेकिन ऐसी कोई जानकारी नहीं थी कि सरकार के रहते यह भी हो सकता है. सरकार कहती है कि गुंडा राज ख़त्म करेंगे, कहाँ करेंगे? गुंडे तो उसने पाल रखे हैं. कुछ नहीं है सरकार."

सवाल यह भी बनता है कि चुनावी माहौल में कोर्ट का आशीष मिश्रा को ज़मानत देना क्या कुछ असर डालेगा?

इसके बारे में जगजीत सिंह कहते हैं, "भाजपा जो भी काम कर रही है सिर्फ़ चुनाव को लेकर कर रही है. मंत्री को अभी तक नहीं हटाया, वो पद पर बैठे हुए हैं और रैलियां हो रही हैं, सब काम हो रहे हैं. उसी बीच में इसे बेल देना, यह बहुत बड़ा मुद्दा है."

केंद्रीय मंत्री ने नहीं की टिप्पणी

केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र टेनी आज कल अपने इलाक़े में ही हैं और चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं.

शुक्रवार को उनसे मुलाक़ात भी हुई लेकिन उन्होंने चुनाव प्रचार में बहुत ज़्यादा व्यस्त होने का हवाला देते हुए इस मामले में कुछ भी कहने से इनक़ार कर दिया.

ज़मानत देते हुए अदालत ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आशीष मिश्र को ज़मानत देते हुए कहा, "यह निर्विवाद है कि, मरने वाले किसानों के शरीर पर गोली लगने का कोई घाव नहीं है और सिर्फ़ गाड़ी की टक्कर से होने वाली चोटों के निशान हैं."

जस्टिस राजीव सिंह ने यह भी कहा, "कोर्ट इस बात से आँख नहीं मूँद सकता है कि थार गाड़ी के ड्राइवर और उसमें बैठे दो और लोगों की प्रदर्शनकारियों ने हत्या कर दी. तस्वीरों में प्रदर्शनकारियों की निर्दयता साफ़ नज़र आ रही है. इस मामले में चार प्रदर्शनकारियों की पहचान भी हुई है और उनको चार्जशीट भी किया गया है."

गोली चलाने और गोली से किसी के घायल होने के बारे में अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा, "इन सभी साक्ष्य और परिस्थितियों के मद्देनज़र, एफ़आईआर में आशीष मिश्र पर फ़ायरिंग का आरोप लगाया गया था लेकिन फ़ायरिंग से होने वाले घाव ना तो मरने वाले किसानों पर और ना ही घायलों के शरीर पर पाए गए."

अदालत ने आगे कहा, "अभियोजन पक्ष का यह भी आरोप था कि आशीष मिश्र ने अपने ड्राइवर हरी ओम को प्रदर्शन कर रहे किसानों को मारने के लिए उकसाया, लेकिन ड्राइवर और गाड़ी में मौजूद दो अन्य लोगों को प्रदर्शनकारियों ने मार डाला. आशीष मिश्र को नोटिस जारी हुआ था और वो जाँच अधिकारी के सामने पेश हुए और इस मामले में आरोप पत्र भी दाख़िल हो चुका है. इन सभी परिस्थितियों के मद्देनज़र कोर्ट का मानना है कि आशीष मिश्र को ज़मानत पर रिहा करना चाहिए."

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