ओडिशा के बाद इस जगह मिला दुर्लभ पीले रंग का कछुआ, जानें क्यों होता है इनका ऐसा कलर
नई दिल्ली। भारत में पीले रंग के कछुओं को बेहद दुर्लभ प्रजाति में रखा गया है। इनकी तादाद कम होने से यह वन्यजीव तस्करों के निशाने पर भी रहते हैं। हाल ही में एक ऐसे ही पीले रंग के दुर्लभ कछुए को पश्चिम बंगाल के एक तालाब से ग्रामीणों द्वारा बचाया गया। इस साल यह दूसरी बार है जब देश में चमकीले पीले रंग का कछुआ देखा गया है। इससे पहले एक ऐसा ही कछुआ ओडिशा के बालासोर जिले में ग्रामीणों ने पाया और फिर उसे जुलाई के महीने में वन विभाग को सौंप दिया गया।

पश्चिम बंगाल के तालाब में मिला दुर्लभ कछुआ
दुनिया में कई तरह के कछुए पाए जाते हैं लेकिन चमकीले पीले रंग का कछुआ अपने आप में ही दुर्लभ है। सोशल मीडिया पर भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के अधिकारी देबाशीष शर्मा ने अपने ट्विटर हैंडल पर पश्चिम बंगाल से मिले कछुए की तस्वीर पोस्ट की है। देबाशीष शर्मा ने कैप्शन में बताया कि इस कछुए को पश्चिम बंगाल में बर्दवान के एक तलाबा से बचाया गया है। उन्होंने लिखा, यह एक अल्बिनो प्रकार का कछुआ है।

इस वजह से होता है पीला रंग
देबाशीष शर्मा के मुताबिक ऐसे कछुए टाइरोसिन वर्णक की अनुपस्थिति के कारण, जेनेटिक म्यूटेशन या जन्मजात विकार के चलते अजीब पीले रंग के साथ पैदा होते हैं। कुछ ऐसे कछुए भी पाए गए हैं जिनकी सिर्फ गर्दन पीले रंग की होती है लेकिन उनका पूरा शरीर मटमैला होता है। चमकीले पीले रंग के कछुओं की तस्करी काफी अधिक होती है, इनको दवाओं और खाने के लिए बाजार में महंगे दामों पर बेचा जाता है।

चमकीली और पीली हो जाती है चमड़ी
कई एक्सपर्ट का मानना है कि इनका ऐसा रंग क्रोमेटिक ल्युसिज्म की वजह से भी होता है। एक्सपर्ट ने बताया कि इस वजह से ऐसे कछुए की परत चमकीली और पीली हो जाती है। ल्यूसिज्म शरीर की त्वचा को सफेद, पीला या चित्तिदार या फिर किसी और रंग का बनाने में अहम भूमिका निभाता है। एक्सपर्ट ने कहा कि कलर पिगमेंटेशन जानवरों में नहीं बनता है और इस वजह से त्वचा का रंग बदल जाता है। यह ऐसा है जैसे इंसानों में सफेद दाग होता है। इंसानो में पिगमेंटेशन की कमी से उनकी त्वचा पर सफेद रंग के धब्बे बन जाते हैं, जिसे विटिलिगो कहते हैं।

कछुए की प्रजाति अभी स्पष्ट नहीं
पूर्ण रूप से पीले रंग के कछुओं के मिलने की संभावना काफी कम होती है। एक अन्य IFS अधिकारी रमेश पांडे ने भी कछुए की तस्वीरें शेयर की हैं। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि यह एक नई प्रजाति है या अल्बिनो कछुआ है। रमेश पांडे ने कहा, 'इस वर्ष यह दूसरी घटना है जब किसी क्षेत्र में पीला फ्लैपशेल कछुआ पाया गया है। इससे पहले ओडिशा के बालासोर में एक पीला फ्लैपशेल कछुआ पाया गया था। अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि कछुआ नई प्रजाति या ऐल्बिनिजम या उत्परिवर्ती अल्बिनो प्रजाति का है।
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