दुष्कर्म के आरोपी आसाराम को सुप्रीम कोर्ट से मिली अंतरिम जमानत, लेकिन अभी जेल में ही रहना होगा
नई दिल्ली से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने 83 वर्षीय विवादित स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम बापू को चिकित्सा आधार पर अंतरिम जमानत दे दी है। 2013 के बलात्कार मामले में दोषी आसाराम को उनकी खराब स्वास्थ्य स्थिति के मद्देनजर यह राहत दी गई है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच जिसमें जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस राजेश बिंदल शामिल थे। उन्होंने उनकी जमानत अवधि 31 मार्च 2025 तक तय की है। हालांकि एक अन्य बलात्कार मामले में आसाराम को अभी जेल में ही रहना होगा।
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सख्त शर्तें और अनुयायियों से दूरी
अंतरिम जमानत के दौरान अदालत ने सख्त शर्त लगाई है कि आसाराम अपने अनुयायियों से नहीं मिलेंगे। अदालत ने निर्देश दिया कि इलाज के लिए पुलिस सहायता प्रदान की जाएगी। लेकिन उन्हें इलाज के स्थान का खुलासा नहीं किया जाएगा। यह कदम न्यायपालिका द्वारा अपराधियों के स्वास्थ्य अधिकारों और कानूनी शर्तों के बीच संतुलन बनाए रखने की एक मिसाल है।

स्वास्थ्य समस्याओं के कारण राहत
आसाराम की कानूनी टीम ने अदालत को उनके गंभीर स्वास्थ्य मुद्दों के बारे में बताया। उन्हें हृदय संबंधी बीमारी और अन्य गंभीर समस्याओं के लिए पहले भी एम्स जोधपुर और पुणे में भर्ती कराया गया था। इस आधार पर उन्होंने चिकित्सा उपचार की मांग की थी। इससे पहले उन्हें 17 दिन की पैरोल दी गई थी। जिसमें वह 1 जनवरी को जेल लौट आए थे।
आसाराम के खिलाफ मामलों की पृष्ठभूमि
आसाराम बापू जिनका असली नाम असुमल सिरुमलानी हरपलानी है। उनको 2018 में जोधपुर अदालत ने अपने आश्रम में 16 वर्षीय लड़की के बलात्कार के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके अलावा गांधीनगर के एक अन्य मामले में उन्हें 2013 में एक महिला के साथ बलात्कार का दोषी पाया गया था।
गुजरात हाईकोर्ट ने खारिज की सजा निलंबन की याचिका
पिछले साल गुजरात उच्च न्यायालय ने आसाराम की आजीवन कारावास की सजा को निलंबित करने की याचिका को खारिज कर दिया था। अदालत ने कहा कि उनके तर्क राहत देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी संकेत दिया था कि सजा निलंबन पर केवल चिकित्सा आधार पर विचार किया जा सकता है।
न्याय और स्वास्थ्य चिंताओं का संतुलन
आसाराम के मामलों ने भारतीय न्यायपालिका के सामने यह चुनौती प्रस्तुत की है कि गंभीर अपराधों के दोषियों के स्वास्थ्य अधिकारों का कैसे ध्यान रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस बात को सुनिश्चित करता है कि उनकी चिकित्सा जरूरतों को पूरा किया जाए। जबकि कानूनी प्रक्रिया और न्याय प्रणाली बाधित न हो।












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