Ramcharitmanas Row in Bihar: 'पूजहि विप्र सकल गुण हीना...' का जानिए सही अर्थ, क्या कहते हैं जानकार?
Ramcharitmanas Row: तुलसीदास ने रामचरितमानस में 'विप्र' शब्द का प्रयोग आत्मज्ञानी व्यक्ति के लिए और 'शुद्र वेद प्रवीणा' का प्रयोग दिखावटी लोगों के लिए किया है।

Ramcharitmanas Row in Bihar: ठंड से कांप रहे बिहार के सियासी गलियारे उस वक्त नेताओं की बहस से गर्म हो गए जिस वक्त बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर सिंह ने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथ 'रामचरितमानस' को नफरत फैलाना वाला बताया। गौरतलब है कि 11 जनवरी को नालंदा ओपेन यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में छात्रों को संबोधित करते हुए शिक्षा मंत्री ने कहा था कि 'रामचरितमानस समाज को विभाजित करने वाली किताब है। इसके रचयिता दलितों, पिछड़े वर्गों और महिलाओं को शिक्षा से वंचित करने की बात करते हैं, सच तो ये है कि वास्तव में 'रामचरितमानस' और 'मनुस्मृति' समाज में नफरत को जन्म देते हैं।'
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'पूजहि विप्र सकल गुण हीना... ' पर मचा बवाल
अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए शिक्षा मंत्री ने रामचरित मानस की कुछ पंक्तियां भी पढ़ीं, जो कि निम्नलिखित थीं-'पूजहि विप्र सकल गुण हीना । शूद्र न पूजहु वेद प्रवीणा '..., जिसका मतलब उन्होंने बताया कि' ब्राह्मण चाहे कितना भी ज्ञान गुण से रहित हो, उसकी पूजा करनी ही चाहिए, और शूद्र चाहे कितना भी गुणी ज्ञानी हो, वो कभी पूज्यनीय नहीं हो सकता॥' उन्होंने 'विप्र' का मतलब 'ब्राह्मण' से निकाल दिया और 'शूद्र' को उन्होंने वर्ण व्यवस्था के आधार पर समाज के दलितों और पिछड़े वर्गों से जोड़ दिया।

'...ऐसा व्यक्ति कभी भी पूज्यनीय नहीं होता'
जबकि अर्थ ये नहीं है, धर्मगुरु डॉ. राघवेंद्र भट्ट ने वनइंडिया से खास बातचीत में कहा कि ' अवधी भाषा में लिखी गई इस पंक्ति का वास्तविक मतलब ये है कि 'वो इंसान जिसका कि आत्मा से सीधे साक्षात्कार हो चुका हो, जो सभी बंधनों और माया-मोह से मुक्त हो लेकिन बाहरी रूप से जड़ स्वरूप हो और हो सकता है कि उसमें कोई गुण भी ना दिखाई दे तो भी वो पूज्यनीय है और ऐसा इंसान जो कि किताब पढ़कर ज्ञान तो बांटे लेकिन असल में ना तो उसे शास्त्रों के अर्थ का पता हो और ना ही वो उसके व्यवहार और सोच में उन बातों का भाव दिखता हो,तो ऐसा व्यक्ति कभी भी पूज्यनीय नहीं होता।'

'विप्र' शब्द का प्रयोग आत्मज्ञानी व्यक्ति से
तुलसीदास ने यहां 'विप्र' शब्द का प्रयोग आत्मज्ञानी व्यक्ति के लिए किया है और 'शुद्र वेद प्रवीणा' का प्रयोग दिखावटी और पाखंडी लोगों के लिए किया है, जो कि ज्ञान तो बहुत बांटते हैं लेकिन असल जीवन में ज्ञान का ककहरा भी उन्हें नहीं पता होता है। यही नहीं इसी ग्रंथ के सुंदरकांड में तुलसीदास ने प्रभु हनुमान के लिए भी 'विप्र' शब्द का प्रयोग किया है, जहां भी उनका अर्थ 'आत्मज्ञान' से ही था। अब तुलसीदास ने जिस शब्द का प्रयोग ईश्वर के लिए किया है, उसका अर्थ ब्राह्मण से कैसे संभव है?
शिक्षा मंत्री ने दोहे का बदला भाव
शिक्षा मंत्री ने इसके बाद जो पंक्ति पढ़ी वो थी-'अधम जाति में विद्या पाए, भयहु यथा अहि दूध पिलाए' , जिसका मतलब उन्होंने बताया कि निम्न वर्ग के लोग शिक्षा पाकर सांप की तरह जहरीले हो जाते हैं।' जबकि इसका वास्तविक भाव ये है कि ' ब्राह्मण यानी कि सदाचारी व्यक्ति अगर कटु वचन कहे या श्राप भी दे तो भी वो पूजा करने के योग्य है लेकिन अगर वो ब्राह्मण केवल जन्म से है और उसके व्यवहार में कोई सदाचारी गुण नहीं है तो वो पूज्यनीय नहीं है।' ये चौपाई भगवान श्रीराम और कबंध राक्षस के बीच की है।

ढोल ,गंवार ,शूद्र ,पशु, नारी' पर भी विवाद
वैसे ये पहली बार नहीं है जब पवित्र ग्रंथ की चौपाइयों पर सवाल खड़े किए गए हैं। अक्सर लोग तुलसीदास द्वारा लिखी गई पंक्ति ' ढोल ,गंवार ,शूद्र ,पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी' को नारी विरोधी बताते हैं। ये चौपाई उन्होंने सुंदरकांड में लिखी है जो कि 58वें दोहे के बाद आती है। जिसका अर्थ लोग निकालते हैं कि ढोल ,गंवार ,शूद्र ,पशु और नारी सभी ताड़ना यानी कि मारने-पीटने के अधिकारी हैं। जबकि ये सरासर गलत बात है। इस पंक्ति का सही अर्थ समझने के लिए आपको पूरा दोहा पढ़ना होगा, जो कि निम्नलिखित है
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गंवार शूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
जिसका अर्थ है कि-हे ईश्नर आपने बहुत अच्छा किया कि आपने मुझे शिक्षा दी कि जिससे मैं ज्ञान का मतलब जान पाया है और इसलिए मेरी नजर में ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और स्त्री ये सब देखरेख के अधिकारी हैं। तुलसीदास ने यहां ताड़ना शब्द का प्रयोग कष्ट, प्रताड़ना या नफरत के लिए नहीं किया है बल्कि यहां उनके 'ताड़ना' (अवधी भाषा) शब्द का आशय दृष्टि रखने से हैं। उनके मुताबिक ढोल (ढोलक),गंवार (अनपढ़) ,शूद्र (वंचित वर्ग) ,पशु (जानवर) और नारी (स्त्री) सभी को देखरेख की जरूरत होती है,आपको बता दें कि ये पंक्तियां "राम- समुद्र" संवाद की हैं।
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रामचरितमानस को समझने के लिए चाहिए भाव: डॉ. मनोज मिश्र
रामचरितमानस पर बचे बवाल पर डॉ. मनोज मिश्र (अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विवि) ने वनइंडिया से एक्सक्लूसिव बातचीत में कहा कि 'गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस को समझने के लिए एक विशेष भाव और ज्ञान की जरूरत है, महज मंत्री बन जाने से किसी को बौद्धिक ज्ञान नहीं आ जाता, हां लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि एक गणमान्य पद पर बैठने वाले व्यक्ति के पास बुद्धि-कौशल हो, उन्होंने बिना शिक्षामंत्री का नाम लिए कहा कि कभी-कभी लोग इस तरह की बयानबाजी राजनीतिक निहितार्थ के लिए प्रयोग करते हैं।'
'शबरी' और 'निषाद' का भी जिक्र
उन्होंने कहा कि 'तुलसीदास के ग्रंथ को समझने के लिए आपको अवधी भाषा और उसके अर्थ को समझना बहुत जरूरी है। बिना सोचे-समझे किसी भी धार्मिक ग्रंथ के बारे में इस तरह कि टिप्पणी करना अशोभनीय है। भगवान राम सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं। इसी रामचरित मानस में ही 'शबरी' का जिक्र है, इसी में 'निषाद' की बात कही गई है तो कहां से ये ग्रंथ समाज में नफरत को जन्म देते हैं। राम और तुलसीदास को समझने के लिए ज्ञान की जरूरत है। ये बहस का नहीं अध्ययन का विषय है, खास करके उन लोगों को जो कि बिना सोचे-समझे कुछ भी कह देते हैं।'












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