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Rajya Sabha Election में क्यों नहीं होता है गुप्त मतदान और क्या है इस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जानें

Rajya Sabha Election: भारत में गुप्त मतदान की व्यवस्था है, ताकि मतदाताओं के ऊपर किसी तरह का दबाव न हो। हालांकि, संसद के उच्च सदन राज्यसभा में वोटिंग के लिए ओपन बैलेट प्रक्रिया अपनाई जाती है। ओपन बैलेट प्रक्रिया में मतदान गुप्त नहीं रहता है। राज्यसभा सदस्यों के निर्वाचन के लिए मतदाता वोट नहीं डालते हैं, बल्कि जनप्रतिनिधि मतदान करते हैं। 19 जून को 8 राज्यसभी सीट के लिए वोटिंग होगी। उससे पहले चुनाव प्रक्रिया के बारे में विस्तार से समझते हैं और यह भी जानते हैं कि क्यों गुप्त मतदान नहीं किया जाता है।

Rajya Sabha Election में वोट कौन डालता है?

Rajya Sabha Election
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Rajya Sabha Election में गुप्त मतदान होता है?

नहीं, राज्यसभा चुनाव में गुप्त मतदान नहीं किया जाता है। मतदान करने के बाद विधायकों को पर्ची अपनी पार्टी के प्रतिनिधि को दिखाना होता है। अगर कोई सदस्य अपनी पर्ची पार्टी के नियुक्त एजेंट को नहीं दिखाता है या फिर दूसरी पार्टी के एजेंट को दिखाता है, तो उसका वोट रद्द माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्यसभा चुनाव में धनबल का प्रयोग रोकने और पारदर्शिता को बढ़ावा देने की जरूरत को स्वीकार करते हुए ओपन बैलेट प्रक्रिया को वैध ठहराया है।

Rajya Sabha Election में ओपन बैलेट वोटिंग कब शुरू हुई थी?

पहले राज्यसभा में गुप्त मतदान की व्यवस्था थी, लेकिन साल 2001 में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार यानी एनडीए ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन किया, जिसके बाद से राज्यसभा चुनाव में ओपन बैलेट सिस्टम की शुरुआत हुई थी।

Rajya Sabha Election में गुप्त मतदान क्यों शुरू किया गया?

राज्यसभा चुनाव में धनबल-बाहुबल के साथ क्रॉस वोटिंग को रोकने के लिए इसकी शुरुआत की गई थी। इसके पीछे तर्क है कि यह उच्च सदन के सदस्यों के चुनाव में पारदर्शिता सुनिश्चित करता है। साथ ही, चुनाव में प्रलोभनों पर लगाम लगाने के साथ जनप्रतिनिधियों के भी उत्तरदायित्व और पार्टी के लिए निष्ठा की पुष्टि होती है।

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Rajya Sabha Election में ओपन बैलेट सिस्टम पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या है?

ओपन बैलेट सिस्टम को वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए इसे खारिज करने की मांग की थी। नैयर ने अपनी याचिका में दावा किया था कि यह एक मतदाता की अभिव्यक्ति और चुनाव की स्वतंत्रता के खिलाफ है। यह लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश वाई. के. सभरवाल की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने इस केस की सुनवाई की थी। पांच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से 22 अगस्त, 2006 को 'ओपन बैलेट' प्रणाली की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था।

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