'राहुल गांधी बन सकते हैं नए आंबेडकर' कांग्रेस नेता के बयान से राजनीतिक बवाल, क्या है मामला?
Rahul Gandhi second Ambedkar: भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व हमेशा से नीतिगत बहसों का केंद्र रहे हैं। लेकिन अब कांग्रेस नेता डॉ. उदित राज के एक बयान ने इस बहस को नई ऊंचाई और नई दिशा दे दी है। उन्होंने कहा है कि अगर OBC वर्ग (अन्य पिछड़ा वर्ग) राहुल गांधी के विचारों को समझे और उनका समर्थन करे, तो वह उनके लिए 'दूसरे आंबेडकर' साबित हो सकते हैं।
इस बयान ने न केवल कांग्रेस खेमे में उत्साह बढ़ाया है, बल्कि राजनीतिक गलियारों में एक भूचाल खड़ा कर दिया है। कई लोग इसे सामाजिक परिवर्तन की नई दस्तक मान रहे हैं, तो कुछ इसे एक रणनीतिक बयान के रूप में देख रहे हैं।

क्या कहा डॉ. उदित राज ने?
डॉ. उदित राज ने शनिवार को ANI से बात करते हुए कहा, 'तेलंगाना में की गई जातिगत जनगणना समाज का एक्स-रे है। राहुल गांधी चाहते हैं कि यह प्रक्रिया पूरे देश में हो। उनकी सोच दूरदर्शी है। अगर OBC और दलित वर्ग राहुल गांधी की बातों को समझे और आगे आएं, तो सामाजिक असमानता घटेगी और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। राहुल गांधी उनके लिए दूसरे आंबेडकर साबित हो सकते हैं।'
इसके साथ ही उन्होंने X (पूर्व ट्विटर) पर भी लिखा, 'इतिहास बार-बार अवसर नहीं देता। OBC समाज को राहुल गांधी के विचारों का समर्थन करना चाहिए। अगर वे साथ आएं, तो राहुल गांधी उनके लिए वही बन सकते हैं जो बाबा साहेब आंबेडकर दलितों के लिए बने।'
राहुल गांधी की स्वीकार की गलती
शुक्रवार(25 जुलाई) को दिल्ली के टॉकाटोरा स्टेडियम में आयोजित 'भागीदारी न्याय सम्मेलन' में राहुल गांधी ने पहली बार यह सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि UPA सरकार के समय जातिगत जनगणना नहीं कराना एक गंभीर गलती थी। उन्होंने कहा कि, 'मैंने आदिवासियों, दलितों और महिलाओं के मुद्दों को समय रहते समझा और उनके लिए काम किया। मनरेगा, भूमि अधिग्रहण कानून, ट्राइबल एक्ट इन पर मुझे अच्छे अंक मिलने चाहिए। लेकिन OBC के मुद्दों को मैं तब गहराई से नहीं समझ पाया, यह मेरी कमी थी। अगर तब समझता, तो जाति आधारित जनगणना करवा देता।' राहुल ने आगे कहा कि आज उन्हें इस गलती का एहसास है और अब वे उसे सुधारने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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90% आबादी, लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी नहीं?
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक मिलाकर देश की करीब 90% आबादी बनाते हैं, लेकिन उन्हें अब तक नीति-निर्माण और बजट जैसे अहम निर्णयों में हिस्सा नहीं दिया गया। 'जातिगत जनगणना इस असंतुलन को तोड़ने का सबसे प्रभावी तरीका है। जब तक हम यह नहीं करेंगे, तब तक सामाजिक न्याय अधूरा रहेगा।'
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