राहुल गांधी जी, ये हैं रियल इस्टेट से जुड़ी आम जनता की समस्याएं
नई दिल्ली। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जब से नया अवतार धरा है, तब से समस्याओं से घिरे उन लोगों के मन में उम्मीदों की किरणें जागी हैं, जिन्हें लगता है कि मोदी सरकार उनके लिये कुछ नहीं करेगी। या फिर जिन्हें लगता है कि नरेंद्र मोदी सरकार तक उनकी फरियाद नहीं पहुंच पायेगी।
खैर हमने बेंगलुरु, नोएडा और दिल्ली में बिल्डरों के सताये हुए कुछ लोगों से बात की तो उन्होंने अपनी समस्याएं गिना डालीं। भले ही ये समस्याएं तीन बड़े शहरों के लोगों ने गिरायी हैं, लेकिन सच पूछिए तो देश के सभी शहरों में ऐसा ही कुछ हाल है। समस्याएं इस प्रकार हैं
- फ्लैट खरीदने से पहले जब तक एडवांस डिपॉजिट नहीं जमा करते, तब तक बिल्डर प्रॉपर्टी के कागज नहीं दिखाते।
- फ्लैट खरीदने से पहले अगर ग्राहक बिल्डर से प्रॉपर्टी के डॉक्यूमेंट्स की फोटो-कॉपी मांगता है, तो उसे मना कर देते हैं।
- जब तक फ्लैट ओनर कब्जा नहीं लेता है, तब तक बिल्डर उसकी हर बात मानता है, लेकिन कब्जा होने के बाद एक नहीं सुनता।
- दो साल के अंदर-अंदर इमारत में कोई क्रैक या फिर सीलन आती है, तो उसकी मरम्मत की जिम्मेदारी बिल्डर की होनी चाहिये।
- इलेक्ट्रिक बिल, वॉटर बिल, आदि के लिये जब एनओसी मांगते हैं, तब बिल्डर आनाकानी करते हैं। कई बार पता चलता है कि पहले के बिल बकाया हैं।
- ज्यादातर बिल्डर सीवर लाइन को मेन-होल तक कनेक्ट नहीं करते हैं। यह काम बाद में फ्लैट में रहने वाले लोगों को करवाना पड़ता है।
- इमारत बनाते वक्त बिल्डर जमकर नियमों का उल्लंघन करते हैं, जिसका पता उपभोक्ता को तब चलता है, जब एक या दो साल बाद नगर निकाय से नोटिस आता है। क्या ऐसा कानून नहीं बन सकता, जिसमें बिल्डिंग के निर्माण होते वक्त बीच-बीच में नगर निकाय के अधिकारी चेक करें और अगर डेविएशन हों, तो बिल्डिंग बनने से पहले ही रोक लगा दें।
- अधिकांश बिल्डर ग्रह कर यानी हाउस टैक्स के लिये फॉरमैलिटीज़ पूरी नहीं करते हैं। ऐसे में उपभोक्ताओं को नगर निकाय के सैंकड़ों चक्कर काटने पड़ते हैं, जब जाकर उनके नाम से हाउस टैक्स बनता है।
- बिल्डिंग के ऊपर पेंटहाउस बनाने का नया ट्रेंड शुरू हुआ है। ऐसा करने वाले बिल्डर कभी भी बिल्डिंग ओनर्स एसोसिएशन के नाम नहीं करते, क्योंकि ऐसा करने पर पेंट हाउस का किराया आना बंद हो जायेगा।
- तमाम बिल्डर सोलर पावर से गर्म होने वाले पानी के लिये कनेक्शन की सुविधा देने के अनिवार्य नियम का उल्लंघन जमकर करते हैं।
- बिल्डर पैसा बचाने के चक्कर में टॉयलेट और बाथरूम की वॉटरप्रूफिंग नहीं करते हैं, इस वजह से बिल्डिंग में सीलन आती है।
- नक्शा पास होता है 4 फ्लैट का, लेकिन बना डालते हैं 6 फ्लैट। इस वजह से आगे चलकर उपभोक्ताओं को भारी दिक्कतें होती हैं।
- फ्लैट का कार्पेट एरिया फ्लैट के कुल क्षेत्रफल से 10 से 20 फीसदी कम होना चाहिये, जबकि बिल्डर इसे 30 फीसदी तक कम कर देते हैं।













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