राहुल गांधी को जिस मामले में सजा मिली, 2019 के चुनाव में EC ने उन्हें छोड़ा क्यों था? बीजेपी ने की थी शिकायत
कांग्रेस चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर कई बार गंभीर आरोप लगा चुकी है। लेकिन, अब एक मामला सामने आया है, जिससे पता चलता है कि 2019 के चुनाव में इसने राहुल गांधी पर एक तरह से 'दरियादिली' दिखाई थी।

कांग्रेस ने हाल के दिनों में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। लेकिन, पार्टी के नेता राहुल गांधी के मामले में एक बड़ी जानकारी ये सामने आई है कि जिस मामले में उन्हें सूरत कोर्ट ने गुनहगार माना है, उसी मामले में चुनाव आयोग ने शिकायत के बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। मामला 2019 के लोकसभा चुनावों का है, जब राहुल ने मोदी सरनेम वाला विवादास्पद बयान दिया था। बीजेपी ने चुनाव आयोग को एक ज्ञापन सौंपकर उनकी लिखित शिकायत की थी, लेकिन शायद आयोग ने उसे ठंडे बस्ते में डाले रखना ही बेहतर समझा।

राहुल गांधी पर चुनाव आयोग की दरियादिली?
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 'मोदी सरनेम' वाली विवादित टिप्पणी 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान ही कर्नाटक के कोलार में की थी। उसी मामले में गुजरात की सूरत कोर्ट ने उन्हें दोषी पाया और दो साल की सजा तय की। इसी की वजह से उनकी लोकसभा सदस्यता भी चली गई है। ऐसा नहीं है कि उस लोकसभा चुनावों के दौरान चुनाव आयोग को उनकी विवादित टिप्पणी की जानकारी नहीं मिली थी। ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 7 मई, 2019 को ही बीजेपी ने इस मामले में चुनाव आयोग के सामने उनकी शिकायत की थी। लेकिन, तब से चुनाव आयोग इस शिकायत पर कोई कार्रवाई करने के बजाय कुंडली मारकर बैठे रहना ही बेहतर समझा है।

बीजेपी ने 2019 के चुनावों के दौरान ही शिकायत की थी
7 मई, 2019 को बीजेपी ने भारतीय चुनाव आयोग को ज्ञापन सौंपा था, जिसमें राहुल के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 और आदर्श आचार संहिता के 'निर्ल्लजता' के साथ उल्लंघन करने की शिकायत की गई थी। भाजपा के ज्ञापन में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ 11 शिकायतें की गई थीं, जिसमें मोदी सरनेम वाला उनका विवादित बयान भी शामिल था, जो उन्होंने अप्रैल, 2019 में कर्नाटक के कोलार की एक चुनावी सभा में दिया था। बीजेपी की शिकायतों में यह सातवें नंबर पर था और तब चुनाव आयोग ने इसपर न तो कोई फैसला लिया और न ही किसी तरह की कार्रवाई की।

चुनाव आयोग ने सिर्फ इस वजह से राहुल गांधी को छोड़ दिया?
2019 में लोकसभा चुनाव सात चरणों में हुए थे, जो कि 11 अप्रैल से लेकर 19 मई तक चले थे। सूत्रों का कहना है कि बीजेपी की शिकायत पर चुनाव आयोग ने इसलिए कोई फैसला नहीं लिया, क्योंकि चुनाव की अवधि समाप्त ही होने जा रही थी। अखबार को चुनाव आयोग के शीर्ष सूत्रों ने बताया है कि, 'आचार संहिता संबंधी कार्रवाई लेवल प्लेइंग फिल्ड उपलब्ध करवाने के लिए की जाती है। अगर कोई कार्रवाई होती, जैसे कि कैंपेन पर रोक, एडवाइजरी या इसी तरह का कुछ तो इसका बहुत ही कम समय बचा था या उस अवस्था में कोई प्रभाव नहीं पड़ता। क्योंकि, चुनाव अभियान लगभग समाप्त ही हो चुके थे। इसलिए चुनाव आयोग ने बीजेपी की शिकायत पर उस समय कोई फैसला नहीं किया। '
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चुनाव आयोग ऐसे मामलों में लेता है सख्त ऐक्शन
व्यवस्था ये है कि अगर चुनाव आयोग को लगता है कि कोई भी भाषण आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है तो वह एडवाइजरी से लेकर, चेतावनी तक जारी करता है या यहां तक कि कैंपेन पर भी रोक लगा देता है, जो भी उसके हिसाब से उचित होता है। लेकिन, राहुल गांधी के मामले में चुनाव आयोग की ओर से किसी तरह का ऐक्शन ही नहीं लिया गया और लगता है कि न ही बीजेपी की शिकायतें ही खारिज ही की गईं। तब चुनाव आयोग के पास राहुल गांधी समेत आचार संहिता के उल्लंघन के करीब 18 मामले अंतिम फैसले के लिए लंबित थे। ईटी के मुताबिक चुनाव आयोग ने अखबार की ओर से भेजे गए सवालों का जवाब भी नहीं दिया।

राहुल पर 'झूठे' आरोप लगाने की भी हुई थी शिकायत
एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने भी इस बात की पुष्टि की है कि चुनाव आयोग के सामने राहुल गांधी के खिलाफ 2019 के चुनाव अभियान के भाषणों को लेकर कई सारी शिकायतें की गईं, जिसपर चुनाव आयोग को अपने विवेक से फैसला लेना था। 7 मई, 2019 को चुनाव आयोग में राहुल के खिलाफ ज्ञापन लेकर जाने वालों में भूपेंद्र यादव, मुख्तार अब्बास नकवी, संजय मयूख और विजेंद्र गुप्ता जैसे भाजपा नेता शामिल थे। उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ 'निर्लज्जता के साथ पूरी तरह से झूठे, असत्यापित और निराधार आरोपों के उदाहरण, इसकी लगातार एक पैटर्न और डिजाइन ' भी बताई थी। भाजपा की ओर से ज्ञापन में आयोग से यह भी कहा गया था कि राहुल के 'झूठे' आरोपों का जवाब देने में पार्टी सक्षम है, लेकिन चुनाव के समय यह आयोग की जिम्मेदारी बनती है। ज्ञापन के मुताबिक, 'हमें इसकी गंभीरता से आशंका है कि अगर आयोग द्वारा इसे यूं ही अनियंत्रित रहने दिया जाता है, तो सार्वजनिक धारणा में इसकी विश्वसनीयता गंभीर रूप से प्रभावित होगी।'













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