मोदी के ख़िलाफ़ क्या विपक्ष सचमुच एकजुट हो गया है?
कभी ट्रैक्टर, कभी साइकिल, कभी नाश्ता, तो कभी चाय पर चर्चा. इन दिनों कांग्रेस नेता राहुल गांधी राजनीति में पहले से ज़्यादा सक्रिय नज़र आ रहे हैं.
मंगलवार को उन्होंने विपक्षी दलों के सांसदों के साथ नाश्ते पर राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की.
बढ़ती महँगाई पर हल्ला बोल के लिए विपक्षी सांसदों के साथ साइकिल से संसद भवन तक भी गए.

कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से जब विपक्ष के साथ नाश्ता करने की तस्वीर पोस्ट की गई तो कैप्शन दिया गया, "हमारा देश, हमारी जनता, हमारी प्राथमिकता. कांग्रेस पार्टी और विपक्ष, भारत को आगे रखने के लिए एकजुट हैं."
राहुल गांधी ने जब ट्विटर पर महँगाई के ख़िलाफ़ साइकिल यात्रा की तस्वीर पोस्ट की तो साथ में लिखा, "ना हमारे चेहरे ज़रूरी हैं, ना हमारे नाम. बस ये ज़रूरी है कि हम जन प्रतिनिधि हैं- हर एक चेहरे में देश की जनता के करोड़ों चेहरे हैं जो महंगाई से परेशान हैं. यही हैं अच्छे दिन?"
https://twitter.com/RahulGandhi/status/1422462820700942337
दोनों ट्वीट में सत्ता पक्ष और जनता के लिए दो संदेश साफ़ हैं - एक तो विपक्ष एकजुट है और दूसरा चेहरा ज़रूरी नहीं है ना ही नाम ज़रूरी है.
राजनीतिक गलियारों में इस पर खूब चर्चा चल रही है कि 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार के ख़िलाफ़ विपक्ष तैयारी में तीन साल पहले ही जुट गया है.
लेकिन क्या सभी विपक्षी पार्टियों को चाय- नाश्ते पर एक साथ बुला लेना, फोटो खिंचवाना, साइकिल से संसद जाना - इन सबसे विपक्ष एकजुट हो जाएगा?
क्या ये इतना आसान है? और अगर मुश्किल है तो रास्ते की अड़चनें क्या हैं?
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नेतृत्व किसका?
नीरज चौधरी पिछले चार दशक से पत्रकारिता में है. उन्होंने कई सरकारों को अपने सामने बनते और गिरते देखा है.
उनका कहना है, "साथ नाश्ता करना, साइकिल चलाना, नए आइडिया हैं. लेकिन विपक्ष को 'एकजुट' होने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है. सबसे अहम सवाल नेतृत्व (लीडरशिप) का होने वाला है. आख़िर वो किसके नेतृत्व में एकजुट होंगे. वो चेहरा कौन होगा? क्या राहुल वो चेहरा होंगे? और क्या राहुल का नेतृत्व क्षेत्रीय पार्टियों को स्वीकार होगा?"
यहाँ कुछ तथ्य और भी हैं जिन पर ग़ौर करने की ज़रूरत है.
ममता बनर्जी भी हाल में दिल्ली दौरे पर थी. उन्होंने भी राहुल और सोनिया से मुलाक़ात की है. विपक्ष का नेतृत्व वो करेंगी या नहीं, इस पर उनसे स्पष्ट सवाल किया गया, लेकिन उन्होंने सीधा जवाब नहीं दिया.
विपक्षी दलों को साथ लाने की एक कोशिश शरद पवार भी करते दिख रहे हैं. उनके घर पर भी एक बैठक हो चुकी है, जिसमें बहुत ज़्यादा नेता नहीं पहुँचे थे.
ओम प्रकाश चौटाला ने भी तीसरे मोर्चे का राग छेड़ा है. हाल ही में उनकी नीतीश कुमार से लंच पर मुलाक़ात हुई जिसने खूब सुर्खियां बटोरी है.
राहुल गांधी ने भी नाश्ते का निमंत्रण 16 विपक्षी दलों को भेजा था, लेकिन बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी उसमें शामिल नहीं हुए.
ममता बनर्जी, शरद पवार की पार्टियों के साथ शिवसेना, डीएमके, सीपीआई-एम, सीपीआई, आरजेडी, समाजवादी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस, आईयूएमएल, आरएसपी जैसे 14 दलों ने उनका न्योता स्वीकार किया.
नीरजा कहती हैं, "पूरा विपक्ष एक साथ हो जाए 2024 के चुनाव के पहले ये थोड़ा मुश्किल लगता है. कुछ पार्टियाँ ख़ुद को न्यूट्रल कहलाना पसंद करती हैं. जो मुद्दों पर आधारित समर्थन बीजेपी को देती है, लेकिन पूरी तरह से किसी के साथ नहीं है. जैसे नवीन पटनायक, जगन रेड्डी, केसीआर."
यही वजहें हैं कि विपक्ष की एकजुटता में नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं. बीजेपी भी इसी सवाल पर विपक्ष पर वार कर रही है.
हालांकि एक जवाब शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने दिया है. उन्होंने निजी टीवी चैनल में डिबेट के दौरान कहा, "भारत जैसे लोकतंत्र में चेहरा नहीं चाहिए होता है, यहाँ मुद्दे मायने रखते हैं." हालांकि उन्होंने इस सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया कि राहुल का नेतृत्व, शिवसेना को स्वीकार होगा या नहीं.
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मुद्दों पर एकजुटता?
इसलिए विपक्ष की एकजुटता में अब बात मुद्दों की करते हैं.
नाश्ता पार्टी के एक दिन बाद ही संसद परिसर के भीतर कांग्रेस सांसद रवनीत बिट्टू और अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल एक दूसरे से बहस करते नज़र आए. मुद्दा था नए कृषि क़ानून का. सोशल मीडिया पर दोनों की बहस का वीडियो ख़ूब वायरल हो रहा है.
https://twitter.com/prashantjourno/status/1422800579236036610
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन कहते हैं, "कृषि बिल पर ज़्यादातर विपक्षी पार्टियाँ सरकार का विरोध कर रही हैं. वो इस मुद्दे पर विरोध में एक साथ भी हैं. लेकिन किसी विपक्ष ने कभी खुल कर नहीं बताया कि वो सत्ता में आए, तो नए कृषि क़ानून पर क्या करेंगे? क्या उन्हें वापस लेंगे या उसमें फेरबदल करेंगे या एमएसपी पर क़ानून लेकर आएँगे?"
अरविंद मोहन का मानना है कि विपक्ष पहले के मुकाबले ज़्यादा एकजुट ज़रूर दिख रहा है, लेकिन इतने से भी काम नहीं चलने वाला. केवल मोदी को हटाना है - इस एजेंडे से काम नहीं चलेगा. विपक्ष को ठोस मुद्दे चाहिए और उन पर स्पष्ट स्टैंड भी.
वो तेल की क़ीमतों का उदाहरण देकर अपनी बात समझाते हैं.
"यूपीए ने अपने कार्यकाल में तेल की क़ीमतों को बाज़ार भाव से जोड़ा. बीजेपी के कार्यकाल में वो क़ीमतें ज़्यादा ज़रूर बढ़ी हैं. सरकार ने उससे कमाई भी ख़ूब की है. लेकिन विपक्षी गठबंधन का इस पर साफ़ रुख़ क्या होगा? ये अब तक विपक्षी पार्टियों ने साफ़ शब्दों में नहीं बताया."
मुद्दों पर ये स्पष्टता विपक्ष की एकजुटता के लिए समय की माँग है.
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विधानसभा चुनाव में क्या होगा ?
यहाँ एक तीसरी समस्या भी है. वो है राज्य चुनाव में असर.
हालांकि राहुल गांधी की नाश्ता पार्टी में अकाली दल के नेता नज़र नहीं आए थे, लेकिन रवनीत बिट्टू और हरसिमरत कौर बादल की बहस से एक बात साफ़ निकल कर आई वो ये कि मुद्दों पर एक राय राष्ट्रीय स्तर पर हो भी जाए, तो राज्य स्तर पर क्या होगा?
नए कृषि क़ानून का विरोध कांग्रेस भी कर रही है और अकाली दल भी कर रहा है. इस मुद्दे पर दोनों एक हो भी सकते हैं. लेकिन पंजाब में अगले साल चुनाव होने वाले हैं. वहाँ दोनों पार्टियों का स्टैंड क्या होगा? वहाँ क्या ये पार्टियाँ एक दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं लड़ेंगी?
यही हाल उत्तर प्रदेश में है. क्या अगले साल वहाँ होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी साथ लड़ेंगे? जबकि समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव साफ़ कह चुके हैं कि वो विधानसभा चुनाव में छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन करेंगे, न कि बड़ी पार्टियों के साथ.
ऐसे में पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी की हार के बाद विपक्ष को जो ऑक्सीजन मिला था, कहीं वो ऑक्सीजन जीत के रूप में उत्तर प्रदेश में दोबारा से बीजेपी को न मिल जाए. ये तीसरी वजह है जिसको लेकर विश्लेषक 'विपक्षी एकजुटता' को लेकर अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं.
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विपक्ष का बढ़ता आत्मविश्वास
लेकिन कांग्रेस पर कई किताबें लिख चुके रशीद किदवई का कहना है कि तमाम विरोधाभास के बावजूद पहले के मुक़ाबले विपक्ष अब ज़्यादा आश्वस्त और ज़्यादा आत्मविश्वास से भरा हुआ नज़र आ रहा है.
रशीद कहते हैं, "इतिहास में हमने देखा है, जब भी ऐसी सरकारें जो शख़्सियतों के इर्द-गिर्द रही हैं और उनका पतन शुरू हुआ है, उसके बाद गठबंधन की सरकार ही केंद्र में आई है. जैसे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी, इन सबके बाद ऐसे नेता भारत में प्रधानमंत्री पद पर बैठे, जिन्होंने 'खिचड़ी' सरकार का नेतृत्व किया. इस वजह से अगर वर्तमान सरकार के सत्ता से बेदखल होने की नौबत आती है तो गठबंधन की सरकार बन सकती है. इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. राहुल अगर 14 पार्टियों के साथ नाश्ता करते हैं तो एक संभावना उसमें भी दिखती है."
राहुल गांधी के बारे में रशीद किदवई कहते हैं, " राहुल गांधी को घोषित या अघोषित तरीक़े से अभी प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश नहीं किया गया है. इसके पीछे राहुल गांधी ख़ुद एक कारण हैं. उनके परिवार के तीन लोग प्रधानमंत्री रह चुके हैं. उनमें, ख़ुद प्रधानमंत्री बनने का लालच नहीं दिखता. उनके पास 'उम्र' भी अभी है."
रशीद आगे कहते हैं, "कांग्रेस के लिए राहुल गांधी की सोच ये है कि जब तक पार्टी ख़ुद के दम पर 'हाफ़ ऑफ़ हाफ़' सीटें नहीं जीत लेती, नेतृत्व का सवाल नहीं है. उतनी सीटें जीतने के बाद कांग्रेस की दावेदारी, गठबंधन के नेतृत्व की ख़ुद-ब-ख़ुद बन जाती है."
'हाफ़ ऑफ़ हाफ़' का मतलब ये कि सत्ता में आने के लिए बहुमत का आँकड़ा 272 का है, तो कांग्रेस जब तक 272 का आधा यानी 136 के आस-पास सीटें नहीं जीत लेती तब तक गठबंधन के नेतृत्व का दांव नहीं खेलेगी.
लेकिन रशीद साथ ही ये भी कहते हैं 2024 के लोकसभा चुनाव में अभी की हालत में कांग्रेस के 130 के आस-पास सीटें ले आए, ये थोड़ा मुश्किल ज़रूर लगता है. इस वजह से ममता बनर्जी हो या शरद पवार कांग्रेस को लेकर वो एक तरह से आश्वस्त हैं कि नेतृत्व की बात पर विपक्ष की एकजुटता में दिक़्क़त नहीं होगी.
इस लिहाज से देखें तो विपक्षी एकजुटता में जलिटताओं के साथ साथ संभावनाएँ भी हैं.
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