वैक्सीन मैत्री के तहत 6.6 करोड़ वैक्सीन विदेश भेजी गईं, इतने में हो जाता दिल्ली-मुंबई के वयस्कों का टीकाकरण
भारत में तेजी से कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं, केंद्र सरकार वैक्सीन की जरूरत को पूरा नहीं कर पा रही है। ऐसे में सरकार द्वारा चलाई गई वैक्सीन मैत्री योजना सवालों के घेरे में आ गई है।
नई दिल्ली, 9 मई। भारत में तेजी से कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं, केंद्र सरकार वैक्सीन की जरूरत को पूरा नहीं कर पा रही है। ऐसे में सरकार द्वारा चलाई गई वैक्सीन मैत्री योजना सवालों के घेरे में आ गई है। मोदी सरकार ने अन्य देशों में अपना डंका बजवाने के लिए वैक्सीन मैत्री कार्यक्रम के तहत 93 देशों को वैक्सीन की 6.6 करोड़ खुराक भेजीं, जिनमें से ज्यादातर वैक्सीन कोविशील्ड थी। अगर सरकार इन वैक्सीन को विदेश नहीं भेजती तो पिछले हफ्ते हुए टीकाकरण की दर से देश में लगभग 30 और दिनों तक टीकाकरण किया जा सकता था। साफ-साफ कहें तो वैक्सीन की इतनी मात्रा से दिल्ली और मुंबई के वयस्कों का टीकाकरण किया जा सकता था।

हालांकि जैसे ही भारत में कोरोना के मामले फिर से बढ़ने शुरू हुए इस मैत्री योजना को प्रभावी रूप से मार्च के अंत में निलंबित कर दिया गया। वहीं एक आकलन इस मैत्री कार्यक्रम के तहत 60% वैक्सीन उन देशों में वैक्सीन भेजी गयी, जहां कोरोना वायरस की स्थिति भारत से कम खतरनाक थी। सरकार ने अपने इस कदम से विदेशों में खूब वाहवाही बटोरी, लेकिन अब जब कोरोना के मामले इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं तब सरकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि उसने वैक्सीन को विदेश भेजने में इतनी जल्दी क्यों दिखाई।
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केंद्र सरकार ने 1 मई से 18-45 साल के लोगों को वैक्सीन देने का ऐलान तो कर दिया लेकिन स्थिति ये हैं कि राज्यों को वैक्सीन की सप्लाई नहीं हो रही है, जिससे सरकार की कथनी और करनी में फर्क नजर आता है। जब वैक्सीन है ही नहीं तो फिर 18 से 45 साल के लोगों को वैक्सीन लगाने का ऐलान क्यों किया गया। स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि, 'सरकार को वैक्सीन विदेश भेजने में इतनी जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए थी, हमें पहले अपने लोगों के लिए स्टॉक सुरक्षित करना चाहिए था।'












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