PV Narasimha Rao: प्रधानमंत्री रहते कोर्ट में पेश होने वाले इकलौते राजनेता, योगदान के साथ विवादों की भी यादें
PV Narasimha Rao देश के ऐसे प्रधानमंत्री रहे हैं, जिनकी राजनीतिक यात्रा बेहद दिलचस्प रही है। 28 जून 1921 को ब्रिटिश भारतीय आंध्र प्रदेश के करीमनगर में इनका जन्म हुआ। दक्षिण भारतीय बैकग्राउंड वाले राजनेता नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे।
इनके कार्यकाल का एक दिलचस्प किस्सा है, जब राव को बतौर प्रधानमंत्री अदालत में पेश होना पड़ा। दरअसल, ये मामला उनकी ही सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव से जुड़ा है। राव आजाद भारत के सात दशकों से अधिक लंबे इतिहास में इकलौते ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जो पद पर बने रहने के बावजूद अदालतों में पेश होते थे।

सियासी घटनाक्रमों पर नजर रखने वाली रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब 30 साल पहले 1993 में जब उनकी सरकार के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव आया तो वोटिंग से पहले सांसदों को घूस देने के आरोप लगे। आरोप लगा कि राव ने एकीकृत बिहार की पार्टी- झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के सांसदों को घूस देकर समर्थन हासिल किया और अपनी सरकार बचाई।
हालांकि ये भी बेहद दिलचस्प है कि भले ही प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को अदालत के चक्कर काटने पड़े, लेकिन कानून की नजरों में उन्हें बेगुनाह पाया गया और कोर्ट ने राव को बाइज्जत बरी कर दिया। राव के जन्मदिन के मौके पर पाकिस्तान से जुड़ा एक किस्सा भी स्मरणीय है।
दरअसल, भारत और पाकिस्तान के बीच तकरार का एक अहम मुद्दा कश्मीर है। आज से 32 साल पहले की राजनीति में भारत के सामने पाकिस्तान और अमेरिका की दोहरी चुनौती थी और देश की बागडोर पीवी नरसिम्हा राव संभाल रहे थे। किस्सा ऐसा है कि पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को सबक सिखाने के लिए राव ने चाय ठंडी छोड़ कर अपना विरोध प्रकट किया।
सियासी पंडितों का मानना है कि माहिर राजनेता राव की विदेश नीति इतनी प्रभावी थी कि उनके कार्यकाल में कश्मीर और उग्रवाद प्रभावित पंजाब में भी शांति बहाली करने में उल्लेखनीय कामयाबी मिली। राजनीतिक इतिहास और मई, 1990 की मीडिया रिपोर्ट्स में पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो से जुड़े चाय वाले वाकये का जिक्र मिलता है।
दरअसल, इस्लामाबाद से कुछ दूरी पर एक जनसभा के दौरान बेनजीर ने कश्मीर का जिक्र किया। इसके बाद उन्होंने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के मुजफ्फराबाद में तत्कालीन गवर्नर जगमोहन पर कटाक्ष किया। 1990 के दशक में हिंसा प्रभावित और संवेदनशील कश्मीर में बेनजीर के बयान आपत्तिजनक थे।
उन्होंने राज्यपाल की हत्या यहां तक की टुकड़े-टुकड़े करने जैसे बयान से माहौल में आग लगाने का भरसक प्रयास किया। 1988 से 1990 तक बेनजीर के कार्यकाल में कश्मीर मुद्दे का बहुत जिक्र हुआ। भले ही 1990 के चुनाव में बेनजीर को हार का मुंह देखना पड़ा, लेकिन उन्होंने कश्मीर की वादियों में ऐसा जहर बोया जो लंबे समय तक भारत को टीस देता रहा।
आंध्र प्रदेश में राव के शुरुआती दिन
- संगीत, सिनेमा और थिएटर पसंद करते थे राव।
- अलग-अलग भाषाएं सीखने का शौक रखने वाले पीवी नरसिम्हा राव तेलुगु और हिंदी में कविताएं भी लिखते थे।
- करीब 20 साल तक (1957-77 तक) आंध्र प्रदेश विधान सभा के सदस्य रहे।
- 1962-64 तक कानून एवं सूचना मंत्री रहे।
- 1964-67 तक स्वास्थ्य और चिकित्सा मंत्रालय।
- 1967 और 1968-71 के दौरान शिक्षा मंत्री।
- 1971-73 के दौरान आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
तत्कालीन रिपोर्ट्स के अनुसार अलग-अलग देशों में पाकिस्तान से दूत भेजे जा रहे थे, जिससे कश्मीर के खिलाफ और पाकिस्तान के समर्थन में माहौल बनाया जा सके। इस नाजुक मौके पर भारत की कमान संभाल रहे पीवी नरसिम्हा राव ने पड़ोसी मुल्क को सख्त संदेश दिया। राव के कार्यकाल में पाकिस्तान की सीमा से सटे सूबे- पंजाब में अलगाववाद पर भी नकेल कसी गई।
राजीव गांधी की नृशंस हत्या के बाद प्रधानमंत्री बने राव के सिर पर कांटों भरा ताज था, लेकिन उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया। 6 साल सत्ता में रहे राव को अल्पमत की लेकिन इतिहास में सबसे प्रभावी में एक सरकार चलाने का श्रेय दिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी कुशल लीडरशिप में आर्थिक सुधार, उदारीकरण जैसे फैसलों के अलावा परमाणु कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाने का काम हुआ।
कश्मीर मुद्दा राव के कार्यकाल का एक ऐसा हिस्सा रहा है जहां उन्हें मशक्कत को करनी पड़ी, लेकिन देश की संसद के अलावा अंतरराष्ट्रीय मंचों से भी पाक को सख्त संदेश भेजा गया। संसद में 'जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग' वाला बहुचर्चित प्रस्ताव पारित हुआ तो 1994 में UN के मंच पर भी खास टीम की मदद से पाकिस्तान को करारा जवाब दिया।
बाद में प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ मनमोहन सिंह के अलावा सलमान खुर्शीद, हामिद अंसारी और फारुख अब्दुल्ला जैसे कद्दावर नेताओं की टीम के साथ राव ने जिस कुशलता से जर्मनी और ईरान और बाद में चीन जैसे देशों के संपर्क साध कर पाकिस्तान के नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया।
राव के प्रयासों का नतीजा रहा कि संयुक्त राष्ट्र में मार्च, 1994 में हुई वोटिंग में पाकिस्तान का प्रस्ताव रद्द हो गया। बाद में कश्मीर के हालात बेहतर होने पर 1996 में कश्मीर में चुनाव कराए जा सके। अब अंत में चाय वाला किस्सा। कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर ने जैसा बर्ताव किया इसे राव भुला नहीं सके।
कश्मीर मुद्दे पर UN तक मुंह की खा चुकीं बेनजीर सीधा प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं। उन्होंने 1996 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का सहारा लेकर राव के साथ बैठक की अपील की। नाटक ऐसा रचा गया कि इसे राजनीतिक पहल न समझा जाए।
राष्ट्रीय राजनीति में राव का पदार्पण
- पहली बार 1977 में छठी लोक सभा में चुने गए।
- 11वीं लोकसभा तक संसद में रहे।
- 1977-84 तक लोक सभा सांसद रहे।
- दिसंबर, 1984 में आठवीं लोक सभा में महाराष्ट्र की रामटेक सीट से चुनाव जीतकर सांसद बने।
- 14 जनवरी 1980 से 18 जुलाई 1984 तक विदेश मंत्री रहे
- 19 जुलाई, 1984 से 31 दिसंबर, 1984 तक गृह मंत्री
- 31 दिसंबर, 1984 से 25 सितंबर, 1985 तक रक्षा मंत्री रहे।
- उन्होंने 25 सितंबर, 1985 को मानव संसाधन विकास मंत्री (HRD अब शिक्षा मंत्रालय) का कार्यभार भी संभाला।
हालांकि, राव सियासी चौसर के माहिर खिलाड़ी थे। उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री के पत्र पर कहा, बेनजीर को चाय का ख्याल दिमाग से निकाल देना चाहिए। राव ने कहा, भारत में चुनाव होने वाले हैं। सलाह कारगर हो सकती है, लेकिन छुपकर चाय पीना काफी मुश्किल है।
खास बात ये कि उसी साल के चुनाव में भारत और पाकिस्तान दोनों जगहों की सरकारें बदल गईं। भारत में राव चुनाव नहीं जीत सके, जबकि पाकिस्तान में भी बेनजीर की सरकार बर्खास्त हो गई। बैठक की हसरत और चाय दोनों अधूरी रह गईं।
अयोध्या, बाबरी मस्जिद और नरसिम्हा राव
प्रधानमंत्री राव के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश का अयोध्या ब्लैक स्पॉट माना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद उनके कार्यकाल में अयोध्या की बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया गया। राव पर जानबूझकर अनदेखी के आरोप लगे।
रिपोर्ट्स के अनुसार राव 6 दिसंबर के दिन राव तब तक पूजा करते रहे, जब तक आक्रामक कारसेवकों ने बाबरी का विवादित ढांचा गिरा नहीं दिया। तीन दशक से अधिक वक्त गुजरने के बावजूद इस मुद्दे पर आज भी राजनीतिक बयानबाजी होती है।
राव और बेनजीर संभवत: फिर कभी नहीं मिले। दिसंबर, 2004 में राव का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। तीन साल बाद दिसंबर, 2007 में रावलपिंडी में 54 साल की बेनजीर की आत्मघाती बम धमाके में हत्या कर दी गई।
कंप्यूटर और संगीत का दिलचस्प किस्सा
60 से अधिक उम्र को सीनियर सिटीजन यानी रिटायरमेंट की मानकर बैठने वाले लोग राव से प्रेरणा ले सकते हैं।राव नई चीजों को सीखने से कभी पीछे नहीं हटे। 65 साल की आयु में कंप्यूटर सीखा। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, मौत से 6 महीने पहले उन्होंने म्यूजिक की-बोर्ड पर महारत हासिल हुई।
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