चुनाव हारकर भी शपथ लेने वाले पुष्कर सिंह धामी अकेले नहीं हैं ? इन सबको भी जानिए
नई दिल्ली, 21 मार्च: उत्तराखंड में बीजेपी ने मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को ही दोबारा सीएम बनाए जाने की घोषणा की है। वह बुधवार यानि 23 मार्च को राज्य के 11वें सीएम के तौर पर शपथ लेंगे। वे इसी महीने संपन्न हुए उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में प्रदेश की खटीमा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के मुकाबले 6,579 वोटों से चुनाव हार गए थे। लेकिन, जिस तरह से लगभग सात महीनों के कार्यकाल में उन्होंने पार्टी की सत्ता में वापसी कराई है, इसलिए पार्टी ने उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाए रखने का फैसला किया है। उनसे पहले सिर्फ चार महीनों में भारतीय जनता पार्टी को देवभूमि में दो-दो मुख्यमंत्री बदलने पड़ गए थे। लेकिन, चुनाव हारकर भी कुर्सी प्राप्त करने वाले बाजीगरों में धामी अकेले नहीं हैं।

चुनाव हारकर भी बीजेपी के बाजीगर बने सीएम धामी
उत्तराखंड में बीजेपी ने जिस तरह से इस बार भारी बहुमत से सत्ता में दोबारा वापसी की है, उसमें बेशक मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की बहुत बड़ी भूमिका मानी जा सकती है। जिस दल की सरकार को कुछ महीनों में दो-दो बार सीएम बदलना पड़ा हो, उसे एक ऐसा नेतृत्व मिला, जो तमाम चुनावी पंडितों के गुणा गणित को गलत साबित करके पार्टी की जीत सुनिश्चित करने में बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन, धामी खुद ही चुनाव हार जाएंगे, इसकी उम्मीद शायद पार्टी में किसी ने नहीं की थी। धामी के प्रति पार्टी में एक आम सहानुभूति तो दिख रही थी, लेकिन पार्टी उनके नाम पर फिर से मुहर लगाएगी, इसकी संभावना कम नजर आ रही थी। लेकिन, शायद पार्टी को मुश्किल चुनाव में जीत दिलाने की वजह से नेतृत्व ने उनमें ही भरोसा जताने का फैसला किया है।

ममता बनर्जी भी चुनाव हारकर बन चुकी हैं मुख्यमंत्री
पिछले साल की ही बात है पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने तो शानदार जीत दर्ज की थी, लेकिन पार्टी सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नंदीग्राम सीट से भाजपा के सुवेंदू अधिकारी से खुद चुनाव हार गई थीं। लेकिन, इस हार के बावजूद ममता शपथ लेकर सीएम की कुर्सी पर बैठीं और 6 महीने के अंदर कोलकाता की भवानीपुर उपचुनाव में जीतकर विधानसभा में दाखिल हुईं। पुष्कर सिंह धामी के केस में भी उन्हें 6 महीने के अंदर उपचुनाव जीत कर विधासभा का सदस्य बनना आवश्यक होगा। वैसे चंपावत सीट से कैलाश गहतोड़ी और जागेश्वर सीट से मोहन सिंह उनके लिए पहले ही अपनी सीट छोड़ने की पेशकश कर चुके हैं।

मोरारजी देसाई और धामी की स्थिति में क्या अंतर है ?
वैसे देश के पहले आम चुनाव का भी एक वाक्या बड़ा ही दिलचस्प है। 1952 में बंबई प्रांत (बाद में इसी से महाराष्ट्र और गुजरात बना) के लिए पहला विधानसभा चुनाव हुआ था। इस चुनाव में बंबई प्रांत में ऐसी 47 विधानसभा सीटें थीं, जिसपर दो-दो एमएलए चुने गए थे। ऐसी ही एक सीट थी बुल्सर चिखली, जिसपर ज्यादा वोट लाकर पहले नंबर पर अमूल मंगललाल देसाई विजेता बने और दूसरे नंबर के विजेता बने पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी रणछोड़जी देसाई। इन्हें पहले नंबर के विजेता से 19 वोट कम मिले थे। इस तरह से एक ही विधानसभा क्षेत्र में तकनीकी तौर पर कम वोट लाने के बावजूद मोरारजी देसाई को बंबई का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला था। लेकिन, धामी और ममता की संवैधानिक स्थिति बिल्कुल अलग है।

बीजेपी में 2014 से दिख रहा है यह ट्रेंड
वैसे बीजेपी हारे हुए प्रमुख नेताओं को मंत्री बनाने का ट्रेंड एक तरह से 2014 के लोकसभा चुनावों से ही सेट कर चुकी है। दिवंगत नेता अरुण जेटली पंजाब की अमृतसर सीट से कैप्टन अमरिंदर सिंह से चुनाव हार गए थे और स्मृति ईरानी अपने पहले लोकसभा चुनाव में यूपी की अमेठी सीट पर राहुल गांधी से पिछड़ गई थीं। लेकिन, इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों को कैबिनेट मंत्री बनाया और ये दोनों नेता राज्यसभा के जरिए संसद के सदस्य बने, जो कि संवैधानिक तौर पर 6 महीने के अंदर बनना जरूरी है। 70 सीटों वाली उत्तराखंड विधानसभा में बीजेपी को 46 सीटें मिली हैं। लेकिन, प्रदेश में पार्टी की अगुवाई करने वाले धामी खुद ही अपनी सीट नहीं बचा सके।












Click it and Unblock the Notifications