'लाशों के उस ढेर में ही कहीं मेरे दोस्त का शव भी पड़ा था'... कहते-कहते रो पड़े जसविंदर सिंह

'वो हमला इतना भीषण था कि हमारे जवानों के शवों के अंग 500 से 600 मीटर दूर तक बिखर गए थे।'

नई दिल्ली। पुलवामा में बीती 14 फरवरी को हुए आतंकी हमले में देश के 40 बहादुर सीआरपीएफ जवानों की शहादत के 4 दिन बीत जाने के बाद भी आंखों से वो दर्दनाक मंजर नहीं हट रहा है। आतंकियों के इस बेहद कायराना हमले में किसी ने अपना बेटा खोया तो किसी ने अपना भाई... किसी की मांग का सिंदूर उजड़ गया तो किसी के सिर से हमेशा के लिए उसके पिता का साया हट गया। किसी मां का दिल अभी भी ये मानने को तैयार नहीं है कि उसका लाल अब कभी छुट्टी लेकर उससे मिलने नहीं आएगा। इस हमले में बचे जवान भी अभी तक उस भारी सदमे से नहीं उबरे हैं। एनडीटीवी की खबर के मुताबिक, सीआरपीएफ के काफिले में शामिल जसविंदर सिंह, जिन्होंने अपने हाथों से अपने साथियों के शवों को उठाया, आज भी उस खौफ के लम्हे को याद करते अपने आंसू नहीं रोक पाते हैं।

'500 से 600 मीटर दूर तक बिखरे थे शव'

'500 से 600 मीटर दूर तक बिखरे थे शव'

जसविंदर सिंह ने बताया, 'पुलवामा में हुए फिदायीन हमले के बाद काफिले में शामिल सीआरपीएफ जवानों ने अपने साथियों के शवों को तलाशना शुरू कर दिया। हमला इतना भीषण था कि हमारे जवानों के शवों के अंग 500 से 600 मीटर दूर तक बिखर गए थे। शवों के ढेर और गाड़ी के मलबे में कहीं मेरे दोस्त मनिंदर सिंह का शव भी पड़ा हुआ था।' कहते-कहते जसविंदर सिंह भावुक हो गए और बड़ी मुश्किल से अपने शब्द कह पाए। कांस्टेबल मनिंदर सिंह भी उसी बस में सवार थे, जिसे आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने फिदायीन हमले में बम के धमाके से उड़ा दिया।

'चारों तरफ था दहशत का मंजर'

'चारों तरफ था दहशत का मंजर'

जसविंदर सिंह ने उस मंजर को याद करते हुए बताया, 'जिस बस पर हमला हुआ, हम उससे महज दो वाहन पीछे थे। वो बहुत भीषण धमाका था। मैं उसे कभी नहीं भूल पाऊंगा।' हमले में सुरक्षित बचे दूसरे जवान दानिश चंद, जो बुलेटफ्रूफ गाड़ी में पीछे चल रहे थे, उन्होंने बताया, 'हमले के बाद काफी देर तक तो हमें मालूम ही नहीं हुआ कि हमला किस बस पर हुआ है। चारों तरफ दहशत फैली हुई थी। घरों से फोन आने लगे। परिजनों ने हमले के बारे में सुना तो वो परेशान हो गए। मेरा एक दूसरा भाई भी सीआरपीएफ में ही है। उसने किसी तरह मुझसे बात की और परिवार को फोन कर जानकारी दी कि मैं सुरक्षित हूं।' वायरलेस सेट पर तैनात असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर किशोरी लाल ने बताया कि घायल जवानों की चीख-पुकार उनके कानों में गूंज रही थी। हमले के बाद पूरा काफिला श्रीनगर पहुंचने के ऑर्डर मिलने तक करीब 3 घंटे तक वहीं रुका रहा।

श्रीनगर से महज 30 किलोमीटर पहले हुआ हमला

श्रीनगर से महज 30 किलोमीटर पहले हुआ हमला

आपको बता दें 2500 से ज्यादा सीआरपीएफ जवानों को लिए 78 गाड़ियों का यह काफिला जम्मू से बीते शुक्रवार को तड़के 3 बजे श्रीनगर जाने के लिए निकला और दोपहर तक दक्षिणी कश्मीर पहुंच चुका था। जवानों का काफिला श्रीनगर से महज 30 किलोमीटर ही दूर था, कि तभी फिदायीन आतंकी आदिल अहमद डार आरडीएक्स से भरी हुई गाड़ी हाईवे पर लेकर आया और जवानों की बस से गाड़ी को टकरा दिया। तेज धमाका हुआ और बस के परखच्चे उड़ गए। साथ चल रहे सीआरपीएफ के बाकी जवान कुछ समझ पाते, तब तक इस आतंकी हमले में उनके 40 साथी जवान शहीद हो चुके थे। धमाका इतना भीषण था कि बस के टुकड़ों के साथ सीआरपीएफ के शहीद जवानों के शव एक किलोमीटर के दायरे में बिखर गए।

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