पुलवामा हमला: कश्मीर घाटी में फिर लौट सकता है फिदायीन हमलों का दौर

नई दिल्ली। कश्मीर में आत्मघाती बम विस्फोट के विचार को राजनीतिक संघर्ष के साधन के रूप में कभी भी सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली है। शायद इसीलिए आज के आंतकवादी, जिनमें ज्यादातर स्वदेशी हैं, भी इससे दूर रहते हैं। यही कारण है कि घाटी में चल रहे संघर्ष के इतिहास में लेथपोरा हमला दूसरा आत्मघाती कार बम हमला है जो किसी कश्मीरी द्वारा किया गया है। कश्मीर में अधिकतर आईईडी धमाके हुए हैं, लेकिन कार बम धमाके नहीं किए गए। इससे पहले कश्मीर में जैश ए मोहम्मद द्वारा कराए गए सभी फिदायीन हमलों में हमलावर पाकिस्तानी थे। इससे एक बात तो साफ है कि कश्मीरी आतंकवादी इस तरह के हमलों से दूर रहते हैं।

 Pulwama attack: suicide bombings in Kashmir valley can return again

फर्स्टपोस्ट में छपी खबर में श्रीनगर के एक राजनीतिक विश्लेषक नूर मोहम्मद बाबा ने कहा कि, कश्मीर इस तरह की हिंसा को बरकरार नहीं रख सकता, जिसे हम अफगानिस्तान जैसी जगहों पर देखते हैं। उनका कहना है कि, हाल ही के दिनों में कश्मीर में हिंसा से जिस तरह से निपटा गया है। उससे यहां के हालात और अधिक खराब हो गए हैं। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में हुए सशस्त्र विद्रोह के बाद, कश्मीर आधारित उग्रवादियों की संख्या हजारों में होने के बावजूद भी शायद ही किसी आत्मघाती हमले को अंजाम दिया गया। जिसमें बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों और नागरिकों की जान गई हो।

जैश-ए-मोहम्मद का संस्थापक अजहर मसूद ने 1999 में भारत की जेल से रिहा होने के बाद घाटी में पहला बोर्न इम्प्रूव्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (VBIED)विस्फोट किया था। यह कश्मीर में पहला फिदायीन हमला था। श्रीनगर के निवासी आफाक शाह ने 2000 में बादामी बाग छावनी से आगे अपनी कार में विस्फोट करके कश्मीर में जैश-ए-मोहम्मद के आगमन का ऐलान किया था। फिर 2001 में, पिछली बार इस तरह ही कार बम विस्फोट हुआ था। एक जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी ने श्रीनगर विधानसभा के बाहर आत्मघाती बम हमला किया था। जिसमें 38 लोग मारे गए थे और 40 अन्य घायल हो गए थे। हमले की पाकिस्तान ने भी निंदा की थी। जो दिखाता है कि, कैसे जैश पाकिस्तान सेना की पकड़ से बाहर निकल गया। ऐसा ही एक और हमला हुआ था जिसमें ब्रिटिश मूल के एक मुस्लिम आतंकवादी ने सेना मुख्यालय को निशाना बनाते हुए कार बम धमाका किया था। हालांकि ये हमला फेल हो गया था।

गुरुवार को पुलवामा में हुए हमला कश्मीर के इतिहास में आतंकियों द्वारा किया गया सबसे बड़ा फिदायीन हमला है जिसमें 40 सीआरपीएफ जवान मारे गए। 22 साल के कश्मीरी आतंकवादी अब्दुल राशिद डार का परिवार हमले वाली जगह से 10 किमी दूर रहता है। वह इस त्रासदी को समझने में असमर्थ है। पुलवामा हमले के आतंकी अब्दुल डार के चाचा आदिल अहमद डार (जो कि चिकन बेचते हैं) ने कहा कि, अगर आप चाहते हैं कि, मैं समझाऊं कि उसने ऐसा क्यों किया, तो मेरे पास कोई जवाब नहीं है। आत्महत्या गैरइस्लामिक है। मैं यह समझने में असमर्थ हूं कि यह क्यों किया?

राशिद के बड़ा भाई मंज़ूर अहमद डार भी आंतकवादी था। वह 30 जून 2016 को सुरक्षा बलों हाथों मारा गया था। उसकी मौत के 51 दिन बाद कश्मीर में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान 2016 में आदिल को पैर में एक गोली लगी थी। राशिद के चाचा ने बताया कि, यदि आप मुझसे पूछते हैं कि क्या यह बदला था, तो मुझे ऐसा नहीं लगता। क्योंकि इस्लाम बदला लेने की अनुमति नहीं देता और हत्याएं अस्वीकार्य हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन किसे मारता है।

इस हमले के बाद सुरक्षा बलों को डर है कि लेथपोरा हमले की 'सफलता' जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती दस्ते की ओर युवाओं को आकर्षित कर सकती है। जो कश्मीर में सुरक्षाबलों के लिए बेहद ही खतरनाक साबित हो सकता है। सूत्रों के मुताबिक राशिद ने गुरुवार के हमले को अंजाम देने के लिए एक साल तक इंतजार किया था। पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि, पिछले साल 250 आतंकवादी मारे गए थे, लेकिन आतंकवादियों का एक भी समूह सुरक्षाबलों पर कोई बड़ा हमला अंजाम देने में कामयाब नहीं हुआ था। अब गुरुवार की बमबारी से हुई तबाही को देखते हुए, उग्रवादी उसी रास्ते का इस्तेमाल कर सकते हैं। वहीं कई कश्मीरी आश्चर्यचकित हैं कि क्या यह राजनीतिक आंदोलन को आगे बढ़ाने का सही तरीका था।

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