लोकसभा चुनाव 2019: काराकाट लोकसभा सीट के बारे में जानिए
नई दिल्ली: बिहार की काराकाट लोकसभा सीट से राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा सांसद है, जिन्होंने साल 2014 के चुनाव में इस सीट से राजद नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री कांति सिंह को हराया था। दरअसल नए परिसीमन ने बिक्रमगंज संसदीय क्षेत्र का नाम बदलकर काराकाट कर दिया गया, जिसके बाद इस क्षेत्र का भूगोल और सामाजिक समीकरण बदल गया लेकिन इस क्षेत्र का स्वभाव नहीं बदला। सियासी हस्तियों की दिलचस्पी ने जातीय चरित्र को आज भी कायम रखा है, फर्क सिर्फ इतना है कि पहले किसी और का वर्चस्व था और अब किसी और का है। 1952 में यह क्षेत्र शाहबाद उत्तर-पश्चिम कहलाता था, तब निर्दलीय कमल सिंह ने कांग्रेस की कलावती देवी को हराया था। ताजा परिसीमन के पहले इसका अधिकांश हिस्सा बिक्रमगंज के नाम से जाना जाता था, जहां से रामसुभग सिंह, शिवपूजन सिंह, राम अवधेश सिंह, तपेश्वर सिंह, रामप्रसाद सिंह, कांति सिंह, वशिष्ठ नारायण सिंह, अजित सिंह और मीना सिंह जीतते रहे हैं।

काराकाट लोकसभी सीट में विधानसभा क्षेत्र
काराकाट लोकसभा सीट में 6 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। परिसीमन के बाद यहां साल 2009 में आम चुनाव हुए, जिसे जेडीयू के महाबलि सिंह ने जीता था लेकिन साल 2014 के चुनाव में यहां पर आरएलएसपी ने जीत दर्ज की और उपेंद्र कुशवाहा यहां से जीतकर लोकसभा पहुंचे। साल 2014 का चुनाव रालोसपा ने भाजपा के समर्थन से लड़ा था। साल 2014 के चुनाव में इस सीट पर नंबर 2 पर आरजेडी, नंबर 3 पर जेडीयू और नंबर 4 पर बसपा थी।
काराकाट लोकसभा सीट, परिचय- प्रमुख बातें-
2014 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या 15 लाख 69 हजार 989 थी।
7 लाख 89 हजार 927 लोगों ने अपने मतों का प्रयोग किया।
इसमें पुरुषों की संख्या 4,53,576 और महिलाओं की संख्या 3,36,351 थी।
साल 2011 की मतगणना के अनुसार काराकाट की आबादी 24 लाख 89 हजार 118 है।
86 प्रतिशत आबादी गावों में और 13 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करती है।
यहां राजपूतों और भूमिहार की भरमार है, अब तक हुए चुनावों में ये देखा गया है कि राजपूत जाति के लोग भूमिहार के खिलाफ मतदान करते हैं, यहां अकेले ढ़ाई लाख से अधिक राजपूत वोट हैं, सवर्ण मतदाताओं की संख्या साढ़े चार लाख से अधिक है, जिसका फायदा उठाने के लिए पिछले चुनाव में राजद ने यहां कांति सिंह को खड़ा किया था, हालांकि उसकी गणित उस बार यहां फेल हो गई क्योंकि राजपूत वोटों पर भूमिहार वोट भारी पड़े और कुशवाहा यहां जीत गए थे लेकिन इस बार भी ऐसा होगा ऐसा कह पाना बहुत मुश्किल है।
पिछले चुनाव में कुशवाहा की जीत में मोदी लहर का भी हाथ था लेकिन इस बार के चुनाव में वो भाजपा के साथ नहीं बल्कि विरोधीदलों के साथ खड़े हैं। ऐसे में यहां की जनता राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को दोबारा मौका देगी ये कह पाना अभी मुश्किल है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा की भी पूरी कोशिश इस सीट को जीतने की होगी,वो इसे भी किसी भी सूरत में गंवाना नहीं चाहेगी तो वहीं कुशवाहा और भाजपा की लड़ाई का फायदा राजद हर हालत में उठाना चाहेगी। कुशवाहा के पिछले पांच सालों के दौरान यहां किए गए विकास कार्य भी उनकी हार-जीत में मुहत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, ऐसे हालात में यहां की जनता का रोल बेहद अहम है, अब वो किसे चुनती है इसका उत्तर तो हमें चुनावी नतीजे ही देंगे।












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