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लोकसभा चुनाव 2019: दुर्ग लोकसभा सीट के बारे में जानिए

नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ की दुर्ग लोकसभा सीट से 2014 में कांग्रेस के ताम्रध्वज साहू ने जीत हासिल की थी। दिसंबर 2018 में ताम्रध्वज साहू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद ये सीट रिक्त हो गई है। पार्टी के निर्देश पर उन्होंने पिछले साल दुर्ग ग्रामीण की विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत के बाद मुख्यमंत्री के दावेदारों में उनकी गिनती हुई, मगर दुर्ग लोकसभा सीट के अंतर्गत पाटन से विधायक और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल को आखिरकार सीएम की कुर्सी मिली। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर 68 फीसदी मतदाताओं ने मतदान किया था। यहां कुल 18 लाख 55 हज़ार से कुछ ज्यादा मतदाता हैं। इनमें से 12 लाख 58 हजार से ज्यादा मतदाताओं ने वोट डाले थे। विजेता उम्मीदवार ताम्रध्वज साहू को 5 लाख 70 हज़ार से ज्यादा वोट मिले थे। वे मात्र 16 हज़ार 848 वोटों से ही जीत दर्ज कर सके थे।

profile of Durg lok sabha constituency

दुर्ग लोकसभा क्षेत्र की आबादी 25 लाख से ज्यादा हैं। दुर्ग में आदिवासियों की आबादी 55 फीसदी से ज्यादा है। यहां अनुसूचित जाति के मतदाता भी 15 फीसदी से अधिक हैं। दुर्ग लोकसभा सीट पर 1996 के बाद से ही बीजेपी कब्जा रहा था। इस सीट पर कांग्रेस कुल मिलाकर 10 बार लोकसभा सीट जीतने में कामयाब रही है। 90 के दशक में यह सीट कांग्रेस से दूर जरूर रही, मगर अब यह कांग्रेस का मजबूत दुर्ग बन चुकी है। दुर्ग से ताम्रध्वज साहू ने 2014 में जीत हासिल की थी, मगर यहीं से भूपेश बघेल 2004 में बीजेपी के हाथों चुनाव हार चुके हैं। मगर, अब दुर्ग कांग्रेस का वास्तव में दुर्ग बन चुकी है। यहां की 8 विधासभा सीटों में से 7 कांग्रेस ने जीत ली है। एक मात्र सीट वैशाली नगर पर बीजेपी जीत दर्ज कर पायी। कांग्रेस के पास पाटन, दुर्ग ग्रामीण, भिलाई नगर, अहिवारा, साजा, बेमेतारा और नवागढ़ की सीटें हैं।

ताम्रध्वज साहू का लोकसभा में प्रदर्शन

ताम्रध्वज साहू सांसद के तौर पर संसद में भी सक्रिय रहे हैं। उन्होंने 32 बार लोकसभा में बहस में हिस्सा लिया। दिसंबर 2018 तक उन्होंने एक प्राइवेट बिल भी संसद में पेश किया। उन्होंने 169 सवाल सदन में रखे। हालांकि यह स्टेट एवरेज या नेशनल एवरेज से कम है। वहीं ताम्रध्वज साहू की सदन में 81 फीसदी उपस्थिति रही है।

विधानसभा चुनाव के बाद की परिस्थिति में दुर्ग लोकसभा सीट से ताम्रध्वज साहू सम्भवत: चुनाव लड़ना नहीं चाहें क्योंकि अब वे छत्तीसगढ़ में मंत्री हैं। ऐसी स्थिति में पार्टी को वैकल्पिक उम्मीदवार की तलाश रहेगी। ऐसे में अगर कांग्रेस आदिवासी उम्मीदवार को आगे करे, तो फायदा हो सकता है। कांग्रेस के लिये राहें इसलिये भी आसान हो सकती हैं, क्‍योंकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने से पार्टी का मनोबल बढ़ा है। साथ ही पिछले चुनाव में मात्र 16,848 वोटों का अंतर था, जो कि बहुत ही कम है। जाहिर है छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में जीत के चलते कुछ हद तक वोट शिफ्ट भी हुआ है। लेकिन फिर भी भाजपा यहां हार नहीं मानने वाली। बीजेपी भी अपनी अगली रणनीति पर चलेगी। विगत चुनाव में महज 16 हजार के फासले को पाटने के लिए पार्टी कोई बड़ा दाव चल सकती है। बीजेपी का इलाके में मजबूत संगठन है और उसमें वापसी करने की पूरी क्षमता है। खासकर आदिवासियों के बीच बीजेपी की अच्छी पैठ है। इसलिए इस बात के पूरे आसार हैं कि आने वाले चुनाव में दोनों पार्टियां आदिवासी कार्ड चलने की कोशिश करेगी।

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