“पॉलिटिक्स वन डे क्रिकेट की तरह, 5 दिन की नहीं 50 ओवर की सोचो”
नई दिल्ली, 14 सितंबर। क्या राजनीति, वनडे क्रिकेट की तरह है जिसमें किसी बल्लेबाज को पांच दिन की बजाय सिर्फ 50 ओवर के खेल पर ध्यान देना चाहिए ? उस बल्लेबाज को चाहे जितने ओवर खेलने को मिले, उसे उसका लुत्फ उठाना चाहिए । राजनीति की यह नयी व्याख्या पेश की है केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने। राजस्थान विधानसभा के एक सेमिनार में उन्होंने कहा, "राजनीति में कोई खुश नहीं है। वर्तमान में जीने वाला कभी दुखी नहीं होता। भविष्य में जीने वाली हमेशा दुखी रहता है।

विधायक इस लिए दुखी है कि वह मंत्री नहीं बन पाया। मंत्री इसलिए दुखी है कि वह मुख्यमंत्री नहीं पाया। और मुख्यमंत्री इस लिए दुखी है कि उसे न जाने उसे कब जाना पड़ जाय।" मेरा मानना है कि आगे की मत सोचो। राजनीति को भी वन डे क्रिकेट की तरह खेलो। जितने ओवर मिले उतने में ही अपना हुनर दिखाओ। मैंने सुनील गास्कर और सचिन तेंदुलकर से पूछा था कि आप छक्के कैसे लगाते हैं ? तो उन्होंने कहा था, यह एक स्किल (कौशल) है। राजनीति भी एक स्किल है।

“वन डे क्रिकेट की तरह राजनीति करो”
नितिन गड़करी ने दरअसल ये बात राजस्थान के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर कटाक्ष के रूप में कही थी। अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए कांग्रेस में भयंकर गुटबाजी चल रही है। उन्होंने अशोक गहलोत पर ही निशाना साध कर कहा था कि मुख्यमंत्री इस लिए दुखी है कि न जाने उसे कब जाना पड़ जाय। नितिन गड़करी ने भले ये बात कांग्रेस के लिए कही लेकिन भाजपा की हालत उससे भी खराब है। ऐसे दुखी मुख्यमंत्रियों की संख्या भाजपा में ही अधिक है। पिछले छह महीने में भाजपा के चार मुख्यमंत्रियों को पद से हटा दिया गया। उत्तराखंड की जनता ने मार्च 2021 से जुलाई 2021 के बीच तीन मुख्यमंत्री देखे। अगर गड़करी की नयी राजनीतक व्याख्या सही है तो यही माना जाएगा कि भाजपा के बल्लेबाजों (मुख्यमंत्रियों) ने मिले मौके फायदा नहीं उठाया। वन डे क्रिकेट खेलना आसान नहीं है। कम गेंदों पर ज्यादा स्कोर बनाने के लिए विशेष दक्षता चाहिए। अगर टीम का कोई बल्लेबाज फेल होता है तो कप्तान और टीम प्रबंधन पर ही सवाल उठेगा। उसकी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठेगा।

कम गेंदों पर ज्यादा रन बनाना आसान नहीं
गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी को तब हटा दिया जब 15 महीने बाद राज्य में विधानसभा चुनाव होना है। इसके पहले भाजपा ने मार्च 2021 में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को सीएम पद से हटाया था। उनकी जगह तीरथ सिंह रावत को इस पद पर गया था। चार महीने बाद जुलाई 2021 में तीरथ सिंह रावत की भी छुट्टी कर दी गयी। पुष्कर सिंह धामी नये मुख्यमंत्री बने। इसके अलावा भाजपा ने कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा का पत्ता काट कर बीएस बोम्मबई को सत्ता की बागडोर सौंपी थी। कांग्रेस को नसीहत देने वाले नितिन गडकरी अपनी पार्टी के बैटिंग कॉलेप्स को शायद भूल गये थे। लेकिन गडकरी का यह कहना काबिलेगौर है कि चाहे जिस बल्लेबाज (मुख्यमंत्री) को जितने भी ओवर (महीने) बैटिंग (शासन) करने के लिए मिले ज्यादा से ज्यादा रन (विकास कार्य) बनाने चाहिए। भारत में कई ऐसे मुख्यमंत्री हुए हैं जिन्होंने कम समय के बावजूद शासन में अपनी गहरी छाप छोड़ी है। केदार पांडेय 1972 में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। करीब एक साल ही मुख्यमंत्री रहे। लेकिन उन्हें आज भी बिहार की शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए याद किया जाता है। बेहतर पढ़ाई और परीक्षा में कड़ाई, यह उनका सूत्र वाक्य था।

कांग्रेस में आलाकमान कल्चर
इंदिरा गांधी के जमाने में सत्ता का केन्द्रीकरण हो गया था। कांग्रेस शासित राज्यों के फैसले भी इंदिरा गांधी ही लेती थी। उसी समय कांग्रेस में आलाकमान कल्चर की नींव पड़ी थी। कांग्रेस के लीडर सीधे-सीधे अध्यक्ष (इंदिरा गांधी) का नाम नहीं लेते थे। वे कांग्रेस की इस सर्वोच्च शक्तिकेन्द्र (इंदिरा गांधी) के लिए आलाकमान शब्द का प्रयोग करने लगे। तब से कांग्रेस के सर्वोच्च नेता के लिए आलाकमान शब्द एक ट्रेड मार्क हो गया। इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री विधायक नहीं बल्कि वे खुद तय करती थीं। 1972 में बिहार विधानसभा के चुनाव के बाद केदार पांडेय मुख्यमंत्री बने थे। इसके बाद इंदिरा गांधी ने 1973 में केदार पांडेय को हटा कर अब्दुल गफूर को मुख्यमंत्री बना दिया था। एक साल बाद अब्दुल गफूर की कुर्सी भी खिसक गयी। तब इंदिरा गांधी ने जगन्नाथ मिश्र को सीएम पद की जिम्मेदारी सौंपी थी। यही कहानी उत्तर प्रदेश में भी दोहरायी गयी थी। उत्तर प्रदेश की 8वीं विधानसभा का कार्यकाल 1980 से 1985 तक था। इस दौरान कांग्रेस तीन मुख्यमंत्री (वीपी सिंह, श्रीपति मिश्र, नारायण दत्त तिवारी) गद्दी पर बैठे। इंदिरा गांधी कांग्रेस की सबसे लोकप्रिय नेता होने के साथ-साथ एक शक्तिशाली प्रधानमंत्री थीं। उनके फैसले को कोई चुनौती नहीं दे सकता था। वे अपनी मर्जी और जरूरतों के हिसाब से फैसला लेती थीं।
Recommended Video

भाजपा भी आलाकमान कल्चर कि शिकार
पिछले छह महीने के घटनाक्रम को देख कर यह कहा जा सकता है कि भाजपा भी कांग्रेस के आलाकमान कल्चर की शिकार हो गयी है। नरेन्द्र मोदी भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेता होने के साथ साथ एक शक्तिसाली प्रधानमंत्री भी हैं। उन्होंने अपने नेतृत्व में भाजपा को लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत दिलायी है। लेकिन जीत के सिलसिले को कायम रखना बेहद मुश्किल काम है। कभी लचर प्रदर्शन, तो कभी असंतोष के कारण मुख्यमंत्री बदले गये। गुजरात में एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर से बचने के लिए नये चेहरे भूपेन्द्र पटेल को कमान सौंपी गयी। गुजरात में भाजपा की जीत का अंतर लगातार घट रहा है। 2017 के चुनाव में भाजपा को 182 में से केवल 99 सीटें मिली थीं। वह मुश्किल से बहुमत का आंकड़ा पार कर पायी थी। नरेन्द्र मोदी अपने गृह प्रदेश में फिर ऐसी कमजोर स्थिति नहीं देखना चाहते हैं। इसलिए विजय रुपाणी का पत्ता साफ कर दिया गया। इंदिरा गांधी की तरह नरेन्द्र मोदी से भी कोई सवाल पूछने की जुर्रत नहीं कर सकता। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इंदिरा युग की तरह भारत में एक बार फिर सत्ता का केन्द्रीकरण हो गया है।












Click it and Unblock the Notifications