गरीबों के मसीहा लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक सफर
रांची। राष्ट्रीय जनता दल की लालटेन बुझने की कगार पर आ गई है, क्योंकि चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव समेत सभी 45 आरोपियों को दोषी करार दे दिया गया है। इनमें सात लोगों को सजा सुना दी गई, और तीन-तीन साल की सजा दी गईं। वहीं बाकियों की सजा पर कल कोर्ट में जिरह होगी। बताया जा रहा है कि लालू को पांच साल की सजा हो सकती है। इस मामले का फैसला 3 अक्टूबर को सुनाया जायेगा।
इस मामले की वजह से राजनीतिक हलचल मची हुई है। ऐसे में राजनीतिक विरोधी जहां खुश हैं, वहीं एक तबका ऐसा है, जो इस खबर से दु:खी है। वो है बिहार के गीरब। जी हां अगर लालू के राजनीतिक सफर पर नजर डालें तो सबसे अहम बात यह निकल कर आती है कि लालू हमेशा से गरीबों के मसीहा रहे हैं।
लालू यादव का राजनीतिक 1970 में छात्र राजनीति से शुरू हुआ, जब वो पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव के रूप में पहला चुनाव जीता। जयप्रकाश नारायण, राज नारायण करपूरी ठाकुर और सत्येंद्र नारायण सिन्हा से प्रेरित होकर लालू ने छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं जनता पार्टी के अध्यक्ष सत्येंद्र नारायण ने लालू को लोकसभा चुनाव लड़ने की सलाह दी और फुल सपोर्ट किया। उनके लिये प्रचार भी किया। छठी लोकसभा में जनता पार्टी के टिकट से लालू यादव मात्र 29 वर्ष की आयु में लोकसभा चुनाव जीत कर संसद पहुंचे। उस समय लालू सबसे युवा सांसदों में से एक थे।
10 साल के भीतर लालू ने बिहार में अपना सिक्का जमा लिया। मुसलमानों और यादवों के बीच लालू प्रख्यात नेता के रूप में उभरे। उस दौरान ज्यादातर मुसलमान कांग्रेस के समर्थक हुआ करते थे, लेकिन लालू ने वह वोटबैंक तोड़ दिया। दूसरा फैक्टर जिसने लालू के पक्ष में काम किया 1989 में भागलपुर हिंसा थी। अधिकांश मुसलमान यादवों के पक्ष में हो गये और यादव मायने लालू।
1989 में आम चुनावों और राज्य विधानसभा चुनावों में नेशनल फ्रंट का नेतृत्व लालू ने किया। 1990 में लालू को बिहार का मुख्यमंत्री चुना गया। 1990 के दशक में लालू ने बिहार को आर्थिक रूप से मजबूत किया, जिसकी तारी। विश्व बैंक तक ने की।
1996 में निकला चारा घोटाला
1996 में सबसे पहले बीबीसी ने खबर ब्रेक की, जिसमें 950 करोड़ के चारा घोटाले की बात उभरकर जनता के सामने आयी। पुलिस ने तफतीश शुरू की तो इस घोटाले में लालू प्रसाद यादव भी लिप्त पाये गये। पूरे देश में लालू की थू-थू मची। सभी विपक्षी दलों ने लालू पर हर तरफ से वार किये। सच पूछिए तो यहीं से लालू का राजनीतिक विकास रुक गया। इसी की वजह से लालू को पद से इस्तीफा देना पड़ा और उनकी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री चुना गया। कुछ महत्वपूर्ण बातें स्लाइडर में।

शरद यादव को किया चित
14वीं लोकसभा में लालू छपरा और मधेपुरा से जीतकर संसद पहुंचे। उन्होंने भाजपा के राजीव प्रताप रूडी को छपरा में और जदयू के शरद यादव को मधेपुरा में हराया। बाद में उन्होंने मधेपुरा सीट छोड़ दी। आगे चलकर लालू केंद्रीय रेल मंत्री बने।

कुल्हड़ को तरजीह दी
लालू ने बतौर रेल मंत्री सबसे पहले रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों पर कुल्हड़ों में चाय बेचने की प्रथा को बढ़ावा दिया। उन्होंने प्लास्टिक कप बैन कर दिये। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में भारी मात्रा में रोजगार जुटाया। उन्होंने बटर मिल्क और खादी को भी बढ़ावा दिया। इस दौरान लालू अकसर अचानक रेलवे स्टेशन पहुंच जाते थे।

रेलवे को दिया प्रॉफिट
लालू ने जिस समय रेल मंत्रालय संभाला था, तब रेलवे घाटे में चल रहा था, जबकि कार्यकाल पूरा करते-करते लालू ने रेलवे को 2.50 बिलियन रुपए का जबर्दस्त लाभ दिया। इतना प्रॉफिट रेलवे को आज तक किसी भी रेलमंत्री ने नहीं दिया है।

गरीबों के मसीहा
लालू ने यात्रियों का हमेशा खयाल रखा। लालू के कार्यकाल में ही सबसे पहले गरीब रथ चलायी और उन्हीं ने ही गरीबों के लिये बनाये जाने वाले अनारक्षित डिब्बे में कुशन सीटें लगाने के आदेश दिये। यानी आप कह सकते हैं कि लालू हमेशा से ही गरीबों के महीहा रहे।

हारवर्ड विश्वविद्यालय भी लालू से प्रभावित
लालू के मैनेजमेंट स्किल इतने ज्यादा प्रभावी थे कि हारवर्ड विश्वविद्यालय की एक टीम भी भारत आयी और उसने लालू के मैनेजमेंट स्किल्स का अध्ययन किया। लालू ने एक बार हारवर्ड और वार्टन के छात्रों को संबोधित भी किया। वो भी हिन्दी में।












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