नज़रिया: तेजस्वी के लिए बीजेपी बड़ी चुनौती या तेज़ प्रताप?
किसी बहुचर्चित सियासी परिवार में अगर अंतर्कलह की चिंगारी दिख जाए तो विरोधी पक्ष वाले उसे और सुलगाने या भड़काने की कोशिश करेंगे ही.
बिहार में लालू-राबड़ी परिवार के साथ इन दिनों यही हो रहा है. इस परिवार के बड़े बेटे तेज़ प्रताप यादव ने ही विरोधियों को ऐसा मौक़ा दिया है.
उनके कई हालिया बयान या ट्वीट्स मीडिया की सुर्ख़ियाँ बने, क्योंकि उनमें परिवार और पार्टी (राष्ट्रीय जनता दल-आरजेडी) के अंदरूनी कलह की झलक बिलकुल साफ़ दिख रही थी.
तेज़ प्रताप का नाम ले-ले कर अपने कुछ दलीय नेताओं पर आक्षेप करना और पार्टी में अपनी उपेक्षा के कारण राजनीति छोड़ देने जैसी इच्छा ज़ाहिर करना, ये ख़ास विवादित बयान हैं.
बाद में कुछ विरोधाभासी या अटपटे-से तर्क जुटा कर 'डैमेज कंट्रोल' की कोशिशें ज़रूर हुईं, लेकिन नुक़सान के कुछ निशान तो पड़ ही गए. 'फ़ेसबुक या ट्विटर अकाउंट' हैक हो जाने वाली उनकी सफ़ाई भी हवाई साबित हुई.
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मौक़ा देख लालू विरोधियों ने कहना शुरू कर दिया कि तेजस्वी से जब अपना ही भाई नहीं संभल रहा तो वह पार्टी और राज्य को क्या संभालेंगे!
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के प्रवक्ताओं ने इस प्रकरण में तेज़ प्रताप से सहानुभूति दिखा कर तेजस्वी को घेरने और चुटकी लेने का कोई अवसर नहीं छोड़ा.
ज़ाहिर है कि लालू परिवार में विवाद बढ़ने का इन्हें राजनीतिक लाभ मिलता हुआ दिखता है.
दरअसल, मुश्किल यह है कि मनमौजी फ़ितरत वाले तेज़ प्रताप से ना तो उनके परिजन, और ना ही पार्टी के लोग उलझना पसंद करते हैं. वह कब किसे क्या बोल देंगे या क्या कर बैठेंगे, इसका अंदाज़ा लगाना कठिन होता है.
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हाल ही में देखने को मिला, आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे समेत लालू-परिवार के कई अन्य क़रीबी नेता-कार्यकर्ता तेज़ प्रताप के निशाने पर आ गए.
उन्होंने मीडिया के सामने कह दिया कि दल के ही कुछ लोग परिवार और पार्टी में आपसी फूट पैदा करने की साजिश रच रहे हैं.
आरजेडी में तेज़ प्रताप की नाराज़गी झेल रहे कई नेता ऐसे आरोपों से आहत होकर भी मौन रह जाते हैं जबकि कुछ ऐसे भी हैं, जो उन्हें 'सनकी' मान कर उनकी उतनी परवाह नहीं करते, जितनी परिवार के अन्य सदस्यों की करते हैं.
ख़ुद तेज प्रताप ने भी स्वीकारा है कि उन्हें लोग 'सनकी' या मनमतंग समझते हैं.
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कभी कृष्ण के वेश में मुरली बजाते हुए, तो कभी भगवान शिव का रूप धारण कर डमरू बजाते या शंख फूँकते हुए इस लालू पुत्र की लीला लोग देखते रहे हैं.
किसी समय वह बेहद शालीन और धार्मिक भाव से ओतप्रोत एवं अनुशासित दिखते हैं, तो कभी झोंक में बेतुकी बातें और ऊटपटाँग हरकतें कर के सब को दुखी कर देने वाला बिगड़ैल बेटा नज़र आने लगते हैं.
इसी परस्पर विरोधी स्वभाव के कारण तेज़ प्रताप को ना तो परिवार या पार्टी में, ना ही परिवार से बाहर कोई गंभीरता से ले पाता है.
यही वजह है कि सोच-समझ के मामले में इनके छोटे भाई तेजस्वी को बेहतर मान कर उन्हें लालू यादव की राजनीतिक विरासत सौंप दी गई.
हालाँकि तेज़ प्रताप को भी उनके विद्रोही तेवर के मद्देनज़र पिछली महागठबंधन सरकार में लालू प्रसाद ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री का ओहदा दिलवा कर शांत किया.
फिर भी, आरजेडी की कमान संभाल रहे अपने छोटे भाई और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का रुख़ जब-जब उन्हें अपने अनुकूल नहीं लगता है, तब-तब वह भड़क उठते हैं.
लेकिन उनका यह भड़कना स्थायी इसलिए नहीं बन पाता है, क्योंकि समझाने-बुझाने से मान जाना भी उनके स्वभाव में शामिल है. तभी तो वह तेजस्वी को अर्जुन मान कर ख़ुद को उसका सारथी कृष्ण बताते रहते हैं.
यही बात लालू परिवार और आरजेडी को अब तक बड़ी राहत देती रही है और दूसरी तरफ़ इस परिवार में स्थायी फूट की राह देख रहे विरोधियों को इसी बात से निराशा होती है.
बुधवार को पटना में, लालू की अनुपस्थिति में और तेजस्वी के नेतृत्व में आरजेडी का जो 22वाँ स्थापना दिवस समारोह हो रहा है, उसमें भी तेज़ प्रताप को ख़ुश रखने की कोशिश दिखती है.
समारोह से संबंधित पोस्टर-बैनर मे उनकी नवविवाहिता पत्नी ऐश्वर्य की तस्वीर राबड़ी देवी और मीसा भारती के बीच प्रमुखता से छापी गई है.
माना जा रहा है कि मायके में भी एक प्रमुख राजनीतिक परिवार की बेटी रही ऐश्वर्य को अगले लोकसभा चुनाव में छपरा से पार्टी उम्मीदवार बना सकती है.
पूर्व मुख्यमंत्री दारोग़ा राय की पोती ओर पूर्व मंत्री चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्य को सियासत में आगे बढ़ा कर लालू जी अपने बड़े बेटे को किसी भटकाव से बचाना चाहते होंगे.
लेकिन यह तभी संभव होगा, जब तेज़ प्रताप ख़ुद अपने ऊपर लग रहे इस आरोप को ग़लत साबित कर सकें कि अक्सर वह लफुआ (लुम्पेन) स्तर की सियासी टोली के बॉस जैसा व्यवहार करते हैं.
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और इस तरह से लालू के लाल हो गए ऐश्वर्या के...
चंद्रिका राय जैसे पढ़े-लिखे और सुलझे हुए व्यक्ति इतना तो चाहते ही होंगे कि उनके दामाद को अपने बोल-व्यवहार में गरिमा का ख़याल रहे.
वैसे, तरह-तरह के विवादों से निकल नहीं पा रहे लालू परिवार में साधु-सुभाष वाले विकटकाल की पुनरावृत्ति तो उनके मौजूदा निकटस्थ भी नहीं चाहते होंगे.
हालाँकि इसे विडंबना ही कहेंगे कि निष्पक्ष नज़रों को अब तमाम सफ़ेद सियासी कपड़ों पर काले धब्बों की ही भरमार दिखती है. अपवाद मिलना कठिन हो गया है.
जिस 'नीतीश चाचा' को तेज़ प्रताप अपने सरकारी आवास में प्रवेश निषेध (नो एंट्री) की तख़्ती दिखा रहे हैं, उन्हीं के चरण-स्पर्श वाले दिनों को भूल पाना उनके लिए संभव है?
शायद वो नहीं समझ रहे कि अपनी चूक छिपाने के लिए बात-बात पर बीजेपी-आरएसएस के मत्थे आरोप मढ़ देने वाली आदत उन्हें हँसी का पात्र बना सकती है.
सोशल मीडिया पर उनकी हालिया टिप्पणी और फिर उससे मुकरने के सिलसिले में यही हुआ.
कुल मिला कर देखें तो लालू परिवार की राजनीति में तेज प्रताप की स्थिति और भूमिका फ़िलहाल ऐसी नहीं लगती कि विभाजन जैसे संकट की आशंका प्रबल हो.
भड़कते-संभलते, रूठते-मनाते, स्वाँग रचाते और अपने परिवार या पार्टी का धर्मसंकट बढ़ाते-घटाते अभी इसी तरह चलते रहेंगे तेज़ प्रताप.
लेकिन हाँ, फिर से अगर सत्ता-हिस्सेदारी का मौक़ा आ जाए और दिमाग़ ज़्यादा फिर जाए तो बात दूसरी है.












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