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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक और मर्यादा की उम्मीद?

अपना मजाक उड़वाने के क्रम में ही पीएम ने पिछले दिनों यूपी के अलग-अलग शहरों में सभाओं के दौरान श्मशान-कब्रिस्तान और ईद-दिवाली पर बिजली की चर्चा कर दी। जब उनका हकीकत से सामना हुआ तो शर्माना पड़ा।

गोरखपुर: लगता है कि देश में अब गंभीर मुद्दों का भी मजाक उड़ाना सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत से यदि मर्यादा खत्म होने लगे इसे बहुत बड़े क्षरण की संज्ञा दी जा सकती है। अब यदि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के चुनावी संग्राम में तार-तार होती मर्यादाओं की बात करें तो बेशक यह बहुत दुखदायी है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है, यह सबको पता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक और मर्यादा की उम्मीद?

ताजा घटनाक्रम तो अपना और अपने पद की गरिमा का मजाक उड़वाने के लिए पीएम नरेन्द्र मोदी को ही जिम्मेदार मान रहे हैं। इतने बड़े लोकतांत्रिक देश में बहुत सारे जरूरी, संवेदनशील कार्यों को छोड़ एक राज्य की गलियों में घुम-घुम चुनाव प्रचार कर अपनी भद्द पिटवाने के लिए खुद मोदी ही जिम्मेदार हैं। जरा सोचिए, राजद प्रमुख लालू प्रसाद जैसा नेता भी अब नरेन्द्र मोदी की बातों को ओछी, छोटी और हल्की बताने लगा है। जिस लालू प्रसाद के ठेठ अंदाज को देखकर पूरा देश अनायास ही हंसने लगता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि लालू प्रसाद भी अपना मजाक उड़वाने के लिए खुद जिम्मेदार हैं। पर, उनका तो चलेगा क्योंकि वह देश के राष्ट्राध्यक्ष नहीं हैं लेकिन मोदी जैसे लोकप्रिय पीएम का अपना मजाक उड़वाना शोभा नहीं देता। पीएम मोदी को चाहिए कि वह मेरी भावनाओं को समझें। मेरी इच्छा है कि सच में पीएम वैसी कोई बात न बोलें, वैसा कोई आचरण न करें, जिससे उनके पद की गरिमा घायल हो। लेकिन लगता नहीं कि उनकी आदत सुधरने वाली है, क्योंकि वे बोलने के आदि हो चुके हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक और मर्यादा की उम्मीद?

करीब आठ माह पहले गुजरात के एक सिविल कोर्ट ने पीएम नरेंद्र मोदी का कथित तौर पर मजाक उड़ाने वाली गुजराती भाषा की पुस्तक 'फेकूजी हवे दिल्ली मा (फेकू जी दिल्ली में हैं)' नाम की किताब पर प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया। यह किताब जयेश शाह ने लिखी है। सिविल कोर्ट के न्यायाधीश एएम दवे ने संविधान के अनुच्छेद 19 का हवाला देते हुए इस किताब पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया था। न्यायाधीश का कहना था कि किताब पर प्रतिबंध लगाने से अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार का उल्लंघन होगा। इस किताब में 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी के कई वादों की सूची है। दावा किया गया है कि मोदी इन वादों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं। किताब पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका नरसिंह सोलंकी ने दायर की थी। सोलंकी का कहना था कि किताब का उद्देश्य मोदी को बदनाम करना है। किताब की विषयवस्तु और नाम अपमानजनक और अनादर करने वाले हैं और इससे पीएम की छवि खराब होगी। सोलंकी के मुताबिक, मोदी महज दो वर्ष पहले सत्ता में आए और चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादों को पूरा करने के लिए यह काफी कम समय है। सोलंकी ने किताब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए कोर्ट से तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की थी। बता दें कि यह किताब बाजार में है। कोर्ट ने सोलंकी की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि लोगों को किताब के माध्यम से निजी विचार रखने का अधिकार है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक और मर्यादा की उम्मीद?

इसी क्रम में आपको यह भी बता दें कि जुलाई 2013 में बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाने वाली एक वेबसाइट 20 घंटे में ही बंद हो गई थी। वेबसाइट बनाने वाले ने क्विट नोट में लिखा था कि तंग आकर उन्हें साइट को हटाना पड़ा। ट्विटर पर इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं भी छिड़ीं। कुछ लोगों का कहना था कि यह मोदी को बदनाम करने की कांग्रेस की साजिश है, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि मोदी समर्थकों को मजाक समझने की कला विकसित करनी चाहिए। इस मामले में बीजेपी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। इसी के साथ राहुल गांधी का मजाक उड़ाने वाली एक साइट भी बनाई गई। दोनों वेबसाइट्स के नाम को देख कर ऐसा लगा कि ये नरेंद्री मोदी की योजनाएं और राहुल गांधी की उपलब्धियों को बताने के लिए बनाई गईं। लेकिन ऐसा नहीं है, बल्कि ये नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी का मजाक उड़ाने के लिए बनाई गईं। मोदी वाली वेबसाइट बनाने वाले ने लिखा कि मैं हार मानता हूं। मुझे लगा था कि बोलने की आजादी देने वाले देश में मैं किसी नेता पर रचनात्मक तरीके से अच्छा व्यंग्य कर सकता हूं। लेकिन मैं गलत था। इस प्रकरण से साबित हो रहा है कि बतौर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी मशीनरी ज्यादा गंभीर व संवेदनशील थी। जबकि पीएम बनने के बाद वे खुद और उनके सलाहकार हल्की और ओछी बातें करने लगे हैं। यह भी कह सकते हैं कि राज्य स्तर के किसी नेता का स्तरहीन बातें तो आबो-हवा के मुताबिक सहन हो जाती है, पर राष्ट्रीय स्तर के लोकप्रिय नेता के लिए मजाक करने अथवा मजाक बनने वाली बातें कुछ ज्यादा नहीं जमतीं।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए हो रहे प्रचार के बाबत गहमागहमी जारी है। इस चुनाव में सभी दलों के प्रमुख अपनी पार्टी को जिताने के लिए प्रयासरत हैं। भाजपा प्रत्याशियों के लिए अध्यक्ष अमित शाह, कांग्रेस-सपा के लिए राहुल गांधी-अखिलेश यादव, बसपा के लिए मायावती और ससपा के लिए अभिनेता राजपाल यादव धुआंधार प्रचार अभियान को अंजाम दे रहे हैं। इतना तो सहनीय है, पर बीच-बीच देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यूपी के विभिन्न शहरों में सभाओं को संबोधित कर रहे हैं। इस दौरान उनके द्वारा की जाने वाली कथित तथ्यहीन बातें मजाक बन रही हैं। हां, यह अलग बात है कि अपनी कथित तथ्यहीन बातों पर मोदी तालियां जरूर बटोर रहे हैं, पर आम जनता दबी जुबान यह कहने से भी नहीं चुक रही कि एक पीएम को इतनी हल्की बातें नहीं करनी चाहिए। पीएम मोदी के हल्के हाव-भाव, तालियां बटोरने के लिए गढ़े जाने वाले कथित जुमलों के बाबत अराजनीतिक किन्तु देश के चर्चित कारोबारी तहसीन पूनावाला का वीडियो वायरल हुआ। जिस पर कुछ भाजपाइयों की नजरें भी टेढ़ी हुई थीं। चूंकि उक्त वीडियो में तहसीन पूनावाला द्वारा कही गई कोई भी बात गलत नहीं थी, इसीलिए उस मुद्दे ने तूल नहीं पकड़ा। तहसीन ने अंग्रेजी में पीएम को नसीहत दी है- 'मिस्टर पीएम आप देश के बड़े नेता हैं। आप अपने पद की गरिमा का ख्याल रखें। आप कोई गली-मोहल्लों के छुटभैया लीडर नहीं जो तालियां बजवाने के लिए कुछ भी बोल दे। आप अपनी हल्की बातों से परहेज कीजिए।'

अपना मजाक उड़वाने के क्रम में ही पीएम ने पिछले दिनों यूपी के अलग-अलग शहरों में सभाओं के दौरान श्मशान-कब्रिस्तान और ईद-दिवाली पर बिजली की चर्चा कर दी। जब उनका हकीकत से सामना हुआ तो शर्माना पड़ा और दूसरे मुद्दे गढ़े जाने लगे। दिलचस्प तो यह है कि जब पीएम की उल्टी-सीधी बातों को राहुल गांधी-अखिलेश यादव, मायावती और अभिनेता राजपाल यादव द्वारा अलग-अलग संज्ञान लेकर संयमित अंदाज में जवाब दिया जा रहा है तो मोदी समर्थक बगले झांकने को विवश हो रहे हैं। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस आईटी सेल के संयोजक विशाल कुन्द्रा ने तो फेसबुक, ट्वीटर और ह्वाट्स एप पर मोदी विरोधी पोस्ट्स की झड़ी लगा दी है। जबकि यूपी कांग्रेस से जुड़े पवन दीक्षित व दीपक शर्मा भी भाजपा विरोधी पोस्ट्स को लेकर हमलावर दिख रहे हैं। इतना ही नहीं, अमेरिका से पठन-पाठन कर सेवानिवृत होकर भारत लौटे और पीएम नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में बड़े राजनीतिक घराने से ताल्लुक रखने वाले प्रो. राज यादव, जिन्हें बनारस मंडल में कांग्रेस-सपा उम्मीदवारों की जीताने की जिम्मेदारी अखिलेश यादव ने दी है, कहते हैं-'मोदी की हल्की बातें पीएम पद की गरिमा को गिरा रही हैं। इससे इलाके के लोग मायूस और पीएम मोदी से खफा हैं।' बावजूद इसके मुझे उम्मीद है कि नरेन्द्र मोदी अपने पद की गरिमा के अनुरूप जनहित में काम करेंगे और बातें भी एसी करेंगे, जिससे उनकी मर्यादा बढ़े। बहरहाल, देखना है कि क्या-क्या हो पाता है?

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