रवींद्र नाथ टैगोर, महाराणा प्रताप और गोपाल कृष्ण गोखले की जयंती पर पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि
आज पूरा देश रवींद्र नाथ टैगोर, महाराणा प्रताप, गोपाल कृष्ण गोखले की जयंती मना रहा है इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों महान विभूतियों को श्रद्धांजलि अर्पित की है।
नई दिल्ली, 9 मई। आज पूरा देश भारत की तीन महान विभूतियों (रविंद्र नाथ टैगोर, महाराणा प्रताप, गोपाल कृष्ण गोखले) की जयंती मना रहा है इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रवींद्र नाथ टैगोर, महाराणा प्रताप और गोपाल कृष्ण गोखले को श्रद्धांजलि अर्पित की है।

पीएम मोदी ने ट्वीट कर लिखा- 'महान स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी गोपाल कृष्ण गोखले को उनकी जयंती पर शत-शत नमन। राष्ट्रसेवा में समर्पित उनका जीवन देशवासियों को सदा प्रेरित करता रहेगा।'
वहीं, महाराणा प्रताप को उनकी जयंती पर श्रंद्धाजलि अर्पित करते हुए पीएम मोदी ने लिखा- 'अपने अप्रतिम साहस, शौर्य और युद्ध कौशल से मां भारती को गौरवान्वित करने वाले महान योद्धा महाराणा प्रताप को उनकी जयंती पर आदरपूर्ण श्रद्धांजलि। मातृभूमि के लिए उनका त्याग और समर्पण सदैव स्मरणीय रहेगा।'
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पीएम मोदी ने देश को जन गण मन राष्ट्रगान देने वाले रवींद्र नाथ टैगोर को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए लिखा- 'टैगोर जयंती पर, मैं महान गुरुदेव टैगोर को नमन करता हूं। उनके अनुकरणीय आदर्श हमें उस भारत का निर्माण करने के लिए शक्ति और प्रेरणा देते रहें जिसका उन्होंने सपना देखा था।'
मेवाड़ मुकुट महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान की मेवाड़ रियासत के कुंभलगढ़ में राणा उदय सिंह व रानी जयंतबाई के घर हुआ था। महाराणा प्रताप ने मुगलों के खिलाफ हल्दी घाटी के युद्ध में अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया। वह मुगलों के किसी भी प्रलोभन के आगे नहीं झुके। महाराणा प्रताप की ताकत का लोग स्वयं मुगल सम्राट अकबर भी मानते थे।
वहीं, गुरु रवींद्र नाथ टैगोर की प्रतिभा से भला कौन वाकिफ नहीं। टैगोर विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। वह पहले ऐसे भारतीय, पहले एशियाई और पहले गैर यूरोपीय थे जिन्हें साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत का राष्ट्रगान जन गण मन उन्हीं की देन है।
वहीं, महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु रहे गोपाल कृष्ण गोखले ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। भारत में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की। उन्होंने लगातार ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई। भारत माता की सेवा करते करते 19 फरवरी, 1915 में उनका निधन हो गया।
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