मोदी की 'No Gold' अपील से क्या सच में 1 करोड़ लोग हो जाएंगे बेरोजगार? इस चेतावनी के पीछे की 'इनसाइड स्टोरी'
पश्चिम एशिया (West Asia) के तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक अपील ने देश के सर्राफा बाजार में हड़कंप मचा दिया है। पीएम मोदी ने देशवासियों से अगले एक साल तक सोना (Gold) न खरीदने की अपील की है।
पीएम मोदी का इरादा तो देश की विदेशी मुद्रा बचाना और अर्थव्यवस्था को मजबूती देना है, लेकिन इस अपील ने एक बड़े डर को जन्म दे दिया है-क्या भारत के सबसे चमकदार गोल्ड इंडस्ट्री में काम करने वाले 1 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी छिन जाएगी? आइए जानें इस बहस के पीछे का अर्थशास्त्र क्या है और एक्सपर्ट का क्या कहना है।

▶️ज्वैलरी काउंसिल की चिंता, नौकरी पर संकट, क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
प्रधानमंत्री नरेंद्र की अपील पर प्रतिक्रिया देते हुए न्यूज एजेंसी ANI 'ऑल इंडिया जेम एंड ज्वैलरी डोमेस्टिक काउंसिल' (GJC) के चेयरमैन राजेश रोकड़े ने एक संतुलित लेकिन गंभीर पक्ष रखा है। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी का 'आत्मनिर्भर भारत' और 'विकसित भारत 2047' का विजन पूरी तरह राष्ट्रहित में है और एक देशभक्त के तौर पर हम उनके साथ हैं। लेकिन, उन्होंने एक कड़वी हकीकत की ओर भी इशारा किया।
भारत में ज्वैलरी उद्योग केवल चमक-धमक का नाम नहीं है, बल्कि यह देश की जीडीपी (GDP) में लगभग 7 प्रतिशत का योगदान देता है। रोकड़े के अनुसार, इस सेक्टर में 1 करोड़ से ज्यादा लोग सीधे तौर पर काम करते हैं। इनमें शोरूम कर्मचारी, बारीक नक्काशी करने वाले कलाकार और कारीगर शामिल हैं। अगर लोग अचानक सोना खरीदना बंद कर देते हैं, तो इन करोड़ों परिवारों के चूल्हे ठंडे हो सकते हैं।
▶️एक सेक्टर डूबेगा तो साथ ले जाएगा कई और कारोबार
एक्सपर्ट्स राजेश रोकड़े का मानना है कि सोने की मांग घटने का असर सिर्फ सुनारों तक सीमित नहीं रहेगा। ज्वैलरी इंडस्ट्री के साथ बैंकिंग, इंश्योरेंस, फर्नीचर, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स जैसे कई अन्य क्षेत्र भी जुड़े हुए हैं।
अगर ज्वैलरी की बिक्री में बड़ी गिरावट आती है, तो इन सभी संबंधित क्षेत्रों में भी छंटनी का खतरा बढ़ जाएगा। यही वजह है कि पीएम की अपील के बाद शेयर बाजार में हड़कंप मच गया और टाइटन, कल्याण ज्वैलर्स, पीएनजी ज्वैलर्स और थंगमयिल ज्वैलरी जैसी दिग्गज कंपनियों के शेयर 4 से 8 प्रतिशत तक गिर गए।
▶️इन्वेस्टमेंट और ज्वैलरी के बीच का 'मिडिल पाथ'
राजेश रोकड़े ने एक बहुत ही व्यावहारिक सुझाव दिया है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री की अपील उन लोगों के लिए बिल्कुल सही है जो केवल 'इन्वेस्टमेंट' के लिए सोने के सिक्के या बिस्किट (Bullion) खरीदते हैं। इसे रोकने से विदेशी मुद्रा की बचत होगी और रुपये को मजबूती मिलेगी।
लेकिन, भारत में सोना केवल निवेश नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा है। शादियों और त्योहारों के लिए खरीदी जाने वाली ज्वैलरी पर पाबंदी लगाने से आर्थिक चक्र थम सकता है। इसलिए, उद्योग जगत का मानना है कि केवल 'गैर-जरूरी' सोने की खरीद को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
▶️क्या है समाधान? गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम
काउंसिल ने सरकार के सामने एक क्रांतिकारी प्रस्ताव रखा है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि भारतीय घरों और मंदिरों में करीब 40,000 से 50,000 टन सोना बेकार पड़ा है।
- प्रस्ताव: अगर सरकार इस घरेलू सोने को 'मोनेटाइज' (मुद्रा में बदलना) करने की योजना प्रभावी ढंग से लागू करे।
- फायदा: यदि इस भंडार का मात्र 10 से 20 प्रतिशत हिस्सा भी बाजार में आ जाता है, तो भारत को अगले 10 साल तक एक ग्राम सोना भी विदेश से आयात (Import) करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे डॉलर बचेगा और देश का 1 करोड़ रोजगार भी सुरक्षित रहेगा।
▶️ आगे का रास्ता क्या है?
पीएम मोदी की चिंता वाजिब है क्योंकि कच्चा तेल 105 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुका है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में तनाव से सप्लाई चैन खतरे में है। ऐसी स्थिति में विदेशी मुद्रा बचाना 'आर्थिक देशभक्ति' है।
हालांकि समाधान पूरी तरह से खरीद बंद करने में नहीं, बल्कि बेकार पड़े सोने को अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में लाने में छिपा है। अगर सरकार ज्वैलरी काउंसिल के 'एंड-टू-एंड मोनेटाइजेशन' समाधान को अपनाती है, तो हम सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी-यानी देश का डॉलर भी बचेगा और 1 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी भी सुरक्षित रहेगी।














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