पीयूष गोयल ने संसद में चीन को लेकर जो कहा, वह भारत के लिए चिंताजनक क्यों

चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा लंबे वक़्त से भारत सरकार के लिए चिंता का विषय रहा है.

यूपीए सरकार और नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार, दोनों में इस व्यापार घाटे को क़ाबू करने की रणनीति बनाने और उस पर अमल के तरीक़ों पर चर्चा होती रही है.

हाल में इस सवाल पर संसद में एक बार फिर ज़ोरदार चर्चा हुई. वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने राज्यसभा में इस बात पर चिंता जताई कि भारत किस क़दर कई चीज़ों के लिए चीन पर निर्भर होता जा रहा है.

गोयल ने यूपीए सरकार का नाम तो नहीं लिया लेकिन उन्होंने आँकड़ा का हवाला देते हुए कहा कि 2003-2004 में चीन से भारत का आयात 4.34 अरब डॉलर का था. लेकिन 2013-14 आते-आते ये बढ़ कर 51.03 अरब डॉलर का हो गया.

यानी दस साल में ये आयात बढ़ कर दस गुना से भी ज़्यादा हो गया.

उन्होंने कहा, ''पूरा देश घटिया और ऐसी चीज़ों से भर गया जिनकी क़ीमतों को लेकर कोई पारदर्शिता नहीं थी. इन सालों में हम पूरी तरह चीनी सामानों पर निर्भर होते गए.''

गोयल ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मज़बूत करने के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव स्कीम (पीएलआई) शुरू की है ताकि चीन पर आयात निर्भरता घटाई जा सके.

गोयल ने कहा कि पहले देश में इस्तेमाल होने वाले लगभग सारे स्मार्टफ़ोन चीन से मंगाए जाते थे. यहाँ तब मोबाइल हैंडसेट के सिर्फ़ दो प्लांट थे. लेकिन अब पीएलआई स्कीम की बदौलत देश में मोबाइल फोन सेक्टर में 200 कंपनियां हैं.

चीन कितना हावी?


गोयल के मुताबिक 2004-05 में भारत और चीन के बीच 1.48 अरब डॉलर का व्यापार घाटा था लेकिन 2013-14 में ये बढ़ कर 36.21 अरब डॉलर तक पहुँच गया.

उन्होंने कहा कि भारत पहले एपीआई यानी दवा बनाने में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल पूरी दुनिया को निर्यात करता था. लेकिन पिछले दस-बीस साल में भारत इस कारोबार में पिछड़ता चला गया और अब यहाँ का दवा उद्योग चीनी एपीआई इंडस्ट्री पर निर्भर हो गया है.

गोयल ने कहा कि चीन समेत दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने के लिए ही मोदी सरकार ने 'मेक इन इंडिया' जैसा अभियान और पीएलआई स्कीम शुरू की है.

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि चीन पर भारत की निर्भरता कम करने पर लगातार जोर दिए जाने के बावजूद दोनों के कारोबार में लगातार इज़ाफा हो रहा है.

यहाँ तक कि सीमा पर तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय करोबार में 43.3 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

लेकिन द्विपक्षीय कारोबार का पलड़ा पूरी तरह चीन के पक्ष में झुका है. यानी चीन का निर्यात भारत की तुलना में कई गुना ज़्यादा है.

वित्त वर्ष 2020-21 में चीन ने भारत को 65.21 अरब डॉलर के मूल्य का सामान निर्यात किया था. लेकिन वित्त वर्ष 2021-22 में इसमें तेज इजाफा हुआ और यह 94.57 अरब डॉलर तक पहुंच गया.

गोयल की ओर से राज्यसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक़ वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान भारत और चीन के बीच 44.33 अरब डॉलर का व्यापार घाटा था. लेकिन वित्त वर्ष के दौरान ये बढ़ कर 73.31 अरब डॉलर पर पहुंच गया.

बेहतर हालात के लिए क्या करे भारत?


विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के लिए फ़िलहाल चीन पर निर्भरता ख़त्म करना काफ़ी मुश्किल है. आपसी कारोबार में चीन भारत पर इतना हावी है कि इससे आने वाले कुछ वर्षों में राहत मिलती नहीं दिखती.

लेकिन इसका एक तरीक़ा है और वे ये कि भारत अपने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मज़बूत करे.

विशेषज्ञों के मुताबिक भारत ने इसकी शुरुआत की है लेकिन इसे लंबे समय तक इसमें ज़ोर लगाना होगा.

इंस्टिट्यूट ऑफ चाइनीज स्टडीज के सीनियर फेलो अरविंद येलेरी ने इस मुद्दे पर बीबीसी से बात करते हुए कहा, ''हमारे पास क्षमताएं हैं लेकिन इसे बढ़ाने की ज़रूरत है. मसलन हमें इलेक्ट्रॉनिक्स और केमिकल मैन्युफैक्चरिंग में अपनी क्षमताएं बढ़ानी होंगी. इससे तीन काम होंगे. एक तो इससे हमारी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ेगी. रोजगार बढ़ेगा और देश के निर्यात बाज़ार का भी विस्तार होगा. ''

लेकिन क्या सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाना ही इसका हल है?

अरविंद येलेरी कहते हैं, ''देश में फ़िलहाल मैन्युफैक्चरिंग को रोज़गार बढ़ाने के नज़रिये से देखा जा रहा है. लेकिन हमें निर्यात बाज़ार पर भी ध्यान देना होगा. हम उन बाज़ारों में प्रवेश करें, जहाँ अच्छी संभावना दिख रही हो. अगर रोजगार की गुणवत्ता बढ़ाएंगे तो निर्यात के नए बाज़ारों में हमारी प्रतिस्पर्द्धी क्षमताएं मज़बूत होंगी. ''

चीन
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छोटी और लंबी अवधि की रणनीति


कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अगर चीन पर अपनी आयात निर्भरता कम करना चाहता है तो उसे छोटी और लंबी अवधि दोनों तरह की रणनीति बनानी होगी.

शिव नादर यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर और चीनी मामलों के विशेषज्ञ जबिन टी जैकब का कहना है, ''सिर्फ़ मैन्युफैक्चरिंग को मज़बूत करने की स्कीम लाने से ही बात नहीं बनेगी. इस प्रयास में हमें राज्यों को भी जोड़ना होगा. केंद्र सरकार सारी ताक़त अपने हाथ में रखने की कोशिश कर रही है. उसे इससे बचना होगा. राज्यों को अपनी क्षमताएं बढ़ाने का मौक़ा देना होगा ताकि वहां मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार हो सके. ''

जैकब बताते हैं, ''चीन में अलग-अलग प्रांत अलग-अलग देश में निवेश जुटाने जाते हैं. दरअसल, वहाँ राज्यों को आर्थिक नीति तय करने में काफ़ी आज़ादी दी जाती है. स्थानीय स्तर पर केंद्र की काफ़ी मदद मिलती है लेकिन भारत में यह स्थिति नहीं है. यहाँ अब भी केंद्र-राज्य संबंध काफ़ी राजनीतिक है. अर्थव्यवस्था पर राजनीति हावी है. ''

ये अच्छी बात है कि भारत में इस दिशा में कोशिश हो रही है. जैसे सेमी कंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के लिए गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु में फैब्रिकेशन प्लांट बनने जा रहे हैं.

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प्राइवेट के साथ पब्लिक सेक्टर को भी मिले तवज्जो


जैकब इसे अच्छी शुरुआत मानते हैं और कहते हैं कि ऐसा ही होना चाहिए. ये सही रणनीति है.

लेकिन वो कहते हैं, ''ये अच्छी बात है कि लेकिन सरकार को सिर्फ़ प्राइवेट सेक्टर के लिए ही नहीं बल्कि पब्लिक सेक्टर में भी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की कोशिश करनी चाहिए. चीन में केंद्र और प्रांतीय सरकारें पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर दोनों के लिए सुविधाएं जुटाने पर ज़ोर देती हैं. ''

जैकब कहते हैं, ''भारत में पब्लिक सेक्टर में अक्षमता और करप्शन जैसी समस्याएं हो सकती हैं लेकिन ये सेक्टर इतना बड़ा है कि इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. इसकी क्षमताएं काफ़ी ज़्यादा हैं. इसलिए भारत सरकार को पब्लिक सेक्टर को प्रोत्साहित करना होगा कि वो दूसरे देशों में जाकर निवेश करें. जोखिम लें. ग़लतियां होंगी लेकिन इसी से रास्ता निकलेगा. सरकार समर्थन के लिए तैयार रहे. तभी भारत अपनी निर्यात क्षमता मज़बूत कर सकेगा और चीन से मुक़ाबला कर पाएगा. ''

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चीन के मुक़ाबले भारतीय मैन्युफैक्चरिंग कहाँ पिछड़ रही है?


अरविंद येलेरी कहते हैं, ''चीन में उच्च और तकनीकी शिक्षा में काफ़ी निवेश किया जा रहा है. इससे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की क्षमताएं बढ़ती जा रही हैं. भारत को भी ये करना होगा. आज हालात ये हैं कि चीनी विश्वविद्यालयों के पास नए पेटेंट की भरमार है. इस मामले में वह अमेरिका को भी टक्कर दे रहा है.''

''चीनी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को पता है कि कौन सी चीज़ बनानी और किस तरह. साथ ही उन्हें ये भी पता है कि इसका बाज़ार कहाँ हो सकता है. इन सभी क्षेत्र में चीनी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां काफ़ी आक्रामक होकर काम करती हैं. ''

भारत सरकार चीनी सामानों की डंपिंग को लेकर चिंतित रही है और इसने पड़ोसी देशों से एफडीआई से जुड़े नियमों को संशोधित किया है. हालांकि इसका मक़सद चीनी एफडीआई को रोकना रहा था ताकि कोरोना के दौरान चीनी कंपनियां भारतीय कंपनियों का अधिग्रहण न कर सकें.

भारत ने पिछले साल दिसंबर में पांच चीनी प्रोडक्ट पर एंटी डंपिंग ड्यूटी भी लगाई थी. इनमें एल्यूमीनियम और केमिकल प्रोडक्ट शामिल हैं. इसका मकसद भारतीय कंपनियों को संरक्षण देना था.

जबिन जैकब कहते हैं कि सरकार भारतीय कंपनियों को प्रोत्साहित करे ताकि वे बाहर जाकर निवेश कर सकें.

वो कहते हैं, ''टाटा और अदानी जैसी कंपनियों को छोड़ कर बहुत कम ऐसी निजी कंपनियां हैं जो बाहर जाकर निवेश कर रही हैं. केंद्र सरकार को निजी कंपनियों को न सिर्फ घर में बल्कि बाहर भी प्रोत्साहित करना होगा तभी भारतीय कंपनियां मजबूत होगी और भारतीय निर्यात का दायरा बढ़ेगा. इन्हीं रणनीतियों के सहारे हम चीन पर अपनी निर्भरता घटा सकेंगे.

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