Delhi Assembly Polls: परफॉर्मेंस बनाम राजनीतिक बयानबाजी, रुख किधर रहेगी?
OPINION: प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी (AAP) का आकलन जनता पिछले विधानसभा चुनाव के वादों और 10 वर्ष में किए गए कार्यों के आधार पर करेगी। इसलिए आप के सामने काम न दिखाने की चुनौतियां कम है।
प्रमुख विपक्षी पार्टी की राह आसान नहीं
बात करें पूर्व में हुए आठ दिल्ली विधानसभा चुनाव एवं तीन Metropolitan Council Election के रिजल्ट पर, तो आप के सामने डट कर मुकाबला करने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए दिल्ली के किले को भेदना आसान नहीं है। अगर दो चुनाव को छोड़ दें, मगर भाजपा उस जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाई। यही वजह है कि दिल्ली की सत्ता से 26 वर्षों का बनवास दूर करने के लिए भाजपा को मत प्रतिशत बढ़ाना होगा।

'काम की राजनीति' या सत्ता विरोधी लहर ला सकती है बदलाव ?
एक तरफ दिल्ली की सत्ता पर एक दशक से काबिज आम आदमी पार्टी अपने काम को लेकर जनता के बीच में जा रही है। आप शिक्षा, स्वास्थ्य, फ्री बिजली, पानी और Infrastructure के क्षेत्र में अपनी सरकार द्वारा किए गए कामों को लेकर आश्वस्त दिख रही है। वहीं, गाहे बगाहे दिल्ली की जनता के बीच भी बातचीत होती है। लेकिन अंत में फैसला तो उन्हीं (जनता) को ही लेना है।
सीएम फेस के बिना मैदान में बीजेपी और कांग्रेस
राजधानी की जंग में प्रमुख विपक्षी बीजेपी सीएम फेस का ऐलान किए बिना चुनावी कुरुक्षेत्र में उतरने की तैयारी में है। ऐसी चर्चा है कि यह फैसला आप सरकार के एंटी इनकंबेंसी को भुनाने और पुराने ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए लिया गया है। साल 1998 से लेकर अब तक बीजेपी ने दिल्ली के 5 चुनावों में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया, लेकिन एक बार भी पार्टी दिल्ली की सत्ता तक नहीं पहुंच पाई। 1998 और 2015 में तो पार्टी के रिजल्ट में गिरावट ही दर्ज की गई। इसके ठीक उलट 2020 में बीजेपी बिना सीएम फेस मैदान में उतरी और 2015 से आठ सीटें जीतने में कामयाब रही।
क्या अरविंद केजरीवाल ने बना ली बढ़त?
सत्ताधारी आम आदमी पार्टी मुख्यमंत्री फेस को लेकर लगातार सवाल उठा रही है। आप संयोजक किसी भी मंच पर बीजेपी को घेरने का मौका नहीं छोड़ते। बीते दिनों उन्होंने पीएम के बयान के बाद ये तक कह दिया कि 'आपदा' BJP में आई हुई है। इनके पास एक चेहरा तक नहीं है।"
बात सीएम फेस की हो या जनकल्याणकारी योजनाओं के सहारे या फिर उम्मीदवारों की घोषणा कर बाजी मारने की, आम आदमी पार्टी अपना चुनावी एजेंडा सेट करने में शुरूआत से ही लगी है। दिल्ली की सियासी पीच पर 'आप' राजनीतिक बढ़त बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही। वहीं, विपक्षी बीजेपी और दशकों से अपनी सियासी जमीन खो चुकी कांग्रेस ने उम्मीदवारों की घोषणा और चुनावी वादे करने में सत्ताधारी दल से पीछे दिख रही है। लेकिन इन सब के बावजूद फैसला दिल्ली की जनता को लेना है।
इन सबके बीच दिल्ली की राजनीति में अब आरोप-पत्यारोप शुरु हो गए हैं। बीजेपी और कांग्रेस अरविंद केजरीवाल के काम को लेकर उनपर हमलावर हैं। बीते दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आम आदमी पार्टी को 'आपदा' कहा। जिसके बाद आप संयोजक ने पलटवार किया और कहा कि भारतीय जनता पार्टी केजरीवाल को गालियां देकर चुनाव जीतना चाहती है। भाजपा ने दिल्ली के लोगों के लिए कोई काम नहीं किया है। केजरीवाल ने 2020 में भाजपा द्वारा लोगों को मकान दिए जाने के वादे को याद दिलाया।
दशकों से दिल्ली की सियासत में आम आदमी पार्टी का वर्चस्व आम लोगों के लिए दूरदर्शी योजनाओं का परिणाम है। देखना यह है कि आप सरकार अपने सियासी वर्चस्व को बचाए रखने में कहां तक सफल होती है? साथ ही यह भी देखना होगा कि इस बारे के चुनाव में 'काम की चर्चा' या प्रत्यारोपन ही किया जाएगा?
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