कोयले से बिजली उत्पादन की कितनी भारी कीमत चुका रहे हैं खदानों के करीब रह रहे लोग, आइए जानें
कोयला खनन पर्यावरण के लिए हानिकारक है। लेकिन जब नीति निर्माता और कार्यकर्ता विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण पर बहस करते हैं, तो खदानों के करीब रहने वाले समुदायों को कुछ विनाशकारी परिणामों का सामना करना पड़ता है।
नई दिल्ली, 4 अगस्त। कोयला खनन पर्यावरण के लिए हानिकारक है। लेकिन जब नीति निर्माता और कार्यकर्ता विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण पर बहस करते हैं, तो खदानों के करीब रहने वाले समुदायों को कुछ विनाशकारी परिणामों का सामना करना पड़ता है। आज के समय में बिजली हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन चुकी है। बिजली हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है शायद हमें इसकी विस्तार से चर्चा करने की जरूरत नहीं है। अगर जरूरत है तो वह इस बात की की बिजली की बर्बादी को कैसे बचाया जाए। भारत में कई तरीकों से बिजली की बर्बादी होती है, जिसमें बिजली चोरी का योगदान सबसे ज्यादा है। इसके अलावा लोगों का बिजली निर्माण के संसाधनों के प्रति जागरूक न होना और जागरूक होकर भी इसकी अनदेखी करना इसके प्रमुख कारण हैं। दुर्भाग्य ये है कि अनपढ़ लोगों के अलावा पढ़ा-लिखा वर्ग भी बिजली की बर्बादी के लिए जिम्मेदार है। इसका ताजा उदाहरण हमें देखने को मिला गाजियाबाद के एक सरकारी दफ्तर हमें जहां दफ्तर बंद होने के बाद भी उसकी लाइट्स और पंखे चले हुए छोड़ दिए गए और जब जिलाधिकारी ने मौके पर जाकर नीरिक्षण किया तो अधिकारियों पर जुर्माना लगाया। ये खाली एक दफ्तर की बात नहीं है। कमोवेश सभी सरकारी दफ्तरों का यही हाल है, लेकिन लोग ये नहीं जानते कि बिजली बनाने के संसाधन सरकारी नहीं सीमित हैं जिन्हें बचाना हमारे लिए बेहद जरूरी है।
कोयले से बिजली के उत्पादन पर निर्भर भारत
भारत में बिजली निर्माण में कोयले का प्रमुख योगदान है। भारत में आज भी दो-तिहाई बिजली का निर्माण कोयले से होता है। कोयले को बिजली निर्माण का सबसे सस्ता श्रोत समझा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कोयला खनन की कितनी भारी कीमत वहां खदानों के आस-पास रह रहे लोगों को चुकानी होती है?

कोरबा जिले के लोगों का दर्द जानकर रूह कांप जाएगी
छत्तीसगढ़ का कोरबा जिला कोयले की खदानों का धरती पर बड़े भंडारों में से एक है। जब आप कोरबा जिले का दौरा करेंगे तो आपको सड़क के किनारे दूर-दूर तक कोयले की खदानें नजर आएंगी। प्रत्येक व्यक्ति का चेहरे किसी कपड़े से ढंका हुआ नजर आएगा।
हमने छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले की खदानों के आस-पास रह रहे लोगों से कोयला खनन का उनके जीवन पर पड़ने वाले असर को लेकर बातचीत की। भारत में ऐसे हजारों गांव हैं तो कोयले की खदानों के आस-पास बसे हुए हैं। इनमें से ज्यादातर लोग आदिवासी हैं। हमने कोरबा जिले के एक गांव का दौरा किया, गांव के लोगों ने हमें जो आप बीती बताई वह रूह कपा देने वाली थी। गांव की एक महिला मालमती ने हमें पानी का वो स्रोत दिखाया जिससे गांव के लोग पानी पीते हैं। जब हमने वह पानी अपने हाथों में लिया तो पूरा बदन ठंडा पड़ गया। कोयले की राख से वो पानी पूरी तरह से काला पड़ चुका था।
उन्होंने बताया कि वह लोग इसी पानी से खेतों की सिंचाई करते हैं। इस पानी ने उनके खेतों को बर्बाद कर दिया है। उनके खेतों में कोई फसल नहीं होती। स्वच्छ पानी के अभाव में उन्हें और उनके जानवरों को वही पानी पीना पड़ता है। बता दें कि कोयला खनन करने वाली कंपनियों से यहां के लोगों को स्वच्छ पानी प्रदान करने के लिए कहा गया है, लेकिन कंपनियों को केवल खनन से मतलब है लोगों की जिंदगी से नहीं। स्थानीय लोगों ने बताया कि खनन कंपनियां उनके साथ स्वच्छ पानी मुहैया कराने का करार करती हैं, लेकिन उसपर अमल नहीं करतीं और हमें हमारे हालात पर छोड़ जाती हैं।
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खनन के लिए अब तक164 हजार हेक्टेयर में फैला जंगल नष्ट
जब हमने एक कोयला खनन करने वाली कंपनी के अधिकारियों से इस बारे में बातचीत करनी चाही तो उन्होंने कुछ भी कहने से साफ इंकार कर दिया। कोयले का न केवल स्थानीय इलाके की मिट्टी और पानी को खराब कर रहा है बल्कि स्थानीय जंगलों पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार यहां 164 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फैला जंगल कोयला खनन के लिए 1950 के दशक से अब तक उजाड़ा जा चुका है। इन जंगलों में होने वाले लाखों लोगों को जंगल उजने के बाद यहां से विस्थापित होना पड़ा है और इस सब बातों का हमारी सरकार के पास कोई हिसाब नहीं है। इन जंगलों में रहने वाले लाखों लोग जहां जंगल कटने की वजह से अपने पूर्वजों की जमीन को छोड़कर कई और जाकर बस गए हैं वहीं कुछ लोग आज भी विस्थापित होने के लिए मजबूर हैं। कोरबा के जंगलों में रहने वाले जान साई ने अपनी व्यथा सुनाते हुए हमें बताया कि मुझे आज भी याद है जब में छोटा था तो यह जमीन काफी हरी भरी थी, यहां शेर चीते तेंदुए और सांप थे लेकिन आज सब बंजर हो चुका है।
पुनर्वास को मजबूर हजारों आदिवासी
जंगलों से विस्थापित हुए बड़ी संख्या में ऐसे भी लोग हैं जिनके पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि वह अपनी जगह से विस्थापित हुए हैं। जबकि सरकार का नियम कहता है कि जिन लोगों के बास विस्थापन का प्रमाण होगा ऐसे ही लोगों को पुनर्वास किया जा सकता है। 1951 से लेकर अब तक 2.5 मिलियन लोगों को कोयला खनन के कारण विस्थापित होना पड़ा है और इनमें से एक-चौथाई लोगों का ही पुर्नवास हो सका है।
बता दें कि भारत दुनिया का दूसरा (चीन के बाद) सबसे बड़ा कोयला उत्पादक और उपभोगकर्ता है। भारत में ऊर्जा की मांग दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले काफी तेजी से बढ़ रही है। देश की इतनी बड़ी आबादी की बिजली की मांग को पूरा करने के लिए भारत के पास ऊर्जा निर्माण का कोयले से सस्ता और आसान कोई और तरीका नहीं है। इसलिए भारत में कोयला खनन कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। जून 20202 में प्रधानमंत्री मोदी ने 470 वर्ग किलोमीटर में फैले 41 नए क्षेत्रों को कोयला खनन के लिए खोलने की घोषणा की थी। वहीं फरवरी 2021 तक आते आते इनकी संख्या 75 कर दी गई। कोयले के जलने से निकलने वाली कई हानिकारक गैसें पर्यावरण को दिन ब दिन जहरीला कर रही हैं। वहीं दुनिया में हर 5 में 1 मौत का कारण कोयले के जलने से निकलने वाली जहरीली गैस है। वहीं कोयला खनन का सबसे ज्यादा शिकार होते हैं खदानों के आस पास रह रहे लोग।
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