जब राजीव गांधी के जमाने में फ्रांसीसी जासूसों ने भेदा था PMO को
नई दिल्ली, 22 जुलाई। पेगासस जासूसी कांड से अभी पूरे भारत में खलबली मची हुई है। विपक्षी दलों ने केन्द्र सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने पेगासस स्पाईवेयर की मदद से देश के पत्रकारों, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जासूसी करायी है। किसी भी शासन की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा उसके खुफिया सूचना तंत्र पर टिकी होती है। लेकिन इसकी आड़ में राजनीतिक विरोधियों की जासूसी करना, सत्ता का बेजा इस्तेमाल है। कई बार ऐसा भी होता है कि सरकारी इंटेंलिजेंस सिस्टम के फेल होने से पूरा देश ही खतरे में पड़ जाता है।

जैसे 1985 में जब राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री थे तब पता चला था कि फ्रांस के जासूसों ने प्रधानमंत्री कार्यालय तक को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। पीएमओ में फ्रांसिसी जासूस प्लांट कर दिये गये थे और वे बेधड़क काम भी कर रहे थे। कई बार 'इंटेलिजेंस' की नाकामी की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। जैसे 1991 में राजीव गांधी की हत्या से पहले भारतीय नौसेना और रॉ ने इस साजिश के संकेतों को इंटरसेप्ट कर लिया था। लेकिन वह इसे समय पर डिकोड नहीं कर पायी और लिट्टे अपने नापाक इरादों में सफल हो गया।

राजीव गांधी के समय PMO में प्लांट हुआ फ्रांसीसी जासूस
भारत की जासूसी संस्था रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के एक पूर्व अधिकारी बी रमन ने एक किताब लिखी है- द काव ब्वॉज ऑफ रॉ : डाउन मेमोरी लेन। इस किताब में उन्होंने लिखा है कि कैसे फ्रांस ने भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय में अपने जासूस को प्लांट किया था। बाद में बी रमन ने बीबीसी के पत्रकार रेहान फजल को इस घटना के बारे में काफी कुछ बताया भी था। 1985 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तब इस बात का अचानक पता चला कि पीएमओ में फ्रांसीसी स्पाई एजेंट सक्रिय हैं। फ्रांसीसी जासूसों ने तब अपनी पैठ बनायी थी जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। ये बात बाहर आयी तो राजनीतिक बवाल मच गया। यह भारत की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा था। हंगामा होना लाजिमी था। लोकसभा में भी जब ये मामला उठा तो राजीव गांधी सरकार दबाव में आ गयी। अंत में प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी को सदन में सरकार का पक्ष रखना पड़ा। वी रमन के मुतबिक, इस मामले के तूल पकड़ने के बाद राजीव गांधी ने अपने प्रधान सचिव पीसी एलेक्जेंडर को इस्तीफा देने को कहा। रक्षा मंत्रालय और योजना आयोग के कई कर्मचारी इस मामले में गिरफ्तार किये गये। मुम्बई का एक बिजनेसमैन फ्रांसीसी जासूसों की मदद कर रहा था। उसे भी गिरफ्तार किया गया।

तो बच सकती थी राजीव गांधी की जान
यह आरोप अक्सर लगता रहा है कि भारत में खुफिया एजेंसियों का इस्तेमाल आंतरिक सुरक्षा की बजाय राजनीतिक मकसद के लिए अधिक होता है। इस मामले में कोई दल अछूता नहीं है। किसी भी दल की सरकार रही हो कमोबेश ऐसी स्थिति रहती ही है। कहा जाता है कि अगर तमिल विद्रोहियों के रेडियो संदेश को समय रहते डिकोड कर लिया गया होता तो शायद राजीव गांधी की जान बचायी जा सकती थी। 1991 में राजीव गांधी विपक्ष में थे। लेखक राजीव शर्मा ने अपनी किताब- बियोंड द टाइगर्स : ट्रैकिंग राजीव गांधीज असैसिनेशन में लिखा है कि भारतीय नौसेना और रॉ ने तमिल विद्रोहियों के रेडियो संदेश को पकड़ लिया था। लेकिन इन संदेशों को उनकी हत्या के कई महीने बाद डिकोड किया गया था। उस समय श्रीलंका में बैठे लिट्टे के साजिशकर्ता तमिलनाडु में मौजूद अपने लोगों को तमिल भाषा के कोडवर्ड में संदेश भेजते थे। लेकिन कोडवर्ड की इन गुत्थियों को सुलझाया नहीं जा सका। अगर समय रहते इन कूट संदेशों को पढ़ लिया गया होता तो शायद लिट्टे की साजिश सफल नहीं होती और राजीव गांधी की जान बच सकती थी। लेकिन खुफिया एजेंसियों ने प्रोफेशनल मुस्तैदी नहीं दिखायी।

भारत की जासूसी संस्था ‘रॉ’ का राजनीतिक इस्तेमाल
भारत की जासूसी संस्था रॉ में भी राजनीतिक दखलंदाजी क आरोप लगता रहा है। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी रॉ की मदद से अपने विरोधियों (चाहे पार्टी का हो या दूसरे दाल का) की एक गोपनीय फाइल तैयार कराती थीं। अगर कोई नेता उन्हें चुनौती देने की कोशिश करता तो वे उसके खिलाफ तैयार फाइल को तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल करतीं। मोरार जी देसाई का मानना था कि रॉ केवल इंदिरा गांधी के इशारे पर काम करता है। इसलिए 1977 में जब वे प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने रॉ के बजट में बहुत बड़ी कटौती कर दी। मोरार जी सरकार का आरोप था कि रॉ के एजेंट देश के आंतरिक मामले में दखल दे रहे हैं। रॉ के पूर्व अधिकारी आर के यादव ने एक इंटरव्यू में कहा था कि 10 जनपथ के एक नजदीकी कांग्रेस नेता ने एक आइपीएस अधिकारी को रॉ का चीफ बनाया था। जाहिर जब जिस दल की सरकार रही है वह अपने राजनीकि फायदे के लिए अलग अलग तरीकों से जासूसी का सहारा लेता रहा है।












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